तेजी की तपिश झेलने को तैयार रहे आम जनता, RBI के संकेतों ने बढ़ाई चिंता, महंगाई बम फटने की आशंका।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की हालिया मौद्रिक नीति समिति की बैठकों और गवर्नर के बयानों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के भविष्य
- RBI का कड़ा रुख, खाद्य कीमतों में उछाल और वैश्विक अनिश्चितता के बीच महंगाई बम फटने की आशंका
- ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों पर फिरा पानी, भारतीय रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति में सख्ती के दिए स्पष्ट संकेत
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की हालिया मौद्रिक नीति समिति की बैठकों और गवर्नर के बयानों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर एक सतर्कता वाली तस्वीर पेश की है। केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट कर दिया है कि महंगाई के मोर्चे पर अभी जंग खत्म नहीं हुई है, बल्कि आने वाले समय में स्थितियां और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं। RBI की मुख्य चिंता देश में बढ़ती खुदरा महंगाई दर को लेकर है, जो लगातार केंद्रीय बैंक द्वारा तय किए गए 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और घरेलू बाजार में आपूर्ति श्रृंखला की बाधाओं ने इस स्थिति को और गंभीर बना दिया है। केंद्रीय बैंक का मानना है कि यदि समय रहते कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो महंगाई का यह दबाव अर्थव्यवस्था के विकास की गति को धीमा कर सकता है। महंगाई के इस संभावित विस्फोट के पीछे सबसे बड़ा कारण खाद्य वस्तुओं की कीमतों में होने वाला अनियंत्रित इजाफा है। दालों, सब्जियों और अनाज की कीमतों में लगातार हो रही वृद्धि ने आम आदमी की थाली का बजट बिगाड़ दिया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी रिपोर्टों में बार-बार इस बात का उल्लेख किया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अनिश्चित मानसून और बेमौसम बारिश ने कृषि पैदावार को बुरी तरह प्रभावित किया है। जब तक खाद्य कीमतों में स्थिरता नहीं आती, तब तक समग्र महंगाई दर को काबू में करना असंभव प्रतीत होता है। RBI के सख्त संकेतों का मतलब यह है कि आने वाले समय में अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में और तेजी देखी जा सकती है, जिससे निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ना तय है।
वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों ने भी भारतीय रिजर्व बैंक की चिंताओं को बल दिया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, विशेष रूप से मध्य पूर्व और यूरोप के कुछ हिस्सों में जारी संघर्षों ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बाधित किया है। इसका सीधा असर आयातित वस्तुओं, खासकर कच्चे तेल और खाद्य तेलों की कीमतों पर पड़ता है। भारत अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में थोड़ी सी भी वृद्धि घरेलू स्तर पर परिवहन लागत को बढ़ा देती है। परिवहन लागत बढ़ने का सीधा परिणाम यह होता है कि बाजार में मिलने वाली हर छोटी-बड़ी चीज महंगी हो जाती है। RBI इन बाहरी कारकों पर पैनी नजर रखे हुए है और यह मान रहा है कि बाहरी झटके कभी भी घरेलू बाजार में महंगाई का बम फोड़ सकते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक का प्राथमिक कार्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना है। इसके लिए RBI 'रेपो रेट' का उपयोग एक हथियार के रूप में करता है। जब महंगाई बढ़ती है, तो RBI रेपो रेट में बढ़ोतरी करता है ताकि बाजार में नकदी का प्रवाह कम हो सके और मांग में कमी आए। हालांकि, इसका दूसरा पहलू यह है कि इससे होम लोन, कार लोन और अन्य व्यक्तिगत ऋण महंगे हो जाते हैं, जिससे आम आदमी की ईएमआई (EMI) बढ़ जाती है।
मुद्रास्फीति के दबाव के बीच ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद लगाए बैठे कर्जदारों के लिए भी RBI के संकेत निराशाजनक हैं। केंद्रीय बैंक ने फिलहाल ब्याज दरों में किसी भी प्रकार की राहत देने से मना कर दिया है। गवर्नर के बयानों से यह स्पष्ट होता है कि जब तक महंगाई दर स्थायी रूप से 4 प्रतिशत के करीब नहीं पहुंच जाती, तब तक रेपो रेट में कटौती का जोखिम नहीं लिया जाएगा। इसका मतलब है कि आम जनता को अभी भी ऊंचे ब्याज दरों का भुगतान करना जारी रखना होगा। RBI का यह सख्त रुख बाजार में तरलता को नियंत्रित करने के लिए है, ताकि मांग को नियंत्रित कर महंगाई को बढ़ने से रोका जा सके। केंद्रीय बैंक की प्राथमिकता वर्तमान में विकास दर से ज्यादा महंगाई पर नियंत्रण पाना बनी हुई है।
घरेलू स्तर पर विनिर्माण और सेवाओं की लागत में वृद्धि भी महंगाई को बढ़ावा दे रही है। कच्चे माल की कीमतें बढ़ने के कारण कंपनियां अपनी उत्पादन लागत को उपभोक्ताओं पर डाल रही हैं। ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और उपभोक्ता सामान बनाने वाली कंपनियों ने पिछले कुछ महीनों में कई बार कीमतों में बढ़ोतरी की है। RBI के आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ रहा है। वेतन में होने वाली वृद्धि की तुलना में वस्तुओं की कीमतों में होने वाला इजाफा कहीं अधिक है, जिससे लोगों की क्रय शक्ति कम हो रही है। यदि यही रुझान जारी रहा, तो बाजार में खपत कम हो सकती है, जो अंततः देश की जीडीपी (GDP) वृद्धि को प्रभावित करेगी। RBI ने भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए यह भी माना है कि वित्तीय क्षेत्र में अत्यधिक उत्साह और असुरक्षित ऋणों की बढ़ती संख्या एक नया जोखिम पैदा कर सकती है। यदि लोग अपनी आय का बड़ा हिस्सा केवल बुनियादी जरूरतों और महंगे ऋणों को चुकाने में खर्च कर देंगे, तो अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में निवेश और खर्च कम हो जाएगा। केंद्रीय बैंक ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों को सलाह दी है कि वे ऋण देते समय अधिक सतर्कता बरतें। महंगाई का बम केवल वस्तुओं की कीमतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के समग्र वित्तीय ढांचे को भी अस्थिर करने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि RBI बार-बार कड़े और कभी-कभी अप्रिय फैसले लेने की चेतावनी दे रहा है।
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