आतंकियों के जनाजे में नमाज और कब्र के लिए जमीन पर पाबंदी, वो इसके लायक नहीं, चीफ इमाम का फतवा
यह फतवा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ने की कोशिशों को नकारता है। डॉ. इलियासी ने स्पष्ट किया कि आतंकवादी संगठन, जैसे जैश-ए-मो...
नई दिल्ली: ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन (AIIO) के चीफ इमाम डॉ. उमर अहमद इलियासी ने 17 मई 2025 को एक ऐतिहासिक और साहसिक फतवा जारी करते हुए घोषणा की कि भारत में मारे गए आतंकवादियों के लिए नमाज-ए-जनाजा (अंतिम संस्कार की नमाज) नहीं पढ़ी जाएगी और न ही उन्हें कब्र के लिए भारतीय जमीन दी जाएगी। यह फतवा पाहलगाम, कश्मीर में हुए आतंकी हमले के बाद आया, जिसमें निर्दोष पर्यटकों की निर्मम हत्या की गई थी। इस फतवे में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आतंकवाद इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ है और आतंकियों को इस्लामी रीति-रिवाजों के साथ सम्मान देने का कोई औचित्य नहीं है। इस कदम ने न केवल आतंकवाद के खिलाफ मजबूत संदेश दिया है, बल्कि यह धार्मिक और सामाजिक एकता को बढ़ावा देने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।
यह फतवा पाहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद जारी किया गया, जिसमें आतंकवादियों ने पर्यटकों से उनकी धार्मिक पहचान पूछकर उनकी हत्या की थी। इस हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया और धार्मिक नेताओं से एकजुट होकर आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने की मांग उठी। डॉ. उमर अहमद इलियासी ने नई दिल्ली में AIIO के इमाम हाउस में आयोजित एक शोक सभा में इस फतवे की घोषणा की। इस सभा में विभिन्न धर्मों के धार्मिक नेताओं ने हिस्सा लिया और हमले में मारे गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।
फतवे में कहा गया है, "इस्लाम शांति का मार्ग है, हिंसा का नहीं। आतंकवादी अपने क्रूर कृत्यों से इस्लाम को बदनाम करते हैं। इसलिए, देश में मारे गए किसी भी आतंकी की नमाज-ए-जनाजा कोई इमाम या काजी नहीं पढ़ेगा।" इसके साथ ही, फतवे में यह भी अपील की गई कि आतंकवादियों को कब्र के लिए "दो गज जमीन" भी नहीं दी जानी चाहिए, ताकि समाज और धर्म पूरी तरह से आतंकवाद का बहिष्कार करे।
यह फतवा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ने की कोशिशों को नकारता है। डॉ. इलियासी ने स्पष्ट किया कि आतंकवादी संगठन, जैसे जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा, जो अल्लाह के नाम का उपयोग करते हैं, इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ हैं। उन्होंने कहा, "इन संगठनों का नाम इस्लाम का गलत प्रतिनिधित्व करता है। यह पूरी तरह से गैर-इस्लामी है।" यह बयान उन आतंकी संगठनों को एक मजबूत जवाब है, जो धार्मिक आधार पर हिंसा को उचित ठहराने की कोशिश करते हैं।
इसके अलावा, यह फतवा भारत में धार्मिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने की दिशा में एक कदम है। पाहलगाम हमले के बाद आयोजित शोक सभा में हिंदू, सिख, ईसाई और अन्य धर्मों के नेताओं की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि आतंकवाद के खिलाफ सभी धर्म एकजुट हैं। डॉ. इलियासी ने कहा, "हमारा सबसे बड़ा धर्म इंसानियत है। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।"
इस फतवे को देशभर में व्यापक समर्थन मिला है। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसे आतंकवाद के खिलाफ एक साहसिक कदम बताया। एक यूजर ने लिखा, "डॉ. इलियासी का यह फतवा आतंकवाद के खिलाफ एक मजबूत संदेश है। यह दिखाता है कि इस्लाम शांति का धर्म है।" दूसरी ओर, कुछ कट्टरपंथी समूहों ने इस फतवे की आलोचना की और इसे इस्लाम के खिलाफ बताया। हालांकि, डॉ. इलियासी ने पहले भी इस तरह की आलोचनाओं का सामना किया है, विशेष रूप से 2024 में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह में भाग लेने के बाद, जब उनके खिलाफ फतवा जारी किया गया था।
उस समय, डॉ. इलियासी ने कहा था, "जो लोग मुझसे नफरत करते हैं, वे शायद पाकिस्तान चले जाएं। मैंने प्रेम और सद्भाव का संदेश दिया है।" इस बार भी, उन्होंने अपने रुख को दोहराते हुए कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां फतवों का कोई कानूनी आधार नहीं है, और वे अपने फैसले पर अडिग रहेंगे।
यह पहली बार नहीं है जब आतंकवादियों के लिए अंतिम संस्कार की नमाज पर पाबंदी लगाने का फतवा जारी किया गया है। 2017 में लंदन में हुए आतंकी हमले के बाद, ब्रिटेन के 130 से अधिक इमामों और धार्मिक नेताओं ने आतंकवादियों के लिए नमाज-ए-जनाजा पढ़ने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि आतंकवादियों के कृत्य इस्लाम की शिक्षाओं के खिलाफ हैं, और उन्हें इस्लामी रीति-रिवाजों का सम्मान नहीं दिया जाना चाहिए। इसी तरह, 2015 में बरेलवी समुदाय के मुfti सलीम नूरी ने भी आतंकवादियों के लिए नमाज-ए-जनाजा और कब्र की जगह देने के खिलाफ फतवा जारी किया था।
ये फतवे दर्शाते हैं कि विश्वभर के इस्लामी विद्वान आतंकवाद को इस्लाम से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं। डॉ. इलियासी का फतवा इस वैश्विक आंदोलन का हिस्सा है, जो आतंकवाद को धार्मिक वैधता देने की कोशिशों को नकारता है। डॉ. उमर अहमद इलियासी का यह फतवा आतंकवाद के खिलाफ एक साहसिक और प्रगतिशील कदम है। यह न केवल आतंकवादियों को इस्लामी सम्मान से वंचित करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि इस्लाम शांति और इंसानियत का धर्म है। यह फतवा भारत की धार्मिक और सामाजिक एकता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
डॉ. इलियासी को पहले भी अपने प्रगतिशील रुख के कारण विवादों का सामना करना पड़ा है। 2024 में राम मंदिर समारोह में उनकी भागीदारी के बाद, उन्हें "काफिर" घोषित करने और जान से मारने की धमकियां मिली थीं। इस बार भी, कुछ कट्टरपंथी समूहों ने उनके फतवे को इस्लाम के खिलाफ बताया। हालांकि, डॉ. इलियासी ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य देश और इंसानियत के लिए काम करना है। उन्होंने कहा, "मैं अपने देश के लिए जान दे सकता हूं, लेकिन मैं डरने वाला नहीं हूं।"
इस फतवे ने भारत में आतंकवाद के खिलाफ एक मजबूत नैतिक और धार्मिक स्टैंड लिया है। यह सरकार को आतंकवाद के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के लिए भी प्रेरित करता है। शोक सभा में धार्मिक नेताओं ने सरकार से आतंकवाद को जड़ से खत्म करने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की। यह फतवा न केवल धार्मिक समुदायों, बल्कि समाज के सभी वर्गों को आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने का संदेश देता है।
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