मणिपुर में आदिवासियों पर अत्याचार पर चुप्पी क्यों? ममता बनर्जी का राष्ट्रपति मुर्मू पर सीधा सवाल, बीजेपी शासित राज्यों में अत्याचारों पर उठाए सवाल

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की पश्चिम बंगाल यात्रा इस विवाद की शुरुआत बनी, जहां वे 9वें अंतरराष्ट्रीय संताल सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। दार्जिलिंग के गोसाईपुर में आयोजित इस कार्य

By INA News Desk
Mar 8, 2026 - 10:29
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मणिपुर में आदिवासियों पर अत्याचार पर चुप्पी क्यों? ममता बनर्जी का राष्ट्रपति मुर्मू पर सीधा सवाल, बीजेपी शासित राज्यों में अत्याचारों पर उठाए सवाल
मणिपुर में आदिवासियों पर अत्याचार पर चुप्पी क्यों? ममता बनर्जी का राष्ट्रपति मुर्मू पर सीधा सवाल, बीजेपी शासित राज्यों में अत्याचारों पर उठाए सवाल

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू पर तीखा हमला बोलते हुए सवाल उठाया कि जब मणिपुर और अन्य बीजेपी शासित राज्यों में आदिवासियों पर अत्याचार हो रहे थे, तब वे चुप क्यों रहीं। यह बयान कोलकाता में एक धरना प्रदर्शन के दौरान दिया गया, जहां ममता ने राष्ट्रपति की हालिया टिप्पणियों का जवाब दिया। राष्ट्रपति मुर्मू ने पश्चिम बंगाल में संताल सम्मेलन में हिस्सा लेते हुए राज्य सरकार पर आदिवासी समुदाय की उपेक्षा का आरोप लगाया था, जिसके बाद ममता ने पलटवार किया। ममता ने कहा कि राष्ट्रपति बीजेपी की सलाह पर बोल रही हैं और पश्चिम बंगाल को हमेशा निशाना बनाया जाता है। उन्होंने मणिपुर में जारी हिंसा और आदिवासियों पर हो रहे हमलों का जिक्र करते हुए राष्ट्रपति की चुप्पी पर सवाल किया, जहां पिछले कई महीनों से जातीय संघर्ष चल रहा है।

मणिपुर में कुकी और मैतेई समुदायों के बीच हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए हैं, और महिलाओं व आदिवासियों पर विशेष रूप से हमले हुए हैं। ममता ने यह भी कहा कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी आदिवासियों पर अत्याचार होते हैं, लेकिन राष्ट्रपति वहां कुछ नहीं बोलतीं। इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, क्योंकि यह राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद पर सवाल उठाता है। ममता ने राष्ट्रपति से अपील की कि वे पहले उन राज्यों में कार्रवाई करें, जहां बीजेपी की सरकार है, फिर पश्चिम बंगाल पर बोलें। यह घटना 7 मार्च 2026 को हुई, और इसके बाद सोशल मीडिया पर व्यापक बहस शुरू हो गई। कई राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे चुनावी रणनीति का हिस्सा बताया, क्योंकि लोकसभा चुनाव नजदीक हैं। ममता की तृणमूल कांग्रेस हमेशा से आदिवासी और अल्पसंख्यक वोट बैंक पर फोकस करती रही है, और यह बयान उसी दिशा में देखा जा रहा है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की पश्चिम बंगाल यात्रा इस विवाद की शुरुआत बनी, जहां वे 9वें अंतरराष्ट्रीय संताल सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। दार्जिलिंग के गोसाईपुर में आयोजित इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया कि आदिवासी समुदाय के विकास के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए, और छोटा सा वेन्यू आवंटित किया गया जो पद की गरिमा के अनुरूप नहीं था। मुर्मू ने आदिवासी समुदाय की दुर्दशा पर दुख व्यक्त किया और कहा कि यह स्थिति लोकतंत्र के लिए चुनौती है। वे खुद आदिवासी पृष्ठभूमि से आती हैं, जो ओडिशा से हैं, और उनकी यह टिप्पणी राज्य सरकार को सीधे निशाने पर लेती है। इस यात्रा के दौरान सुरक्षा और प्रोटोकॉल में भी चूक की शिकायतें आईं, जिसने विवाद को और भड़काया। राष्ट्रपति ने कहा कि आदिवासी समाज को मुख्यधारा में लाने के लिए अधिक प्रयास की जरूरत है, और पश्चिम बंगाल में इस दिशा में कमी है। इस बयान के बाद बीजेपी नेताओं ने तृणमूल सरकार की आलोचना की, जबकि ममता ने इसे राजनीतिक साजिश बताया। मुर्मू की यह यात्रा 7 मार्च को हुई, और उसके कुछ घंटों बाद ही ममता ने जवाब दिया। राष्ट्रपति का यह दौरा आदिवासी कल्याण पर केंद्रित था, लेकिन इससे राजनीतिक टकराव पैदा हो गया। कई सूत्रों से पता चला कि राष्ट्रपति को बड़ा वेन्यू मांगा गया था, लेकिन राज्य सरकार ने छोटा स्थान दिया, जिससे असुविधा हुई। इस घटना ने आदिवासी मुद्दों को राष्ट्रीय पटल पर ला दिया है, और विभिन्न संगठनों ने राष्ट्रपति की बात का समर्थन किया। कुल मिलाकर, यह यात्रा एक सकारात्मक उद्देश्य से शुरू हुई लेकिन विवाद में तब्दील हो गई।

ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया में उन्होंने राष्ट्रपति को बीजेपी की कठपुतली बताते हुए कहा कि वे पार्टी की सलाह पर बोल रही हैं। कोलकाता में धरना देते हुए ममता ने राष्ट्रपति से कहा कि उन्हें सम्मान है, लेकिन वे बीजेपी की नीतियों से प्रभावित हैं। उन्होंने मणिपुर में आदिवासियों पर हो रहे हमलों का विस्तार से जिक्र किया, जहां महिलाओं को नग्न घुमाया गया और गांव जलाए गए। ममता ने पूछा कि उन घटनाओं पर राष्ट्रपति ने क्यों नहीं बोला, जबकि पश्चिम बंगाल में छोटी सी बात पर दुख व्यक्त किया। उन्होंने अन्य राज्यों जैसे छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में आदिवासियों की स्थिति का भी उल्लेख किया, जहां भूमि विवाद और हिंसा की घटनाएं आम हैं। ममता ने कहा कि चुनाव के समय बीजेपी राजनीति कर रही है, और राष्ट्रपति को इसमें शामिल नहीं होना चाहिए। तृणमूल कांग्रेस की यह रणनीति विपक्षी एकता को मजबूत करने की दिशा में देखी जा रही है, क्योंकि ममता इंडिया गठबंधन में प्रमुख भूमिका निभा रही हैं। उनके इस बयान ने बीजेपी को बचाव की मुद्रा में ला दिया है। ममता ने राज्य में आदिवासी कल्याण योजनाओं का बचाव किया, जैसे जंगली महल में विकास कार्य और आदिवासी छात्रवृत्तियां। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल आदिवासियों के लिए मॉडल राज्य है, जबकि बीजेपी राज्यों में अत्याचार हो रहे हैं। इस प्रतिक्रिया ने ममता की छवि को एक मजबूत नेता के रूप में मजबूत किया है, जो संवैधानिक पदों पर भी सवाल उठाने से नहीं हिचकती। मणिपुर में जारी हिंसा में 2023 से अब तक 200 से अधिक लोग मारे गए हैं, और आदिवासी समुदाय सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। केंद्र सरकार ने सेना तैनात की है, लेकिन स्थिति नियंत्रण में नहीं आ रही।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ममता बनर्जी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि तृणमूल कांग्रेस ने राष्ट्रपति का अपमान किया है, जो आदिवासी समाज का अपमान है। मोदी ने कहा कि राष्ट्रपति का दर्द पूरे देश को महसूस हो रहा है, और ममता की सरकार ने प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया। उन्होंने पश्चिम बंगाल में महिलाओं और आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों का जिक्र किया, जैसे संदेशखाली घटना जहां महिलाओं ने आरोप लगाए। मोदी ने कहा कि बीजेपी आदिवासी कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है, और राष्ट्रपति मुर्मू इसका प्रतीक हैं। इस बयान ने विवाद को और बढ़ा दिया, क्योंकि अब यह केंद्र बनाम राज्य का मुद्दा बन गया है। बीजेपी नेताओं ने ममता को घेरा, और कहा कि वे संवैधानिक मर्यादाओं को नहीं समझतीं। मोदी ने ओडिशा में एक रैली में यह बात कही, जहां उन्होंने आदिवासी वोट बैंक को साधने की कोशिश की। इस प्रतिक्रिया से साफ है कि बीजेपी इस मुद्दे को चुनावी हथियार बनाने की कोशिश कर रही है। विभिन्न राज्यों में आदिवासी मुद्दों पर बहस छिड़ गई है, और बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में विरोध प्रदर्शन की योजना बनाई है। मोदी ने कहा कि तृणमूल सरकार आदिवासियों की दुश्मन है, जबकि केंद्र ने कई योजनाएं चलाई हैं। यह घटना लोकसभा चुनाव से पहले राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ा रही है।

इस विवाद ने सोशल मीडिया पर तूफान मचा दिया है, जहां हजारों लोगों ने अपनी राय व्यक्त की। विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर वीडियो और पोस्ट वायरल हो रहे हैं, जिसमें ममता का बयान और राष्ट्रपति की टिप्पणियां शामिल हैं। कई यूजर्स ने ममता का समर्थन किया, कहते हुए कि राष्ट्रपति को सभी राज्यों पर समान रूप से बोलना चाहिए। जबकि अन्य ने इसे राष्ट्रपति का अपमान बताया और ममता की आलोचना की। सोशल मीडिया पर हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, और आदिवासी संगठनों ने दोनों पक्षों पर सवाल उठाए। इस बहस ने मणिपुर हिंसा को फिर से सुर्खियों में ला दिया है, जहां स्थानीय लोग अभी भी असुरक्षा में जी रहे हैं। कई आदिवासी नेताओं ने राष्ट्रपति का समर्थन किया, लेकिन ममता के सवाल को भी जायज बताया। सोशल मीडिया की भूमिका यहां महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह जानकारी तेजी से फैलाती है। अपडेट्स के अनुसार, 8 मार्च 2026 तक इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक जांच की घोषणा नहीं हुई, लेकिन दबाव बढ़ रहा है। जनजातीय संगठनों ने दिल्ली में प्रदर्शन की योजना बनाई है, जो विवाद को और बड़ा बना सकता है। कुल मिलाकर, यह प्रकरण राजनीति और समाज के बीच के संबंधों को दर्शाता है, जहां अस्मिता के मुद्दे प्रमुख हो जाते हैं।

राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से यह विवाद पश्चिम बंगाल की राजनीति को प्रभावित कर सकता है, जहां आदिवासी वोट बैंक महत्वपूर्ण है। जंगली महल और उत्तर बंगाल में आदिवासी बहुल इलाके हैं, और बीजेपी वहां मजबूत हो रही है। ममता का बयान आदिवासी वोटर्स को साधने की कोशिश है, जबकि बीजेपी राष्ट्रपति मुर्मू को आदिवासी चेहरा बनाकर फायदा उठा रही है। चुनाव से पहले यह मुद्दा विपक्षी एकता पर असर डाल सकता है। अन्य राज्यों जैसे ओडिशा और झारखंड में भी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, जहां आदिवासी नेता सक्रिय हैं। अपडेट्स में पता चला कि तृणमूल ने बयान का बचाव किया, जबकि बीजेपी ने इसे असंवैधानिक बताया। यह विवाद जनजातीय अधिकारों की बड़ी बहस का हिस्सा बन सकता है, और भविष्य में नीतिगत बदलाव ला सकता है। राष्ट्रपति के पद की गरिमा बनाए रखने के लिए सभी दलों को एकजुट होने की जरूरत है।

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