Special: बंगाल में सत्ता परिवर्तन की आहट? एग्जिट पोल्स में भाजपा को बढ़त, क्या दीदी के किले में लगेगी सेंध?
पश्चिम बंगाल में 294 सीटों वाली विधानसभा के लिए हुए मतदान ने राज्य की राजनीतिक दिशा को एक नया आयाम दिया है। 29 अप्रैल 2026 को अंतिम
विजय लक्ष्मी सिंह जादौन
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पश्चिम बंगाल में 294 सीटों वाली विधानसभा के लिए हुए मतदान ने राज्य की राजनीतिक दिशा को एक नया आयाम दिया है। 29 अप्रैल 2026 को अंतिम चरण का मतदान संपन्न होने के बाद आए विभिन्न सर्वेक्षणों और रुझानों ने राजनीतिक विशेषज्ञों और आम जनता के बीच भारी उत्सुकता पैदा कर दी है। अधिकांश सर्वेक्षणों में भारतीय जनता पार्टी को तृणमूल कांग्रेस के मुकाबले बढ़त मिलती दिखाई दे रही है, जो राज्य में पहली बार दक्षिणपंथी विचारधारा वाली सरकार के गठन की प्रबल संभावना को जन्म दे रही है। यह चुनाव न केवल सीटों की संख्या के लिए था, बल्कि यह बंगाल की अस्मिता, विकास के मॉडल और प्रशासनिक कार्यशैली के बीच एक सीधा मुकाबला बनकर उभरा है। मतदान के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस बार पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग हुई है। चुनाव आयोग के प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार, मतदान का प्रतिशत 90% से भी ऊपर चला गया है, जो राज्य के चुनावी इतिहास में एक नया कीर्तिमान है। नदिया, हावड़ा, हुगली और पूर्व बर्धमान जैसे जिलों में मतदाताओं का उत्साह चरम पर देखा गया। राजनीतिक विश्लेषक अक्सर भारी मतदान को सत्ता विरोधी लहर या बदलाव की इच्छा के तौर पर देखते हैं। भाजपा नेतृत्व का दावा है कि यह भारी मतदान उनके पक्ष में एक स्पष्ट जनादेश है, जबकि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस का मानना है कि उनकी कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों ने अपनी सरकार को बचाने के लिए बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है।
भाजपा के अभियान में इस बार 'परिवर्तन' के साथ-साथ 'सोनार बांग्ला' के पुनरुद्धार पर विशेष जोर दिया गया। पार्टी ने स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ केंद्र सरकार की योजनाओं और भ्रष्टाचार के आरोपों को प्रमुखता से उठाया। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने 'बंगाली अस्मिता' और अपनी प्रमुख योजनाओं जैसे 'लक्ष्मी भंडार' के भरोसे अपनी सत्ता बरकरार रखने की कोशिश की है। चुनावी रण में इस बार सीधा मुकाबला भाजपा और टीएमसी के बीच ही सिमट कर रह गया है, जिसमें वाम मोर्चा और कांग्रेस जैसे दल हाशिए पर नजर आ रहे हैं। यह द्विध्रुवीय मुकाबला इतना कड़ा है कि कई क्षेत्रों में जीत-हार का अंतर बहुत ही कम रहने की उम्मीद है। 2021 के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने 210 से अधिक सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया था, जबकि भाजपा को 77 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। हालांकि, 2026 के इस महामुकाबले में समीकरण पूरी तरह बदले हुए नजर आ रहे हैं और भाजपा का वोट प्रतिशत ग्रामीण बंगाल में तेजी से बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। एग्जिट पोल्स की मानें तो भाजपा को 145 से 165 सीटों के बीच मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है, जो बहुमत के आंकड़े (148) के आसपास या उससे अधिक है। वहीं, तृणमूल कांग्रेस को 120 से 140 सीटों के बीच रहने की संभावना जताई गई है। इन अनुमानों ने राज्य के राजनीतिक तापमान को बढ़ा दिया है। भाजपा के प्रदेश नेतृत्व का कहना है कि लोग हिंसा और भ्रष्टाचार के माहौल से तंग आ चुके हैं और अब एक शांतिपूर्ण विकासोन्मुख सरकार चाहते हैं। वहीं, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी इन सर्वेक्षणों को सिरे से खारिज करते हुए इसे मनोवैज्ञानिक युद्ध करार दे रही है और अपनी जीत के प्रति आश्वस्त है।
चुनाव के दौरान हिंसा और छिटपुट झड़पों की खबरें भी सुर्खियों में रहीं। कई मतदान केंद्रों पर कार्यकर्ताओं के बीच टकराव और धांधली के आरोप-प्रत्यारोप लगे। सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के बावजूद, तनावपूर्ण स्थितियों ने प्रशासन की चुनौतियों को बढ़ा दिया था। विशेष रूप से दक्षिण बंगाल के उन क्षेत्रों में जहाँ टीएमसी का पारंपरिक गढ़ रहा है, वहां भाजपा ने इस बार कड़ी चुनौती पेश की है। चुनावी प्रक्रिया के दौरान निर्वाचन आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए, जिससे यह मुकाबला और भी अधिक कड़वाहट भरा हो गया। उत्तर बंगाल और जंगलमहल जैसे क्षेत्रों में भाजपा की पकड़ पहले से ही मजबूत रही है, लेकिन इस बार पार्टी ने कोलकाता और उसके आसपास के शहरी इलाकों में भी अपनी पैठ बढ़ाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। भाजपा के बड़े नेताओं ने अपनी रैलियों में स्थानीय संस्कृति और महापुरुषों का जिक्र कर यह साबित करने की कोशिश की कि वे बंगाल की संस्कृति के संरक्षक हैं। टीएमसी के लिए चुनौती यह रही कि उसे न केवल अपनी पुरानी सीटों को बचाना है, बल्कि सत्ता विरोधी लहर को भी मात देनी है। मतदान के बाद अब दोनों ही दल अपनी-अपनी जीत के गणित बिठाने में लगे हुए हैं।
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