कलेजा कांप उठेगा: 11 साल की बेटी ने मोबाइल के लिए दबाया मां का गला, फिर घर छोड़कर हुई फरार
गोरखपुर में 11 साल की बच्ची ने मोबाइल न मिलने पर मां का गला दबाया और बिहार भाग गई। जानिए बच्चों में बढ़ती डिजिटल लत और अभिभावकों की लापरवाही की पूरी कहानी।
- गोरखपुर: मोबाइल न मिलने पर मां का गला दबाकर भागी 11 साल की बच्ची, जानिए डिजिटल लत की खौफनाक दास्तान
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- गोरखपुर: 11 वर्षीय छात्रा ने मोबाइल के लिए मां का गला दबाया, बिहार से हुई बरामद
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के तिवारीपुर थाना क्षेत्र से एक बेहद चिंताजनक और हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। यहां तीन अगस्त की रात 11 वर्षीय छठी कक्षा की एक छात्रा ने मोबाइल फोन न मिलने से नाराज होकर अपनी मां का गला दबाने का प्रयास किया। अगले ही दिन वह बिना बताए घर छोड़कर बिहार स्थित अपने एक रिश्तेदार के घर चली गई। पुलिस की त्वरित कार्रवाई और परिजनों की सतर्कता से बच्ची को 72 घंटे बाद सकुशल बरामद कर लिया गया। यह घटना महज एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि आधुनिक दौर में मासूमों को जकड़ रही मोबाइल की लत और अभिभावकों द्वारा अनजाने में की जा रही बड़ी लापरवाही की एक भयावह चेतावनी है।
तकनीक के इस दौर में स्मार्टफोन जहां एक ओर ज्ञान का जरिया बना है, वहीं दूसरी ओर बच्चों के लिए यह एक मानसिक संकट का रूप लेता जा रहा है। गोरखपुर के तिवारीपुर इलाके में किराए पर रहने वाली एक महिला की 11 साल की बेटी को मोबाइल फोन देखने की गंभीर लत लग चुकी थी। तीन अगस्त की रात करीब 11 बजे जब बच्ची ने अपनी मां से स्मार्टफोन मांगा, तो मां ने देर रात होने और पढ़ाई का हवाला देते हुए फोन देने से साफ इनकार कर दिया।
इतनी सी बात पर मासूम बच्ची आपा खो बैठी और उसने अपनी ही मां पर हमला कर दिया। बच्ची ने गुस्से में आकर मां का गला दबाने की कोशिश की। मां के शोर मचाने पर आस-पास के लोग और मकान मालिक मौके पर पहुंचे और किसी तरह महिला की जान बचाई। पड़ोसियों ने बच्ची को काफी समझाया-बुझाया, जिसके बाद वह शांत हुई, लेकिन उसके सिर पर गुस्से का भूत इस कदर सवार था कि वह लगातार घर छोड़कर चले जाने की धमकियां दे रही थी।
चार अगस्त की शाम लगभग पांच बजे, जब परिवार के लोग अन्य कामों में व्यस्त थे, तब छात्रा चुपचाप एक छोटा काला पिठ्ठू बैग लेकर घर से निकल गई। देर शाम तक जब वह वापस नहीं लौटी, तो घबराए परिजनों ने उसकी खोजबीन शुरू की। आस-पास और रिश्तेदारों के यहां तलाश करने के बाद भी जब बच्ची का कोई सुराग नहीं मिला, तो मां ने तिवारीपुर थाने में उसकी गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए तिवारीपुर पुलिस तुरंत हरकत में आई। पुलिस ने इलाके के सभी सीसीटीवी फुटेज खंगाले और मोबाइल से जुड़े इनपुट जुटाने शुरू किए। मां ने पुलिस को यह भी जानकारी दी कि घर छोड़ने से ठीक पहले बच्ची ने मोबाइल से किसी अज्ञात व्यक्ति से बात की थी, जिसकी पहचान ट्रूकॉलर पर एक युवक के रूप में हुई थी। इसके अलावा उसकी एक सहपाठी और कुछ अन्य संदिग्ध लड़कों के संपर्क की जांच की मांग भी की गई। पुलिस टीम ने सभी पहलुओं पर काम करते हुए आखिरकार 72 घंटे के भीतर बच्ची को बिहार के गोपालगंज स्थित उसके रिश्तेदार के घर से सुरक्षित ढूंढ निकाला।
इस दिल दहला देने वाली घटना के बाद क्षेत्र में डर और चिंता का माहौल है। पीड़िता मां का कहना है कि उनके पति सऊदी अरब में नौकरी करते हैं और वह अपने बेटे (कक्षा 9) व बेटी (कक्षा 6) को अकेले संभालती हैं। उन्होंने रोते हुए बताया कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि स्क्रीन की लत उनकी बेटी को इस हद तक हिंसक बना देगी।
दूसरी ओर, मामले की जांच कर रही तिवारीपुर थाना पुलिस का कहना है कि बच्ची को सकुशल बरामद कर लिया गया है और परिवार को सौंपने के साथ-साथ उसकी काउंसलिंग कराई जा रही है। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, इस मामले में किसी भी तरह के बाहरी बहकावे या संदिग्ध संपर्क के कोण की भी बारीकी से जांच की जा रही है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बच्ची किसी गलत हाथों में न पड़ी हो।
जिम्मेदार कौन?
गोरखपुर की यह घटना समाज और अभिभावकों के मुंह पर एक करारा तमाचा है। यह सवाल उठाना बेहद जरूरी हो गया है कि आखिर इतनी छोटी सी उम्र में बच्चों के भीतर इतना गुस्सा, हिंसा और दुस्साहस कहां से आ रहा है? जवाब स्पष्ट है, इसके सबसे बड़े जिम्मेदार स्वयं माता-पिता हैं।
आजकल के दौर में जब छोटा बच्चा रोता है, जिद करता है या खाना नहीं खाता, तो मां-बाप अपनी व्यस्तता या सहूलियत के लिए उसके हाथ में स्मार्टफोन थमा देते हैं। शुरुआत में तो यह एक खिलौना लगता है, लेकिन धीरे-धीरे यह मासूमों के दिमाग में जहर घोलने लगता है। मोबाइल स्क्रीन पर लगातार गेमिंग, सोशल मीडिया और अनियंत्रित सामग्री देखने से बच्चों के मस्तिष्क में डोपामाइन का संतुलन बिगड़ जाता है। जब उनसे यह आभासी दुनिया छीनी जाती है, तो वे आक्रामक, डिप्रेशन के शिकार और हिंसक हो जाते हैं। 11 साल की बच्ची द्वारा मां का गला दबाना इसी डिजिटल एडिक्शन का चरम रूप है।
इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए समाज, स्कूल और अभिभावकों को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे। सबसे पहले अभिभावकों को अपनी इस आदत को बदलना होगा कि वे बच्चों को शांत कराने के लिए फोन दें। बच्चों का स्क्रीन टाइम कड़ाई से सीमित किया जाना चाहिए और उनके व्यवहार में आ रहे बदलावों पर पैनी नजर रखनी चाहिए।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे मामलों में बच्चों पर चिल्लाने या उन्हें पीटने के बजाय उनकी काउंसलिंग की जानी चाहिए। गोरखपुर की इस बच्ची को भी अब चिकित्सीय और मानसिक मार्गदर्शन की जरूरत है। अगर समय रहते माता-पिता नहीं जागे और अपने बच्चों को आभासी दुनिया से निकालकर असली दुनिया में मैदान, किताबों और अपनों के बीच नहीं लाए, तो आने वाले समय में ऐसी दुखद घटनाएं और बढ़ सकती हैं।
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