Atul Kulkarni Supports Sonam Wangchuk: सोनम वांगचुक के समर्थन में आए एक्टर अतुल कुलकर्णी, 1 दिन की भूख हड़ताल का किया एलान
Atul Kulkarni on Sonam Wangchuk Protest: फिल्म 'रंग दे बसंती' के अभिनेता अतुल कुलकर्णी ने लद्दाख आंदोलन के समर्थन में 1 दिन की भूख हड़ताल रखने का एलान किया है।
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लद्दाख के पर्यावरण संरक्षण और संवैधानिक अधिकारों को लेकर प्रख्यात शिक्षाविद व पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) के नेतृत्व में चल रहा आंदोलन अब राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। पिछले 18 दिनों से शून्य से नीचे के तापमान में अनशन पर बैठे वांगचुक को अब बॉलीवुड से भी बड़ा समर्थन मिला है। सुपरहिट फिल्म 'रंग दे बसंती' में अपने संजीदा अभिनय के लिए मशहूर राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेता अतुल कुलकर्णी (Atul Kulkarni) ने लद्दाख आंदोलन के प्रति एकजुटता दिखाते हुए गुरुवार, 16 जुलाई 2026 को एक दिन की भूख हड़ताल पर बैठने का एलान किया है। अतुल कुलकर्णी ने सोशल मीडिया पर एक विस्तृत वीडियो संदेश साझा करते हुए न केवल लद्दाख के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) की रक्षा की मांग उठाई, बल्कि आम नागरिकों से भी इस मुहिम से जुड़ने की अपील की है। आगे की राह में, सिनेमाई जगत के अन्य दिग्गजों द्वारा भी इस पर्यावरणीय और सामाजिक आंदोलन के पक्ष में आवाज उठाए जाने की संभावना बढ़ गई है।
लद्दाख को भारतीय संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और वहां के नाजुक हिमालयी पर्यावरण को औद्योगिक शोषण से बचाने के लिए सोनम वांगचुक का अनशन लगातार जारी है। उनके स्वास्थ्य में आ रही गिरावट के बीच मुंबई से अभिनेता अतुल कुलकर्णी का यह कदम देश के बौद्धिक और कलात्मक वर्ग की संवेदनशीलता को दर्शाता है। अतुल कुलकर्णी ने घोषणा की है कि वे सोनम वांगचुक के दृढ़ संकल्प का सम्मान करने और लद्दाख की जायज मांगों को मुख्यधारा की चर्चा में लाने के लिए प्रतीकात्मक रूप से 24 घंटे का उपवास रख रहे हैं। यह घटना इस बात की तस्दीक करती है कि लद्दाख का स्थानीय मुद्दा अब देशव्यापी नागरिक आंदोलन का रूप लेता जा रहा है।
सोनम वांगचुक के आमरण अनशन का आज 18वां दिन है। लद्दाख के कठिन मौसम में उनका स्वास्थ्य लगातार कमजोर हो रहा है, जिसे लेकर देश भर के पर्यावरण प्रेमी चिंतित हैं। इसी बीच अभिनेता अतुल कुलकर्णी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर एक वीडियो जारी किया। वीडियो में उन्होंने अपनी फिल्म 'रंग दे बसंती' के आदर्शों को याद करते हुए कहा कि जब समाज या देश का कोई हिस्सा अपनी बुनियादी पहचान और पर्यावरण को बचाने के लिए इतनी बड़ी कुर्बानी दे रहा हो, तो हम मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकते।
अतुल ने स्पष्ट किया कि लद्दाख के ग्लेशियर और वहां की संस्कृति केवल लद्दाखियों के लिए नहीं, बल्कि पूरे भारत के जल और वायु तंत्र के लिए जीवन रेखा हैं। उन्होंने वीडियो के माध्यम से बताया कि वे खुद 1 दिन की भूख हड़ताल पर बैठ रहे हैं ताकि सरकार और देश के बाकी हिस्सों तक यह संदेश पहुंचे कि सोनम वांगचुक इस लड़ाई में अकेले नहीं हैं। देखते ही देखते यह वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया और विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं व अभिनेताओं ने इसे री-ट्वीट करना शुरू कर दिया।
इस संवेदनशील सामाजिक-राजनीतिक घटनाक्रम पर संतुलित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। लद्दाख से सोनम वांगचुक के सहयोगियों ने अतुल कुलकर्णी के इस कदम का स्वागत किया है और कहा है कि कला जगत से मिली इस आवाज से आंदोलनकारियों का मनोबल काफी बढ़ा है।
दूसरी ओर, प्रशासनिक और राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि सरकार लद्दाख के विकास और वहां के पर्यावरण की सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। गृह मंत्रालय के उच्च अधिकारियों और लद्दाख के स्थानीय प्रतिनिधियों के बीच उच्च स्तरीय वार्ता के दौर पहले भी हो चुके हैं और प्रशासन शांतिपूर्ण तरीके से समाधान निकालने का प्रयास कर रहा है। फिल्म उद्योग के भीतर से भी स्वरा भास्कर और प्रकाश राज जैसे सामाजिक मुद्दों पर मुखर रहने वाले कलाकारों ने अतुल कुलकर्णी के इस कदम की सराहना की है।
अतुल कुलकर्णी के इस प्रतीकात्मक उपवास का सीधा प्रभाव लद्दाख आंदोलन की डिजिटल रीच (Reach) पर पड़ा है। पिछले 24 घंटों में सोशल मीडिया पर लद्दाख और सोनम वांगचुक से जुड़े हैशटैग्स तेजी से ट्रेंड करने लगे हैं। इस कदम ने देश के शहरी युवाओं का ध्यान हिमालयी क्षेत्र में हो रहे जलवायु परिवर्तन और वहां के स्थानीय अधिकारों की ओर आकर्षित किया है। मनोरंजन उद्योग से जुड़े किसी बड़े नाम के आगे आने से मुख्यधारा के समाचार चैनलों में भी इस आंदोलन को लेकर प्राइम-टाइम चर्चाएं शुरू हो गई हैं, जिससे नीति निर्माताओं पर इस विषय का जल्द शांतिपूर्ण हल खोजने का नैतिक दबाव बढ़ेगा।
अतुल कुलकर्णी के इस कदम के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले दिनों में बॉलीवुड और क्षेत्रीय सिनेमा के कई अन्य बड़े चेहरे भी लद्दाख के समर्थन में प्रतीकात्मक उपवास या डिजिटल कैंपेन शुरू कर सकते हैं। लद्दाख में सोनम वांगचुक की मेडिकल टीम उनके स्वास्थ्य मापदंडों की लगातार जांच कर रही है। सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि सरकार की ओर से वार्ता को लेकर कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिलता है, तो देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महानगरों में भी छात्र व नागरिक समूह 1 दिन के उपवास के जरिए इस आंदोलन को राष्ट्रव्यापी विस्तार दे सकते हैं।
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