उत्तराखंड के चुनावी शंखनाद के बीच अल्मोड़ा में आयोजित हुई कांग्रेस की विशाल जनसभा, खराब मौसम के चलते धरातल पर नहीं उतर सका राष्ट्रीय नेतृत्व।
उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही सियासी पारा तेजी से चढ़ने लगा है, जिसके तहत कुमाऊं के
- टिकट के दावेदारों ने सिमकनी मैदान में दिखाई ताकत और एकजुटता, लेकिन मुख्य वक्ता की अनुपस्थिति से कुमाऊं की जनता का जनसंदेश रह गया अधूरा।
- वर्चुअल माध्यम और फोन कॉल के जरिए राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं में भरा जोश, स्थानीय सरोकारों के बजाय राष्ट्रीय मुद्दों पर केंद्रित रहा पूरा संबोधन।
उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही सियासी पारा तेजी से चढ़ने लगा है, जिसके तहत कुमाऊं के प्रवेश द्वार माने जाने वाले अल्मोड़ा के सिमकनी मैदान में कांग्रेस पार्टी द्वारा एक बेहद भव्य और विशाल जनसभा का आयोजन किया गया। इस जनसभा को लेकर पिछले कई दिनों से पूरे कुमाऊं क्षेत्र में व्यापक तैयारियां की जा रही थीं और पार्टी कार्यकर्ताओं से लेकर आम जनता में भारी उत्साह देखा जा रहा था। पर्वतीय अंचल की इस महत्वपूर्ण सीट से चुनावी बिगुल फूंकने की रणनीति के तहत कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी का यह दौरा तय किया गया था, जिसे सफल बनाने के लिए पार्टी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। हालांकि, ऐन वक्त पर प्रकृति के बदले मिजाज और खराब मौसम ने इस पूरे कार्यक्रम की भौतिक रूपरेखा को प्रभावित कर दिया, जिससे मैदान में जुटी भारी भीड़ के बीच मुख्य नेता की शारीरिक उपस्थिति संभव नहीं हो सकी।
अल्मोड़ा और आसपास के सीमावर्ती जिलों जैसे बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चंपावत से सुबह से ही बड़ी संख्या में कांग्रेस समर्थक, पूर्व सैनिक और स्थानीय नागरिक पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ जनसभा स्थल पर जुटना शुरू हो गए थे। आगामी चुनावों में अपनी दावेदारी मजबूत करने के इरादे से स्थानीय नेताओं और टिकट के आकांक्षियों ने मैदान के चारों ओर अपने बड़े-बड़े होर्डिंग्स, बैनर और पोस्टर लगाकर अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया। मंच पर प्रदेश प्रभारी, पूर्व मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और पार्टी के तमाम वरिष्ठ पदाधिकारी मौजूद रहे, जिन्होंने कार्यकर्ताओं में जोश भरने का हरसंभव प्रयास किया। लेकिन इन तमाम तैयारियों और दावों के बीच जैसे ही यह खबर आई कि खराब मौसम और दृश्यता कम होने के कारण हेलीकॉप्टर को पंतनगर से उड़ान भरने की अनुमति नहीं मिली, मैदान में मौजूद जनसैलाब के बीच एक सन्नाटा सा पसर गया।
भौतिक रूप से जनसभा में न पहुंच पाने के कारण पैदा हुई निराशा को दूर करने के लिए तकनीकी माध्यमों का सहारा लिया गया और राहुल गांधी ने फोन कॉल तथा वर्चुअल लिंक के जरिए सीधे अल्मोड़ा की जनता को संबोधित किया। अपने संबोधन की शुरुआत में उन्होंने पर्वतीय क्षेत्र के दुर्गम रास्तों और खराब मौसम के चलते न आ पाने पर गहरा खेद व्यक्त किया और वादा किया कि वे बहुत जल्द व्यक्तिगत रूप से अल्मोड़ा आकर जनता के बीच बैठेंगे। हालांकि, इस फोन कॉल के दौरान कई तकनीकी बाधाएं भी सामने आईं, जिसके कारण आवाज पूरी तरह से साफ और स्पष्ट न होने से मैदान के अंतिम छोर पर बैठे लोगों तक संदेश प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच सका। इस तकनीकी संवाद ने रैली को पूरी तरह से विफल होने से तो बचा लिया, लेकिन जो सीधा जुड़ाव एक राजनेता का जनता से मैदान में होता है, उसकी कमी साफ तौर पर महसूस की गई।
अल्मोड़ा जनसभा के मुख्य घटनाक्रम और रणनीतिक बिंदु:
खराब मौसम की मार: पंतनगर हवाई अड्डे पर उतरने के बाद पायलट ने तीन बार प्रयास किया, लेकिन प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण हेलीकॉप्टर अल्मोड़ा में लैंड नहीं कर सका।
वर्चुअल और फोन वार्ता: प्रदेश नेतृत्व की व्यवस्था के तहत फोन कॉल को लाउडस्पीकर से जोड़कर जनता तक आवाज पहुंचाने की कोशिश की गई।
दावेदारों का शक्ति प्रदर्शन: कुमाऊं संभाग की विभिन्न सीटों से आए टिकटार्थियों ने भारी भीड़ जुटाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
पलायन और स्थानीय मुद्दे: जनसभा में पहुंचे स्थानीय नागरिकों को उम्मीद थी कि पर्वतीय क्षेत्र की बुनियादी समस्याओं पर ठोस नीतिगत घोषणाएं होंगी।
इस पूरे आभासी संबोधन के दौरान मुख्य फोकस उत्तराखंड के स्थानीय या क्षेत्रीय सरोकारों के बजाय राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर अधिक केंद्रित रहा। संबोधन में केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के क्रियान्वयन की कमियों और नोटबंदी के प्रभावों की चर्चा विस्तार से की गई, जिससे छोटे व्यापारियों को हुए नुकसान का हवाला दिया गया। इसके अतिरिक्त, देश के भीतर परिसंपत्तियों के कुछ चुनिंदा औद्योगिक घरानों के हाथों में केंद्रित होने और अंतरराष्ट्रीय समझौतों से देश के कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर तीखे हमले बोले गए। लेकिन कुमाऊं की इस धरती पर पहाड़ों की मुख्य समस्याओं जैसे अनियंत्रित पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव, जंगली जानवरों का आतंक और स्थानीय रोजगार सृजन पर कोई विस्तृत रोडमैप सामने नहीं आ सका।
उत्तराखंड राज्य के गठन के पीछे यहां के आंदोलनकारियों और आम जनता का जो मूल सपना था, उस विचार को केंद्र में रखते हुए यह आरोप लगाया गया कि वर्तमान व्यवस्था में राज्य का संचालन स्थानीय लोगों की मर्जी के बजाय बाहरी शक्तियों द्वारा किया जा रहा है। पर्वतीय राज्य की अपार प्राकृतिक संपदा और जल संसाधनों का लाभ यहां के मूल निवासियों को न मिलकर बाहरी पूंजीपतियों को मिलने की बात कही गई, जिससे स्थानीय युवाओं का भविष्य अंधकारमय हो रहा है। उत्तराखंड के वीरों की सैन्य परंपरा और देश की सीमाओं की रक्षा में उनके योगदान की सराहना की गई, लेकिन इसके साथ ही सैन्य भर्ती की नई योजनाओं के कारण युवाओं के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई। इन तमाम सैद्धांतिक बातों के बावजूद, स्थानीय जनता एक ऐसी ठोस और जमीनी कार्ययोजना सुनना चाहती थी जो उनके दैनिक जीवन को सीधे प्रभावित कर सके।
रैली की समाप्ति के बाद राजनीतिक विश्लेषकों और मैदान से लौट रहे आम लोगों के बीच इस बात को लेकर व्यापक चर्चा रही कि यह आयोजन जिस बड़े उद्देश्य के साथ प्लान किया गया था, वह पूरी तरह से फलीभूत नहीं हो सका। टिकट के दावेदार नेता तो अपनी गाड़ियों में भरकर समर्थकों को लाने और अपनी पीठ थपथपाने में सफल रहे, लेकिन आम जनमानस जिस मुख्य संदेश और चुनावी गारंटी की उम्मीद शीर्ष नेतृत्व से कर रहा था, वह संदेश अधूरा ही रह गया। बिना मुख्य वक्ता के भौतिक रूप से मंच पर आए, पूरी जनसभा महज एक औपचारिक राजनीतिक विमर्श बनकर रह गई, जिससे कुमाऊं क्षेत्र में कांग्रेस के इस चुनावी शंखनाद का जो मनोवैज्ञानिक प्रभाव विपक्षी दलों पर पड़ना चाहिए था, वह काफी हद तक कमजोर दिखाई दिया।
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