Saharanpur : सरकारी वृक्षारोपण अभियान पर सामाजिक संगठन ने उठाए सवाल, पौधों को बचाने और जांच कराने की मांग
सामाजिक संगठन उपवन सामाजिक वानिकी ट्रस्ट ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि पिछले तीन सालों में लगाए गए पौधों की किसी स्वतंत्र संस्था से जांच कराई जाए। संगठन का कहना है कि अगर हर साल लगाए जाने वाले पौधों में से आधे भी बच जाते, तो सहारनपुर आज बहुत ज्यादा
उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से हर साल बड़े स्तर पर चलाए जाने वाले वृक्षारोपण अभियान के तहत अलग-अलग विभागों को पौधे लगाने की जिम्मेदारी दी जाती है। इस बार भी सहारनपुर जिले में विभिन्न विभागों को मिलकर कुल इकतीस लाख अट्ठाइस हजार तीन सौ सत्तावन पौधे लगाने का लक्ष्य मिला है। सरकार की सूची के मुताबिक ग्राम्य विकास विभाग को सबसे ज्यादा सत्रह लाख छब्बीस हजार सतहत्तर पौधे, कृषि विभाग को तीन लाख नवासी हजार, उद्यान विभाग को दो लाख चालीस हजार, पर्यावरण विभाग को एक लाख छाछट हजार और पंचायतीराज विभाग को एक लाख अनठानवे हजार पौधे लगाने का जिम्मा सौंपा गया है। इसके अलावा बाकी विभागों को भी हजारों पौधे लगाने का लक्ष्य दिया गया है। लेकिन हर साल होने वाले इस भारी खर्च और बड़े दावों के बीच आम लोगों के मन में यह सवाल बना हुआ है कि ये पौधे आखिर लगाए कहां जाते हैं और इनकी देखरेख कौन करता है।
सामाजिक संगठन उपवन सामाजिक वानिकी ट्रस्ट ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि पिछले तीन सालों में लगाए गए पौधों की किसी स्वतंत्र संस्था से जांच कराई जाए। संगठन का कहना है कि अगर हर साल लगाए जाने वाले पौधों में से आधे भी बच जाते, तो सहारनपुर आज बहुत ज्यादा हरा-भरा होता। इससे लगातार बढ़ती गर्मी, सूखा और समय पर बारिश न होने जैसी दिक्कतों से लोगों को बड़ी राहत मिलती। संगठन ने आरोप लगाया कि यह अभियान सिर्फ कागजों पर सिमट कर रह गया है। पौधे लगाने के बाद उनकी सही से देखभाल नहीं की जाती और न ही बचे हुए पौधों की गिनती होती है। कई जगहों पर सिर्फ औपचारिकता पूरी करने के लिए पौधे लगा दिए जाते हैं।
इस स्थिति को सुधारने के लिए संगठन ने मुख्यमंत्री के सामने कुछ मुख्य मांगें रखी हैं। उन्होंने कहा कि पिछले तीन सालों में लगाए गए पौधों की विभाग और जगह के हिसाब से जांच हो। इस साल का काम शुरू होने से पहले जमीन तय की जाए और यह साफ किया जाए कि कौन सी संस्था पौधे लगाएगी। हर विभाग से पूरी योजना मांगी जाए कि वह अपना काम कैसे पूरा करेगा। लगाए गए पौधों की इंटरनेट के जरिए पहचान तय की जाए और तीन साल तक उनकी देखरेख का पक्का इंतजाम हो। जिस विभाग के पौधे सबसे कम बचेंगे, वहां के अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाए। पर्यावरण से जुड़े जानकारों का भी मानना है कि यह अभियान तभी कामयाब होगा जब लगाए गए पौधों में से कम से कम सत्तर से अस्सी प्रतिशत पौधे जीवित रहें, वरना हर साल पौधे लगाने के दावे सिर्फ कागजी आंकड़ों में ही फंसे रह जाएंगे।
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