पुणे की अदालत में मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान सावरकर के प्रपौत्र सत्यकी सावरकर ने याचिकाओं पर दी बड़ी गवाही

महाराष्ट्र के पुणे शहर की एक स्थानीय अदालत में स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर के प्रपौत्र सत्यकी सावरकर द्वारा

Jun 16, 2026 - 12:42
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पुणे की अदालत में मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान सावरकर के प्रपौत्र सत्यकी सावरकर ने याचिकाओं पर दी बड़ी गवाही
पुणे की अदालत में मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान सावरकर के प्रपौत्र सत्यकी सावरकर ने याचिकाओं पर दी बड़ी गवाही
  • राहुल गांधी के खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे में सावरकर परिवार ने अदालत के समक्ष आधिकारिक दस्तावेजों और साक्ष्यों का किया हवाला
  • स्वतंत्रता सेनानियों की तुलना और ब्रिटिश कालीन अभिलेखों को लेकर कानूनी जिरह में ऐतिहासिक संदर्भों पर तीखी बहस जारी

महाराष्ट्र के पुणे शहर की एक स्थानीय अदालत में स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर के प्रपौत्र सत्यकी सावरकर द्वारा कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ दायर किए गए आपराधिक मानहानि के मुकदमे में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक मोड़ सामने आया है। इस मामले की नियमित अदालती कार्यवाही और जिरह के दौरान सत्यकी सावरकर ने स्वयं उपस्थित होकर अपना आधिकारिक बयान दर्ज कराया है, जिसने देश के राजनीतिक और ऐतिहासिक गलियारों में एक नई कानूनी बहस को जन्म दे दिया है। न्यायालय के समक्ष अपनी गवाही और जिरह के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रिटिश शासनकाल के दौरान सावरकर द्वारा अंडमान की सेलुलर जेल से भेजी गई याचिकाओं का पूरा प्रामाणिक रिकॉर्ड आज भी भारत सरकार के अभिलेखागारों में पूरी तरह सुरक्षित और मौजूद है। इस मामले की पृष्ठभूमि उस विवादित भाषण से जुड़ी हुई है जो विपक्षी नेता ने अपनी विदेश यात्रा के दौरान दिया था, जिसके बाद सावरकर के परिवार ने इसे अपनी पारिवारिक और सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाला बताते हुए कानूनी रास्ता अख्तियार किया था।

अदालत कक्ष के भीतर चली लंबी कानूनी जिरह के दौरान ब्रिटिश हुकूमत के समय जेलों में बंद रहे विभिन्न क्रांतिकारियों की कार्यप्रणाली, उनकी रणनीतियों और उनके द्वारा उठाए गए कदमों की तुलनात्मक समीक्षा भी देखने को मिली। सत्यकी सावरकर ने अदालत के सामने अपनी बात रखते हुए इस ऐतिहासिक तथ्य को स्वीकार किया कि विनायक दामोदर सावरकर ने अंडमान की कुख्यात सेलुलर जेल में अपनी अमानवीय और कठोर कैद के दौरान ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के समक्ष लगभग दस बार विभिन्न प्रकार की दया याचिकाएं और आवेदन दायर किए थे। इसके विपरीत, उन्होंने देश के महान क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे वीर सेनानियों का उदाहरण देते हुए कहा कि उन महान क्रांतिकारियों ने अपनी कैद के दौरान कभी भी ब्रिटिश हुकूमत के साथ किसी भी प्रकार का समझौता करने या उनके सामने झुकने से पूरी तरह से इनकार कर दिया था। अदालत में दी गई इस गवाही ने इतिहास के उन पन्नों को एक बार फिर कानूनी विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है, जिन्हें लेकर अक्सर राजनीतिक दलों के बीच तीखी बयानबाजी होती रहती है। सत्यकी सावरकर ने न्यायाधीश के समक्ष यह स्पष्ट किया कि उनके द्वारा दायर मानहानि का मुकदमा किसी ऐतिहासिक सत्य को छुपाने के लिए नहीं है, बल्कि उस मनगढ़ंत दावे के खिलाफ है जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि सावरकर ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर महात्मा गांधी पर पत्थरबाजी की थी। उन्होंने कोर्ट को बताया कि याचिकाएं दायर करना एक स्थापित कानूनी और रणनीतिक प्रक्रिया थी, जिसका रिकॉर्ड अभिलेखों में है, लेकिन हिंसा और व्यक्तिगत हमलों की झूठी कहानियां पूरी तरह से मानहानिकारक हैं।

इस पूरे कानूनी विवाद की जड़ें उस घटनाक्रम से जुड़ी हुई हैं जब कांग्रेस नेता ने ब्रिटेन की राजधानी लंदन में अनिवासी भारतीयों के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए सावरकर के संबंध में कुछ बेहद तल्ख और तीखी टिप्पणियां की थीं। उस वक्त यह दावा किया गया था कि सावरकर ने जेल से छूटने के लिए न केवल अंग्रेजों से माफी मांगी थी बल्कि वे कई अन्य गतिविधियों में भी शामिल रहे थे। इसी भाषण के प्रसारित होने के बाद सत्यकी सावरकर ने पुणे की विशेष अदालत का रुख किया और भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और 500 के तहत आपराधिक मानहानि की शिकायत दर्ज कराई थी। इस शिकायत पर संज्ञान लेते हुए अदालत ने पुलिस प्रशासन को मामले की प्राथमिक जांच करने और साक्ष्यों को एकत्रित करने का आदेश दिया था, जिसके बाद पुलिस ने अपनी जांच रिपोर्ट में प्रथम दृष्टया मानहानि के आरोपों को सही पाते हुए आरोपी को समन जारी किया था।

अदालत में चल रही इस जिरह के दौरान दोनों पक्षों के वकीलों के बीच ऐतिहासिक दस्तावेजों की व्याख्या को लेकर भी काफी तीखी बहस देखने को मिली। प्रतिवादी पक्ष के कानूनी सलाहकारों का यह तर्क रहा है कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्तियों और ऐतिहासिक चरित्रों के कार्यों की आलोचना और उन पर शोध आधारित टिप्पणियां करना अभिव्यक्ति की आजादी के अंतर्गत आता है और इसे आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। वहीं दूसरी ओर, शिकायतकर्ता के वकीलों ने दलील दी कि इतिहास की आड़ लेकर किसी भी जीवित परिवार या स्वर्गीय राष्ट्रीय नेता के चरित्र पर ऐसे लांछन नहीं लगाए जा सकते जिनका कोई ऐतिहासिक या लिखित आधार मौजूद न हो। सत्यकी सावरकर ने अपनी गवाही में बार-बार इस बात पर जोर दिया कि वे इतिहास की प्रामाणिक कड़ियों और सरकारी दस्तावेजों के अस्तित्व को कभी नहीं नकारते, बल्कि उनका विरोध केवल उस दुर्भावनापूर्ण प्रचार से है जो राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता है।

इस मामले ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान विभिन्न विचारधाराओं के बीच रहे आपसी मतभेदों और उनकी जेल रणनीतियों के विषय को एक बार फिर से अकादमिक और कानूनी चर्चा के दायरे में ला दिया है। एक तरफ जहां क्रांतिकारी आंदोलनों से जुड़े सेनानी जेल की दीवारों के भीतर भी ब्रिटिश सत्ता को सीधी चुनौती देते रहे और हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए, वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी सेनानी थे जो जेल से बाहर आकर अपनी राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों को दोबारा शुरू करने के लिए कानूनी अपीलों और याचिकाओं को एक कूटनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते थे। अदालत के भीतर इन दोनों ही दृष्टिकोणों के दस्तावेजी प्रमाणों पर बारीकी से विचार किया जा रहा है ताकि यह तय किया जा सके कि विवादित भाषण के दौरान कही गई बातें केवल एक ऐतिहासिक विमर्श का हिस्सा थीं या फिर उनके पीछे शिकायतकर्ता की सामाजिक छवि को धूमिल करने का कोई इरादा छिपा हुआ था।

सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था के लिहाज से इस हाईप्रोफाइल मुकदमे की सुनवाई के दौरान पुणे जिला अदालत परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम देखे जा रहे हैं, क्योंकि इस मामले से देश के दो बड़े राजनीतिक और वैचारिक धड़ों की भावनाएं सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए आगामी तारीख तय करते हुए दोनों पक्षों को अपने-अपने दावों के समर्थन में और अधिक लिखित दस्तावेज, ऐतिहासिक पुस्तकें और ब्रिटिश कालीन गजेटियर की प्रतियां प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। इस मामले की प्रगति पर न केवल कानूनी क्षेत्र के दिग्गजों की नजरें टिकी हुई हैं, बल्कि देश की आम जनता भी यह जानने के लिए बेहद उत्सुक है कि इतिहास के पन्नों और आधुनिक मानहानि कानून के इस अनूठे टकराव में अदालत का क्या रुख रहता है।

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