जेवर एयरपोर्ट ने पार की नियमों की बाधा: 150 किमी के नियम को दरकिनार कर उड़ान को तैयार
विमानन विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया के कई विकसित देशों में एक ही शहर या उसके आसपास 50-60 किलोमीटर की दूरी पर कई बड़े हवाई अड्डे सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं। लंदन, न्यूयॉर्क और टोक्यो इसके बड़े उदाहरण हैं। भारत ने जेवर के माध्यम से इसी
- आईजीआई दिल्ली से महज 61 किमी दूर बनेगा नया एविएशन हब: विकास की रफ्तार के आगे नियम हुए बौने
- नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का सफल सफर: जानिए कैसे 150 किमी की दूरी की शर्त को मिली विशेष छूट
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का निर्माण भारत के विमानन इतिहास में एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। देश में दशकों से यह नियम प्रभावी रहा है कि किसी भी मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के 150 किलोमीटर के दायरे में दूसरा ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट नहीं बनाया जा सकता। इस नियम के पीछे मुख्य तर्क हवाई क्षेत्र (Air Space) का सुचारू प्रबंधन और पहले से मौजूद हवाई अड्डे के व्यावसायिक हितों की रक्षा करना था। हालांकि, दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (IGI) पर बढ़ते यात्री दबाव और भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए केंद्र सरकार ने इस कठोर नियम में विशेष रियायत दी। जेवर हवाई अड्डा दिल्ली के आईजीआई एयरपोर्ट से सड़क मार्ग और हवाई दूरी के लिहाज से मात्र 61 से 72 किलोमीटर के दायरे में स्थित है, जो तकनीकी रूप से नियमों के विपरीत था, लेकिन दिल्ली-एनसीआर की विशाल आबादी की जरूरतों ने इस दीवार को छोटा कर दिया।
हवाई अड्डों के बीच 150 किलोमीटर की दूरी का नियम वर्ष 2008 की 'पालिसी ऑन ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट्स' के तहत तय किया गया था। इसका उद्देश्य दो बड़े हवाई अड्डों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना और एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) के बीच होने वाले संभावित टकराव को रोकना था। जेवर के मामले में, शुरुआती दौर में कई तकनीकी आपत्तियां दर्ज की गईं कि इतनी कम दूरी पर दो बड़े अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे होने से लैंडिंग और टेक-ऑफ के दौरान विमानों के रास्तों में बाधा आ सकती है। इसके बावजूद, एक विस्तृत व्यवहार्यता अध्ययन (Feasibility Study) के बाद यह पाया गया कि आधुनिक रडार तकनीक और उन्नत एटीसी प्रणालियों के माध्यम से इस समस्या का समाधान संभव है। इसी आधार पर रक्षा मंत्रालय और नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने जेवर एयरपोर्ट को 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' प्रदान किया, जिससे इसके निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ।
विकास की इस रफ्तार का सबसे बड़ा कारण दिल्ली एयरपोर्ट की संतृप्ति सीमा (Saturation Point) का करीब आना है। आईजीआई एयरपोर्ट अपनी पूरी क्षमता के साथ काम करने के बावजूद भविष्य के यात्रियों की बढ़ती संख्या को संभालने में सक्षम नहीं होता। अनुमान है कि 2030 तक दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में प्रति वर्ष 10 करोड़ से अधिक यात्रियों का आवागमन होगा। जेवर एयरपोर्ट इस अतिरिक्त बोझ को साझा करेगा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के कुछ हिस्सों के यात्रियों के लिए एक सुगम विकल्प प्रदान करेगा। इससे न केवल यात्रियों का समय बचेगा, बल्कि दिल्ली के मुख्य हवाई अड्डे पर लगने वाली लंबी कतारों और उड़ानों की देरी में भी कमी आएगी। यह परियोजना दर्शाती है कि जब आर्थिक लाभ और जनता की सुविधा सर्वोपरि हो, तो तकनीकी नियमों में लचीलापन लाया जा सकता है। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का निर्माण 'ज्यूरिख एयरपोर्ट इंटरनेशनल एजी' द्वारा किया जा रहा है। परियोजना के पहले चरण में एक रनवे और एक टर्मिनल तैयार किया गया है, जिसकी क्षमता प्रति वर्ष 1.2 करोड़ यात्रियों को संभालने की होगी। पूरी परियोजना के अंत तक यहाँ कुल पांच रनवे होने की योजना है, जो इसे भारत का सबसे बड़ा और दुनिया के शीर्ष पाँच हवाई अड्डों में से एक बना देगा।
जेवर एयरपोर्ट की रणनीतिक स्थिति इसे अन्य हवाई अड्डों से अलग बनाती है। यह न केवल दिल्ली के करीब है, बल्कि यमुना एक्सप्रेसवे के साथ इसकी कनेक्टिविटी इसे आगरा, मथुरा और अलीगढ़ जैसे महत्वपूर्ण शहरों से सीधे जोड़ती है। इसके अतिरिक्त, जेवर को दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे और निर्माणाधीन रैपिड रेल (RRTS) एवं मेट्रो विस्तार से भी जोड़ा जा रहा है। यह मल्टी-मोडल कनेक्टिविटी सुनिश्चित करेगी कि यात्री और कार्गो दोनों ही बिना किसी बाधा के हवाई अड्डे तक पहुँच सकें। इतनी कम दूरी पर दो बड़े अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे होने का एक लाभ यह भी होगा कि आपातकालीन स्थिति में या खराब मौसम के दौरान उड़ानों को डायवर्ट करने के लिए एक विश्वसनीय विकल्प हमेशा मौजूद रहेगा, जो उत्तर भारत के हवाई यातायात को अधिक सुरक्षित बनाएगा।
आर्थिक दृष्टिकोण से, जेवर एयरपोर्ट के आसपास के क्षेत्रों में निवेश की बाढ़ आ गई है। हवाई अड्डे के निर्माण के साथ ही यहाँ फिल्म सिटी, मेडिकल डिवाइस पार्क और लॉजिस्टिक हब जैसी बड़ी परियोजनाओं पर काम चल रहा है। 150 किमी के नियम को शिथिल करने का निर्णय केवल हवाई यातायात के लिए नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के औद्योगिक विकास के लिए लिया गया था। हजारों करोड़ों के निवेश और लाखों प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसरों ने नियमों की जटिलता को पीछे छोड़ दिया है। यह एयरपोर्ट उत्तर प्रदेश को एक 'ग्लोबल एविएशन मैप' पर मजबूती से स्थापित कर रहा है। जेवर के कारण ही नोएडा और ग्रेटर नोएडा की संपत्तियों की कीमतों में उछाल आया है और विदेशी कंपनियां अपनी इकाइयां स्थापित करने में रुचि दिखा रही हैं।
विमानन विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया के कई विकसित देशों में एक ही शहर या उसके आसपास 50-60 किलोमीटर की दूरी पर कई बड़े हवाई अड्डे सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं। लंदन, न्यूयॉर्क और टोक्यो इसके बड़े उदाहरण हैं। भारत ने जेवर के माध्यम से इसी वैश्विक मॉडल को अपनाया है। हवाई क्षेत्र प्रबंधन के लिए एएआई (Airports Authority of India) ने एक नया एयरस्पेस डिजाइन तैयार किया है, जिससे दिल्ली और जेवर के बीच उड़ने वाले विमानों के रास्तों में कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। दोनों हवाई अड्डों के बीच का यह सह-अस्तित्व भारतीय उड्डयन क्षेत्र के लिए एक नया मानक स्थापित करेगा, जहाँ नियमों को जड़ता के बजाय प्रगति के चश्मे से देखा जा रहा है।
अंतिम चरण के ट्रायल रन और सुरक्षा ऑडिट के बाद अब वह समय आ गया है जब जेवर के रनवे पर विमानों के पहिए उतरेंगे। 150 किलोमीटर की दूरी की बाधा को पार करना एक साहसिक नीतिगत निर्णय था, जिसने भारत की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को देखने का नजरिया बदल दिया है। जेवर एयरपोर्ट का उद्घाटन देश की बढ़ती आकांक्षाओं का प्रतीक होगा, जहाँ विकास की आवश्यकता ने पुराने अवरोधों को गिरा दिया है। यह परियोजना न केवल उत्तर प्रदेश के लिए एक 'गेम चेंजर' साबित होगी, बल्कि वैश्विक यात्रियों के लिए भारत में प्रवेश का एक नया और आधुनिक द्वार भी खोलेगी। अब दिल्ली-एनसीआर की उड़ान दो पंखों (आईजीआई और जेवर) के सहारे और भी ऊंची होगी।
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