जौहर विश्वविद्यालय प्रकरण: इमरान मसूद के बयान के बीच सरफराज खान और शाहनवाज खान की चुप्पी पर तेज हुई सियासी चर्चा
मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय को ध्वस्त किए जाने की चर्चाओं के बीच प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर
सहारनपुर: मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय को ध्वस्त किए जाने की चर्चाओं के बीच प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने विश्वविद्यालय के पक्ष में बयान देते हुए कहा कि "शिक्षा के मंदिरों को तोड़ने का काम सरकार को नहीं करना चाहिए। शिक्षा संस्थानों को बचाया जाना चाहिए।" उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में नई बहस शुरू हो गई है। वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री आजम खान से लंबे समय तक निकटता रखने वाले पूर्व मंत्री सरफराज खान और विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) शाहनवाज खान की ओर से इस मुद्दे पर अब तक कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आने से राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गर्म है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जौहर विश्वविद्यालय के निर्माण और संचालन में दोनों नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी तथा वे विश्वविद्यालय ट्रस्ट से भी जुड़े रहे हैं। ऐसे में मौजूदा विवाद के दौरान उनकी चुप्पी कई तरह के सवाल खड़े कर रही है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आजम खान के सबसे करीबी सहयोगियों में गिने जाने वाले सरफराज खान ने वर्षों तक उनके साथ काम किया और विश्वविद्यालय के विभिन्न कार्यों की जिम्मेदारियां भी संभालीं। इसी प्रकार शाहनवाज खान भी विश्वविद्यालय से जुड़े रहे। ऐसे में जब विश्वविद्यालय और आजम खान एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं, तब दोनों नेताओं की सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने न आना चर्चा का विषय बना हुआ है। इस बीच समाजवादी पार्टी के नेता हैदर ने भी दोनों नेताओं की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जिस प्रकार सांसद इमरान मसूद खुलकर जौहर विश्वविद्यालय के समर्थन में अपनी बात रख रहे हैं, उसी प्रकार उन नेताओं को भी अपनी स्पष्ट राय सामने रखनी चाहिए, जो कभी विश्वविद्यालय के निर्माण और प्रबंधन से जुड़े रहे हैं। हैदर का आरोप है कि यदि ऐसे समय में भी करीबी नेता मौन रहें तो इससे उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि सरफराज खान और शाहनवाज खान इन दिनों सांसद इमरान मसूद के साथ सक्रिय रूप से दिखाई देते हैं, लेकिन जौहर विश्वविद्यालय जैसे संवेदनशील मुद्दे पर उनकी चुप्पी को अलग-अलग नजरिए से देखा जा रहा है। कुछ लोग इसे राजनीतिक रणनीति बता रहे हैं तो कुछ इसे पूर्व के संबंधों से दूरी के संकेत के रूप में देख रहे हैं। हालांकि, सरफराज खान और शाहनवाज खान की ओर से इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में दोनों नेता इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं या नहीं.
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