सहारनपुर विकास प्राधिकरण में बड़ा खेल: संविदा कर्मी पर सरकारी चकरोड दबाकर अवैध होटल बनाने का आरोप, फाइलें दबाने की चर्चा

सहारनपुर विकास प्राधिकरण (SDA) में तैनात एक संविदा कर्मी पर सरकारी चकरोड की जमीन कब्जा कर अवैध होटल बनाने और फाइलों को दबाने का गंभीर आरोप लगा है।

Jul 16, 2026 - 22:18
Jul 16, 2026 - 22:19
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सहारनपुर विकास प्राधिकरण में बड़ा खेल: संविदा कर्मी पर सरकारी चकरोड दबाकर अवैध होटल बनाने का आरोप, फाइलें दबाने की चर्चा

सहारनपुर विकास प्राधिकरण के अफसरों की शह पर संविदा कर्मी का कारनामा, सरकारी चकरोड पर तान दिया होटल, उपाध्यक्ष की नजरों से दूर दबाई फाइलें

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में विकास योजनाओं को धरातल पर उतारने वाले विभाग में ही नियमों को ताक पर रखकर काम करने का एक बड़ा मामला सामने आया है। सहारनपुर विकास प्राधिकरण (एसडीए) में तैनात एक संविदा कर्मचारी पर विभाग के कुछ शीर्ष अफसरों के संरक्षण में अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल करने के गंभीर आरोप लगे हैं। सूत्रों के मुताबिक, यह कर्मचारी जोन-4 और जोन-7 क्षेत्र में हुए अवैध निर्माणों से जुड़ी महत्वपूर्ण फाइलों को दबाकर बैठा है। हैरानी की बात यह है कि इन फाइलों पर सहारनपुर विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष और आईएएस अधिकारी सूरज पटेल की नजर अभी तक नहीं पड़ी है। यही वजह है कि इन मामलों में शामिल दोषियों के खिलाफ अब तक न तो कोई सख्त कार्रवाई हो सकी है और न ही विभाग को इनसे मिलने वाला जरूरी राजस्व प्राप्त हुआ है।

जानकारी के अनुसार, यह संविदा कर्मचारी उत्तर प्रदेश खाद्य निगम के स्थानीय आरएफसी कार्यालय से करीब तीन वर्ष पहले सेवानिवृत्त हो चुका है। रिटायरमेंट के बाद उसने प्राधिकरण में संविदा पर अपनी पैठ बनाई। आरोप है कि तत्कालीन एक बड़े अधिकारी की शह पर उसने जनता रोड स्थित पुवांरका विकास खंड कार्यालय के ठीक सामने एक बड़े होटल का निर्माण कार्य भी शुरू कर दिया है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि इस संविदा कर्मी ने होटल निर्माण के लिए प्राधिकरण से कोई जरूरी नक्शा या मानचित्र स्वीकृत नहीं कराया है, बल्कि इसके बदले निर्माण स्थल पर एक ऐसा बोर्ड टांग रखा है जिस पर इसे लखनऊ से स्वीकृत होने का दावा किया गया है।

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब पुख्ता सूत्रों से पता चला कि होटल का निर्माण जिस जमीन पर किया जा रहा है, वह असल में सरकारी संपत्ति है। तहसील के राजस्व अभिलेखों के अनुसार, संबंधित भूमि का खसरा नंबर 65 और 67 सरकारी चकरोड के रूप में दर्ज है और मौके पर भी चकरोड का रास्ता मौजूद है। सरकारी रास्ते पर अवैध रूप से कब्जा करके निजी व्यावसायिक भवन बनाना पूरी तरह से गैर-कानूनी श्रेणी में आता है, जिससे यह पूरा मामला एक गंभीर जांच का विषय बन गया है। इसके बावजूद प्राधिकरण के जिम्मेदार अधिकारी इस पर कार्रवाई करने के बजाय पूरे मामले पर पर्दा डालने का प्रयास कर रहे हैं। इस लचर व्यवस्था के चलते स्थानीय लोगों का कहना है कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो अवैध निर्माणों पर रोक लगाना नामुमकिन हो जाता है।

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