बाहर से आम घर और भीतर बारूद का अवैध जखीरा, भीषण विस्फोट की चपेट में आने से अब तक 8 मासूमों की मौत, कई लोग जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे

राजस्थान की राजधानी जयपुर के एक घनी आबादी वाले रिहायशी इलाके में उस समय चीख-पुकार और मातम का माहौल छा गया

Jun 10, 2026 - 13:28
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बाहर से आम घर और भीतर बारूद का अवैध जखीरा, भीषण विस्फोट की चपेट में आने से अब तक 8 मासूमों की मौत, कई लोग जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे
बाहर से आम घर और भीतर बारूद का अवैध जखीरा, भीषण विस्फोट की चपेट में आने से अब तक 8 मासूमों की मौत, कई लोग जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे
  • जयपुर में मौत का तांडव, रिहायशी इलाके में चल रही अवैध पटाखा फैक्ट्री में सिलसिलेवार धमाकों से दहला शहर, मलबे में तब्दील हुआ तीन मंजिला मकान
  • भिवाड़ी अग्निकांड के जख्म अभी भरे भी नहीं थे कि राजधानी में दोबारा दोहराया गया वही खूनी इतिहास, प्रशासन की कागजी जांच और मुस्तैदी पर उठे गंभीर सवाल

राजस्थान की राजधानी जयपुर के एक घनी आबादी वाले रिहायशी इलाके में उस समय चीख-पुकार और मातम का माहौल छा गया, जब एक साधारण से दिखने वाले मकान के भीतर संचालित हो रही अवैध पटाखा फैक्ट्री में अचानक भीषण विस्फोट हो गया। यह धमाका इतना जोरदार था कि इसकी गूंज कई किलोमीटर दूर तक सुनाई दी और आसपास के दर्जनों मकानों की खिड़कियों के कांच चकनाचूर हो गए। जिस तीन मंजिला इमारत के भीतर बारूद का यह अवैध खेल खेला जा रहा था, वह कुछ ही सेकंड में ताश के पत्तों की तरह ढहकर मलबे के ढेर में तब्दील हो गई। इस हृदयविदारक हादसे में अब तक 8 लोगों की दर्दनाक मौत हो चुकी है, जबकि मलबे से निकाले गए कई अन्य लोग गंभीर रूप से झुलसी हुई हालत में सवाई मानसिंह अस्पताल में भर्ती हैं। इस घटना ने एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्थाओं की पोल खोल कर रख दी है कि कैसे कानून को ठेंगा दिखाकर रिहायशी बस्तियों के बीच मौत का सामान तैयार किया जा रहा था।

प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय निवासियों से मिली प्रारंभिक जानकारियों के अनुसार, यह इमारत बाहर से एक बेहद सामान्य और रिहायशी मकान की तरह दिखाई देती थी, ताकि किसी को भी इसके भीतर होने वाली संदिग्ध गतिविधियों का शक न हो। लेकिन इस शांत दिखने वाले घर के कमरों के भीतर भारी मात्रा में अवैध बारूद, गंधक, पोटाश और पटाखों का निर्माण करने वाली सामग्रियां अवैध रूप से डंप की गई थीं। दोपहर के समय जब फैक्ट्री के भीतर मजदूर काम कर रहे थे, तभी अचानक किसी अज्ञात कारण से एक छोटी सी चिंगारी बारूद के ढेर पर जा गिरी। इसके बाद देखते ही देखते कुछ ही सेकंड के भीतर ऐसे सिलसिलेवार और भीषण धमाके शुरू हुए कि कंक्रीट की मजबूत दीवारें और स्लैब हवा में ताश के पत्तों की तरह बिखर गए। मलबे के नीचे दबने और आग की लपटों में घिरने के कारण वहां मौजूद श्रमिकों को संभलने या बाहर भागने का रत्ती भर भी मौका नहीं मिल सका।

इस भीषण हादसे की सूचना मिलते ही जिला प्रशासन, पुलिस महकमे के आला अधिकारी और दमकल विभाग की दर्जनों गाड़ियां राहत और बचाव कार्य के लिए मौके पर पहुँचीं। तंग गलियां और मलबे का विशाल ढेर होने के कारण शुरुआत में बचाव दल को घटनास्थल तक पहुँचने और मलबे को हटाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। नागरिक सुरक्षा (सिविल डिफेंस) और एसडीआरएफ की टीमों ने जेसीबी मशीनों की मदद से कंक्रीट के बड़े ब्लॉकों को हटाकर नीचे दबे लोगों को बाहर निकालने का काम युद्धस्तर पर शुरू किया। अब तक मलबे से 8 शवों को निकाला जा चुका है, जिनमें महिलाएं और कुछ युवा श्रमिक भी शामिल बताए जा रहे हैं। अस्पताल के बर्न वार्ड में भर्ती घायलों की स्थिति भी बेहद नाजुक बनी हुई है, जिसके कारण मृतकों का यह आंकड़ा आने वाले समय में और अधिक बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। देश के कानून के अनुसार किसी भी घनी आबादी या रिहायशी क्षेत्र में ज्वलनशील, विस्फोटक या खतरनाक रासायनिक पदार्थों का भंडारण और निर्माण पूरी तरह से प्रतिबंधित है। इसके बावजूद, स्थानीय स्तर पर निगरानी की कमी और चंद पैसों के लालच में मकान मालिक और अवैध कारोबारी मासूम जिंदगियों को दांव पर लगाकर ऐसे डेथ ट्रैप (मौत के कुएं) तैयार कर रहे हैं, जो एक झटके में पूरे हंसते-खेलते परिवारों को तबाह कर देते हैं।

राजधानी जयपुर में हुआ यह खूनी हादसा कोई पहला या नया मामला नहीं है, बल्कि इससे ठीक कुछ महीने पहले 16 फरवरी 2026 को भी राजस्थान के ही अलवर जिले के भिवाड़ी स्थित खुशखेड़ा-करोली औद्योगिक क्षेत्र में एक ऐसी ही अवैध पटाखा फैक्ट्री में विस्फोट के बाद भीषण आग लग चुकी थी। उस समय भी जांच में यह बेहद चौंकाने वाली बात सामने आई थी कि उस औद्योगिक परिसर को कागजों पर एक गारमेंट (कपड़ा) निर्माण यूनिट के नाम पर किराए पर लिया गया था, लेकिन फैक्टरी के भीतर गुपचुप तरीके से बड़े पैमाने पर अवैध पटाखों और बारूद का निर्माण किया जा रहा था। उस भिवाड़ी हादसे में भी 7 से 8 गरीब श्रमिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी और कई लोग गंभीर रूप से अपंग और झुलस गए थे। एक ही साल के भीतर राज्य में इस तरह के दूसरे बड़े हादसे ने प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली को पूरी तरह से कटघरे में खड़ा कर दिया है।

भिवाड़ी में हुए उस भयावह अग्निकांड के तुरंत बाद राज्य सरकार के कड़े निर्देशों पर जिला प्रशासन, रीको, श्रम विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और फैक्ट्री एवं बॉयलर निरीक्षण विभाग ने संयुक्त रूप से पूरे प्रदेश में एक बहुत बड़ा और व्यापक चेकिंग अभियान शुरू किया था। इस महा-निरीक्षण अभियान के दौरान राज्य भर की कुल 2,515 औद्योगिक और व्यावसायिक इकाइयों की गहन जांच की गई थी। इस जांच के बाद विभागीय अधिकारियों ने अग्नि सुरक्षा मानकों की अनदेखी, प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्रों के अभाव और श्रम व फैक्ट्री नियमों के गंभीर उल्लंघन पाए जाने पर कुल 1,058 इकाइयों को कारण बताओ नोटिस जारी किए थे और कई को सील भी किया था। लेकिन आज जयपुर में हुए इस हादसे ने यह कड़वा सच सामने ला दिया है कि वह पूरा अभियान केवल कागजी खानापूर्ति और बड़े औद्योगिक क्षेत्रों तक ही सीमित रह गया था, जिसके कारण रिहायशी बस्तियों में चल रही ये अवैध फैक्ट्रियां जांच दलों की नजरों से बची रहीं।

इस घटना के बाद स्थानीय जनता में प्रशासन और पुलिस के खिलाफ भारी आक्रोश देखा जा रहा है, क्योंकि लोगों का कहना है कि बिना स्थानीय पुलिस और बीट कांस्टेबल की मिलीभगत के इतने बड़े पैमाने पर बारूद का परिवहन और निर्माण रिहायशी इलाके में होना असंभव है। जयपुर के जिला कलेक्टर और पुलिस कमिश्नर ने संयुक्त रूप से मामले की उच्च स्तरीय प्रशासनिक जांच के आदेश दे दिए हैं और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस मकान का मालिक कौन है और किसके संरक्षण में यह अवैध कारोबार फल-फूल रहा था। पुलिस ने अवैध पटाखा फैक्ट्री के संचालक और भवन मालिक के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की संगीन धाराओं के तहत मामला दर्ज कर आरोपियों की तलाश में छापेमारी शुरू कर दी है। सरकार की तरफ से मृतकों के आश्रितों और घायलों के लिए फौरी तौर पर आर्थिक मुआवजे की घोषणा भी की जा रही है।

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