हार की राजनीति में सुरक्षा कटौती को लेकर घमासान, तेज प्रताप यादव ने सीधे मुख्यमंत्री पर मढ़ा दोष
बिहार की राजधानी पटना के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों सुरक्षा व्यवस्था में की गई बड़ी कटौती को लेकर एक नया और बेहद तीखा
- वाई-प्लस श्रेणी की सुरक्षा हटाए जाने से नाराज पूर्व मंत्री ने उठाया चौंकाने वाला कदम, बची हुई सुरक्षा भी सरकार को लौटाई
- विपक्ष के नेताओं की सुरक्षा को लेकर प्रशासनिक घेराबंदी तेज, पटना से लेकर दिल्ली तक गरमाया सियासी माहौल
बिहार की राजधानी पटना के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों सुरक्षा व्यवस्था में की गई बड़ी कटौती को लेकर एक नया और बेहद तीखा विवाद खड़ा हो गया है। पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के बड़े बेटे तथा जनशक्ति जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष तेज प्रताप यादव ने राज्य सरकार द्वारा अपनी सुरक्षा में की गई भारी कटौती को लेकर बेहद कड़ा और आक्रामक रुख अपनाया है। राज्य के गृह विभाग की उच्च स्तरीय सुरक्षा समीक्षा समिति की सिफारिशों के बाद राज्य सरकार ने पूर्व मंत्रियों और कई वरिष्ठ राजनीतिक चेहरों की सुरक्षा श्रेणियों में बड़े बदलाव किए हैं। इसी प्रशासनिक फेरबदल के तहत तेज प्रताप यादव को पूर्व में मिली हुई वाई-प्लस (Y-Plus) श्रेणी की सुरक्षा को घटाकर बेहद सीमित कर दिया गया था। इस फैसले से भड़के पूर्व मंत्री ने न केवल सरकारी आदेश का कड़ा विरोध किया है, बल्कि राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष नेतृत्व को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा करते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं।
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब तेज प्रताप यादव राज्य से बाहर एक निजी दौरे पर रहने के बाद वापस पटना लौटे। पटना हवाई अड्डे पर कदम रखते ही जब उन्हें इस बात की आधिकारिक जानकारी मिली कि गृह विभाग के नए आदेश के तहत उनकी सुरक्षा में तैनात विशेष कमांडो और गाड़ियों के काफिले को वापस बुला लिया गया है और अब उन्हें केवल एक सामान्य सुरक्षाकर्मी ही प्रदान किया जा रहा है, तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने सरकार के इस रवैये को पूरी तरह से बदले की राजनीति से प्रेरित बताया और आरोप लगाया कि सत्ता में बैठे लोग जानबूझकर विपक्ष के नेताओं की आवाज को दबाने और उन्हें शारीरिक रूप से असुरक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। इस प्रशासनिक कार्रवाई के विरोध में उन्होंने एक बेहद चौंकाने वाला कदम उठाते हुए सरकार द्वारा दिए गए उस इकलौते सुरक्षाकर्मी को भी तत्काल प्रभाव से वापस भेज दिया और पूरी तरह से बिना किसी सरकारी सुरक्षा के रहने का फैसला किया। तेज प्रताप यादव ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल के माध्यम से राज्य के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को सीधे तौर पर टैग करते हुए एक बड़ी चेतावनी जारी की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि उनके ऊपर भविष्य में किसी भी प्रकार का शारीरिक हमला होता है या कोई अप्रिय आपराधिक घटना घटित होती है, तो उसकी पूरी और सीधी जिम्मेदारी व्यक्तिगत रूप से मुख्यमंत्री की होगी। लोकतंत्र में विपक्ष के प्रमुख चेहरों को पर्याप्त सुरक्षा घेरा प्रदान करना वर्तमान सरकार का संवैधानिक दायित्व है, जिससे वे पीछे नहीं हट सकते।
सुरक्षा के इस बड़े विवाद का संबंध केवल तेज प्रताप यादव तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह मामला उनके पूरे परिवार और पूर्व मुख्यमंत्रियों के आवास से भी गहरा जुड़ा हुआ है। इससे कुछ दिन पहले ही राज्य सरकार ने एक बड़ा आदेश जारी करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी को मिली हुई सर्वोच्च जेड-प्लस (Z-Plus) सुरक्षा श्रेणी को भी वापस ले लिया था और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस बल (बीएसएपी) के सामान्य जवानों को सौंप दी थी। इसी सिलसिले में पटना के 10 सर्कुलर रोड स्थित उनके आधिकारिक आवास से बड़ी संख्या में सुरक्षा कर्मियों के तंबू और गाड़ियां हटा दी गई थीं। इस प्रशासनिक कार्रवाई के तुरंत बाद ही पूरे परिवार ने एकजुट होकर सरकार के इस कदम की निंदा की थी और अब तेज प्रताप यादव के इस नए कदम ने इस पूरे पारिवारिक और राजनीतिक टकराव को राज्य के मुख्य विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है।
इस प्रशासनिक रस्साकशी के बीच पटना स्थित सरकारी आवासों के आवंटन और खाली कराने के नोटिस को लेकर भी तनातनी अपने चरम पर पहुंच चुकी है। राज्य के भवन निर्माण विभाग ने पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को उनके वर्तमान पद और नियमों का हवाला देते हुए 10 सर्कुलर रोड वाले बड़े बंगले को खाली करने का अल्टीमेटम जारी किया है, जिसे अब एक अन्य कैबिनेट मंत्री को आवंटित कर दिया गया है। तेज प्रताप यादव ने इस आवास विवाद पर भी सरकार को घेरते हुए कहा कि सत्ताधारी दल जनहित के मुख्य मुद्दों जैसे बेरोजगारी, महंगाई और बुनियादी विकास से आम जनता का ध्यान भटकाने के लिए केवल मकानों और सुरक्षा गार्डों की राजनीति में व्यस्त है। दूसरी तरफ, सत्ताधारी गठबंधन के बड़े नेताओं और सांसदों ने सरकार के इस कदम का पूरी तरह से बचाव किया है और दलील दी है कि किसी भी व्यक्ति की सुरक्षा का निर्धारण राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर नहीं, बल्कि सुरक्षा एजेंसियों द्वारा किए जाने वाले पेशेवर खतरे के आकलन (Threat Assessment) के आधार पर ही किया जाता है।
इस कड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बाद मुख्य विपक्षी दल के कई अन्य विधायकों और वरिष्ठ नेताओं ने भी तेज प्रताप यादव के सुर में सुर मिलाते हुए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि देश और राज्य के भीतर जो लोग बड़े जननेता हैं और लगातार जनता के बीच रहकर काम करते हैं, उन्हें सुरक्षा के मोर्चे पर कमजोर करना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाए हैं कि एक तरफ जहां बड़े-बड़े उद्योगपतियों और कुछ विशिष्ट संगठनों के पदाधिकारियों को सरकार भारी-भरकम सुरक्षा घेरा मुहैया करा रही है, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर संघर्ष करने वाले नेताओं की सुरक्षा को लगातार कम किया जा रहा है। इस तीखी बहस ने आगामी समय में होने वाले राजनीतिक गठबंधनों और चुनावी मुकाबलों के लिए एक बेहद कड़वा और हिंसक वैचारिक माहौल तैयार कर दिया है, जिसकी गूंज आगामी विधानसभा सत्र में भी सुनाई देने के पूरे आसार बने हुए हैं।
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