श्रद्धा और समर्पण की अनूठी मिसाल- बहू ने 90 वर्षीय दिव्यांग सास को सिर पर टोकरे में बैठाकर कराई 84 कोस की परिक्रमा

आधुनिक समाज में जहां भौतिकवादी सोच के प्रभाव के कारण संयुक्त परिवारों का ताना-बाना बिखर रहा है और आए दिन पारिवारिक

Jun 13, 2026 - 12:36
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श्रद्धा और समर्पण की अनूठी मिसाल- बहू ने 90 वर्षीय दिव्यांग सास को सिर पर टोकरे में बैठाकर कराई 84 कोस की परिक्रमा
श्रद्धा और समर्पण की अनूठी मिसाल- बहू ने 90 वर्षीय दिव्यांग सास को सिर पर टोकरे में बैठाकर कराई 84 कोस की परिक्रमा
  • रिश्तों की नई परिभाषा: आधुनिक युग में बंचारी की काजल चौधरी ने सेवा और पारिवारिक संस्कारों से पेश किया अद्भुत उदाहरण
  • सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश: बिछोर गांव पहुंचने पर मुस्लिम समुदाय ने फूल-मालाओं से किया स्वागत, मानवीय मूल्यों को दी नई ऊंचाई

आधुनिक समाज में जहां भौतिकवादी सोच के प्रभाव के कारण संयुक्त परिवारों का ताना-बाना बिखर रहा है और आए दिन पारिवारिक कलह तथा रिश्तों में बढ़ती कड़वाहट की खबरें सुर्खियां बनती हैं, वहीं ब्रजभूमि से एक ऐसी हृदयस्पर्शी और प्रेरणादायी कहानी सामने आई है जिसने मानवीय मूल्यों को एक नया जीवन दिया है। एक समर्पित बहू ने अपनी नब्बे वर्ष की बुजुर्ग और चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ सास की अंतिम इच्छा और धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए उन्हें अपने सिर पर रखे एक टोकरे में बैठाया और अत्यंत दुर्गम माने जाने वाले अस्सी कोस से अधिक लंबे परिक्रमा मार्ग की यात्रा पैदल चलकर पूरी की। सेवा, त्याग और सनातन संस्कारों की इस अनूठी मिसाल ने न केवल पारिवारिक दायित्वों के प्रति लोगों के दृष्टिकोण को बदलने का काम किया है, बल्कि इसकी गूंज अब पूरे देश में सुनाई दे रही है और हर कोई इस अद्भुत सेवा भावना को नमन कर रहा है।

इस अलौकिक और कठिन यात्रा की शुरुआत पवित्र बंचारी गांव से हुई थी, जहां की निवासी काजल चौधरी ने अपनी वयोवृद्ध सास चंदरी देवी की वर्षों पुरानी धार्मिक अभिलाषा को पूरा करने का एक ऐसा संकल्प लिया, जिसे सुनकर शुरुआत में हर कोई अचंभित रह गया था। नब्बे वर्ष की आयु पार कर चुकीं उनकी सास शारीरिक दुर्बलता और विभिन्न व्याधियों के कारण एक कदम भी चलने में सक्षम नहीं थीं, लेकिन उनके मन में ब्रज के चौरासी कोस की पावन परिक्रमा करने की तीव्र और अंतिम इच्छा हिलोरें ले रही थी। अपनी सास के मन की इस तड़प और गहरी आस्था को भांपते हुए बहू काजल ने कठिन सफर के दौरान आने वाले शारीरिक कष्टों, चिलचिलाती धूप, पथरीले रास्तों और थकावट की तनिक भी परवाह नहीं की और एक बड़े बांस के टोकरे को अपना संबल बनाकर इस ऐतिहासिक और विहंगम यात्रा का श्रीगणेश कर दिया।

चौरासी कोस की यह परिक्रमा कोई साधारण यात्रा नहीं है, बल्कि इसमें सैकड़ों किलोमीटर का लंबा मार्ग पैदल तय करना पड़ता है, जिसमें कच्चे रास्ते, ऊबड़-खाबड़ पगडंडियां और कई कठिन पड़ाव शामिल होते हैं। इस पूरे अत्यंत थका देने वाले सफर के दौरान बहू काजल चौधरी ने अपनी सास को पूरी सुरक्षा और आराम के साथ टोकरे में बिठाए रखा और अपने सिर पर उस भारी वजन को उठाकर कदम-कदम आगे बढ़ती रहीं। यात्रा के दौरान उन्होंने अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं को पूरी तरह तिलांजलि दे दी और पूरे मार्ग में एक पल के लिए भी अपनी सेवा में कमी नहीं आने दी। वे रास्ते में मिलने वाले विश्राम स्थलों पर अपनी सास के भोजन, पानी, दवाओं और विश्राम का उचित प्रबंध करती थीं और उनके शरीर की मालिश कर उनकी शारीरिक थकान को दूर करने का हरसंभव जतन करती थीं ताकि बुजुर्ग मां को कोई कष्ट न हो।

विशेष नोट: इस ऐतिहासिक यात्रा का सबसे खूबसूरत और भावुक कर देने वाला दृश्य तब देखने को मिला जब यह परिक्रमा दल बिछोर नामक गांव में प्रविष्ट हुआ। इस गांव में मुख्य रूप से निवास करने वाले मुस्लिम समाज के पुरुषों, महिलाओं और बच्चों ने जाति, धर्म और संप्रदाय की रूढ़िवादी दीवारों को पूरी तरह से ढहाते हुए इस अद्वितीय सनातन सेवा भाव का खुले दिल से इस्तकबाल किया और मानवीय एकता की एक नई इबारत लिख दी।

बिछोर गांव की सीमा में जैसे ही सिर पर टोकरा उठाए काजल चौधरी ने प्रवेश किया, वहां पहले से ही भारी संख्या में एकत्रित मुस्लिम समुदाय के लोगों ने उनके सम्मान में पलक-पावड़े बिछा दिए। ग्रामीणों ने ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक आतिथ्य के साथ इस अद्भुत बहू का जोरदार स्वागत किया, उन पर गुलाब के फूलों की पंखुड़ियों की भारी वर्षा की और उन्हें फूलों की बड़ी-बड़ी मालाएं पहनाकर उनकी हौसला अफजाही की। इस दृश्य को देखकर वहां मौजूद हर आंख नम हो गई और पूरा वातावरण आपसी भाईचारे की खुशबू से महक उठा। ग्रामीण महिलाओं ने काजल को गले लगाया और उनकी जमकर सराहना करते हुए सामूहिक रूप से यह संदेश दिया कि ऐसी बेटियां और बहुएं ही वास्तव में समाज की असली धरोहर और प्रेरणास्रोत होती हैं, जो बिखरते हुए सामाजिक ढांचे को प्रेम के धागे से पिरोने का काम करती हैं।

इस अभूतपूर्व स्वागत और सम्मान से अभिभूत होकर बहू काजल चौधरी ने अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया कि आज के इस आधुनिक युग में लोगों की यह सोच पूरी तरह से गलत है कि सास और बहू के बीच कभी मां-बेटी जैसा निश्छल रिश्ता नहीं बन सकता। उन्होंने अत्यंत विनम्रता के साथ कहा कि एक स्त्री के लिए उसकी सास भी उसकी सगी मां के समान ही वंदनीय और पूजनीय होती है, क्योंकि वह उसके पति को जन्म देने वाली और परिवार की नींव होती है। काजल ने बताया कि जब उन्होंने अपनी मां समान सास को चलने में असमर्थ लेकिन मन से ईश्वर की भक्ति में लीन देखा, तो उनके अंतर्मन ने यह गवाही दी कि भौतिक सुखों को छोड़कर उन्हें अपनी सास की इस आध्यात्मिक इच्छा को पूरा करना ही चाहिए, चाहे इसके लिए उन्हें कितनी ही शारीरिक प्रताड़ना या कठिनाई क्यों न उठानी पड़े।

काजल चौधरी ने बिछोर गांव के निवासियों द्वारा दिए गए अपार स्नेह और सम्मान के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए कहा कि इस यात्रा ने उन्हें जो आत्मिक संतुष्टि दी है, उसे शब्दों में बयान कर पाना पूरी तरह असंभव है। उन्होंने कहा कि बिछोर के लोगों ने जिस तरह से मजहब की सीमाओं से ऊपर उठकर एक बहू की सेवा भावना को सराहा है, वह सम्मान उनके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी और अमूल्य धरोहर है। आज के इस दौर में जहां छोटी-छोटी बातों पर परिवारों में बिखराव हो रहा है और बुजुर्ग माता-पिता को वृद्धाश्रमों की शरण लेनी पड़ रही है, वहां काजल का यह अनुकरणीय कृत्य केवल एक पारिवारिक जिम्मेदारी का निर्वहन मात्र नहीं है, बल्कि यह गिरते हुए मानवीय मूल्यों, नैतिक आदर्शों और सामाजिक सौहार्द को पुनर्जीवित करने का एक वैश्विक संदेश भी देता है।

परिक्रमा की पूर्णाहुति के बाद अब यह पूरा वाकया ब्रजमंडल सहित देश के विभिन्न हिस्सों में लोक-कथाओं की तरह सुनाया जा रहा है और लोग काजल की तुलना द्वापर और त्रेता युग के श्रवण कुमार जैसे पौराणिक पात्रों से कर रहे हैं। इस यात्रा की सफलता ने यह पूरी तरह प्रमाणित कर दिया है कि यदि मन में सच्चा प्रेम, निस्वार्थ सेवा की भावना और उच्च संस्कार विद्यमान हों, तो दुनिया का कोई भी कठिन से कठिन मार्ग सुगम और संक्षिप्त हो जाता है। बंचारी गांव की इस बहू ने समाज के सामने एक ऐसा अनुपम प्रतिमान स्थापित कर दिया है, जो आने वाली कई पीढ़ियों को अपने बुजुर्गों का सम्मान करने, उनकी सेवा करने और पारिवारिक ताने-बाने को मजबूत बनाए रखने के लिए निरंतर प्रेरित करता रहेगा।

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