Ballia Special : मुस्लिम नहीं, यहां हिंदू परिवार मन्नत का रखता और पूरी श्रद्धा के साथ निकालता है ताजिया, सैकड़ों सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी से निभा रहे है ये परंपरा
इस ताजिए का महत्व इतना अधिक है कि जब तक यह ताजिया कर्बला में दफन नहीं हो जाती, तब तक जिले की कोई दूसरी ताजिया दफन नहीं की जाती। मोहर्रम के मौके पर जिले भर के ताजियादार और अखाड़े एक जगह इकट्ठा होते हैं।
Report- Syed Asif Hussain Zaidi
बलिया में एक हिंदू परिवार सैकड़ो सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी मोहर्रम पर ताजिया निकालने की परंपरा निभाते और रहा है. सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बने इस परिवार ने मुकदमे के बाद हाई कोर्ट से भी जीत हासिल की थी. आज भी पूरे सम्मान और आस्था के साथ यह परंपरा जारी है, जो गंगा-जमुनी तहजीब और भाईचारे का अनूठा संदेश देती है.
आपको बता दें कि इमाम हुसैन ने जो इंसानियत की बक़ा (बचाने) के लिए पैगंबरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नवासे इमाम हुसैन ने जो अपने और अपने अनुवाइयों के साथ कर्बला के मैदान में जो अज़ीम शहादत पेश की इस शहादत को याद करते हुए हर महज़हबो मिल्लत के लोग पूरी दुनिया में इमाम हुसैन की शहादत की याद करते है और इमाम हुसैन की अजीम शहादत की याद में ताजिया, आलम, ताबूत उठते हैं। या इमाम हुसैन हम कर्बला में होते हम भी अपनी जान आप पर निछावर कर देते और आपकी लाश ऐसे ना 40 दिनों तक न पड़ी रहती । हम सब आपके ग़म में शामिल होते ।
इसीलिए इमाम हुसैन की शहादत को पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ पूरी दुनिया में याद किया जाता है।
और यही वजह है की पूरी दुनिया में हर मजहबों में मिलत के लोग चाहे वह हिंदू, हो या मुसलमान हो ,सिख हो या ईसाई सभी मज़हब के लोग "इमाम हुसैन से प्यार करते हैं।
किसी शायर ने क्या खूब कहा है की--
"दरे हुसैन पर मिलते हैं हर ख्याल के लोग ये इत्तेहाद का मरक़ज है आदमी के लिए"
आपकी शहादत को याद करते हुए आपके ग़म में ताजिया, आलम ,ताबूत उठाकर शरीक होते है. इसी क्रम में
उत्तर प्रदेश के बलिया बलिया मे भी ईमाम हुसैन को सिर्फ मुस्लिम ही नहीं हर मज़हबो मिल्लत के लोग भी इमाम हुसैन को प्यार करते हैं। इसके जिंदा मिसाल बलिया में ,सदियों से चली आ रही "करीमन गुप्ता" की मन्नत की ताजिया पीढ़ी दर पीढ़ी इमाम हुसैन शहादत की याद करते हुए मन्नत की ताजिया अब उनके पर पौत्र विजयपुर निवासी शिवकुमार गुप्ता मन्नत की पारिवारिक परंपरा को बखूबी निभाते आ रहे हैं।
बता दे कि ताजिए का महत्व इतना है कि जब तक श्री गुप्ता जी ताजिया दफन नहीं हो जाती तब तक किसी की ताजिया दफन नहीं होती, जिले भर के ताजिया दर अखाड़ा दर एक जगह इकट्ठा होकर पारंपरिक तौर पर जो बलिया के मुसलमान की सबसे महत्वपूर्ण मानी जाने वाली ताजिया जिसे "मीर साहब की ताजिया" कहते हैं , मीर साहब के ताज़ियादार और बलिया के तमाम मानिंद ताज़ियादार अखाड़ा दार , मिलकर परंपरागत तौर पर सब लोग जाकर "करीमन गुप्ता जी" की ताजिया के पास जाकर पूरे श्रद्धा और सम्मान के साथ उनको लेकर आते हैं , श्री गुप्ता जी की ताजिया आने के इंतजार में सारी ताजिया रुकी रहती हैं "धर्मशाला चौराहे" पर गुप्ता जी की ताज़िया और मीर साहब की ताजिया का मिलन होता है, फिर सभी लोग मिलकर सारे मजहब की दिवार छोडते हुए सब हुसैनी हो जाते हैं और या हुसैन या हुसैन या हुसैन कहते हुए कर्बला तक सब मीर साहब की ताजिया गुप्ता जी की ताजिया के पीछे कर्बला में जाकर दफ़न करते है।
आपसी सौहार्द कि इस मिसाल देखने के लिए लाखों लोग इकट्ठा रहते हैं और सच में गंगा जमुना तहजीब यही देखने को मिलती है। भाईचारा प्यार और सौहार्द की ऐसी मिसाल दुनिया में कहीं मिले ना मिले हमारे भारत में जरूर मिलती है।
किसी शायर ने क्या खूब कहा है - भारत में अगर आ जाता हृदय में उतर जाता क्यों चांद बनी हाशिम का धोखे से ना मारा जाता।
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