अलविदा जुमा पर फैली गलतफहमियां — मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा से 5 अहम सवाल।
रमज़ान का अलविदा जुमा क्या इस्लाम में क्या मायने रखता है? इस विषय पर मशहूर देवबंदी आलिम-ए-दीन मौलाना क़ारी इसहाक़
देवबंद: रमज़ान का अलविदा जुमा क्या इस्लाम में क्या मायने रखता है? इस विषय पर मशहूर देवबंदी आलिम-ए-दीन मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा से की गई बातचीत के कुछ अहम सवाल और उनके जवाब पेश हैं।
सवाल: रमज़ान के महीने में जो आख़िरी जुमे को “अलविदा जुमा” कहा जाता है, इस्लाम में इसकी असल हक़ीक़त क्या है?
जवाब: मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा बताते हैं कि रमज़ान का आख़िरी जुमे को आम तौर पर लोग “अलविदा जुमा” कहते हैं, यानी रमज़ान को विदा करने वाला जुमे का दिन। शरई तौर पर इस नाम की कोई ख़ास फज़ीलत या अलग हुक्म क़ुरआन और सही हदीस में बयान नहीं हुआ है। असल में यह एक जज़्बाती और रूहानी एहसास है कि पूरा महीना इबादत में गुज़ारने के बाद आख़िरी जुमे के ज़रिये इंसान रमज़ान को अलविदा कह रहा होता है। इसलिए मुसलमान इस दिन भी उसी तरह इबादत, तौबा और नेकियों की तरफ़ ज़्यादा ध्यान देते हैं जैसे रमज़ान के दूसरे दिनों में करते हैं।
सवाल: क्या अलविदा जुमा की नमाज़ या इबादत का कोई अलग तरीक़ा इस्लाम में बताया गया है?
जवाब: मौलाना कहते हैं कि इस्लाम में जुमे की नमाज़ का जो तरीका है वही हर जुमे के लिए है, चाहे वह रमज़ान में हो या साल के किसी और महीने में। अलविदा जुमा के नाम से कोई अलग नमाज़ या ख़ास अमल शरीअत में साबित नहीं है। इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि वे वही जुमे की नमाज़ अदा करें जो हदीस और सुन्नत से साबित है। अलबत्ता रमज़ान की बरकत की वजह से इस दिन ज़्यादा से ज़्यादा दुआ, इस्तिग़फ़ार और नेक काम करना बेहतर है।
सवाल: समाज में यह भी मशहूर है कि अलविदा जुमा की बड़ी खास फ़ज़ीलत है। इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?
जवाब: मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा का कहना है कि इस्लाम में किसी भी अमल की फ़ज़ीलत वही मानी जाएगी जो क़ुरआन और सही हदीस से साबित हो। रमज़ान का महीना बेशक बहुत बरकतों और रहमतों वाला महीना है और हर जुमे की अपनी अहमियत है, लेकिन अलविदा जुमा के बारे में कोई ऐसी खास फ़ज़ीलत नहीं मिलती जो बाकी जुमों से बिल्कुल अलग हो। इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि वे दीन को सही इल्म के साथ समझें और उन बातों को दीन का हिस्सा न समझें जो शरीअत से साबित नहीं हैं।
सवाल: फिर अलविदा जुमा के दिन मुसलमानों को क्या खास एहतमाम करना चाहिए?
जवाब: मौलाना का कहना है कि रमज़ान का आख़िरी दौर बहुत कीमती होता है। इस समय मुसलमानों को चाहिए कि वे अपनी इबादतों में और ज़्यादा दिलचस्पी लें। नमाज़ की पाबंदी करें, क़ुरआन की तिलावत बढ़ाएं, गुनाहों से तौबा करें और अल्लाह से अपनी मग़फ़िरत की दुआ करें। साथ ही ज़कात, सदक़ा और ग़रीबों की मदद जैसे कामों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लें। यही असल में रमज़ान के आख़िरी दिनों की रूह है।
सवाल: आख़िर में आप मुसलमानों को क्या पैग़ाम देना चाहेंगे?
जवाब: मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा कहते हैं कि रमज़ान सिर्फ एक महीना नहीं बल्कि इंसान की ज़िंदगी को सुधारने का एक मौका है। अगर किसी ने पूरे रमज़ान में इबादत की है तो उसे चाहिए कि रमज़ान के बाद भी अपनी ज़िंदगी में वही नेकी और परहेज़गारी बनाए रखे। अलविदा जुमा हमें यह एहसास दिलाता है कि यह बरकतों वाला महीना रुख़्सत होने वाला है, इसलिए हमें अल्लाह से दुआ करनी चाहिए कि वह हमारी इबादतों को कबूल करे और हमें पूरे साल नेक रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ दे।
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