13 वर्षों की लंबी पीड़ा का अंत: वेजिटेटिव स्टेट में जी रहे युवक की लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने का आदेश।
हरीश राणा की कहानी एक सामान्य युवक की जीवन यात्रा से शुरू होती है, जो एक दुखद दुर्घटना के कारण दर्द और असहायता की लंबी
- सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: हरीश राणा को 'पैसिव युथनेसिया' की अनुमति मिली
- गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार: परिवार की भावुक अपील पर कोर्ट का मानवीय और संवेदनशील निर्णय
हरीश राणा की कहानी एक सामान्य युवक की जीवन यात्रा से शुरू होती है, जो एक दुखद दुर्घटना के कारण दर्द और असहायता की लंबी सड़क पर बदल गई। वर्ष 2013 में, जब हरीश मात्र 18 वर्ष के थे, वे चंडीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। उस समय वे एक पेइंग गेस्ट आवास में रहते थे। एक दिन, चौथी मंजिल की बालकनी से गिरने के कारण उनके सिर में गंभीर चोट लगी, जिससे उनके मस्तिष्क को स्थायी क्षति पहुंची। इस दुर्घटना के बाद हरीश कोमा में चले गए और फिर वेजिटेटिव स्टेट में पहुंच गए, जहां वे बिस्तर पर पड़े रहते हैं, लेकिन कोई सार्थक प्रतिक्रिया नहीं दे पाते। डॉक्टरों के अनुसार, उनके ब्रेनस्टेम का कार्य तो बरकरार है, लेकिन वे बोलने, देखने, सुनने या किसी को पहचानने में असमर्थ हैं। वे पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर हैं—खाने के लिए गैस्ट्रोस्टॉमी ट्यूब, सांस लेने के लिए ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब और अन्य सभी दैनिक क्रियाओं के लिए परिवार के सदस्यों की सहायता। इस स्थिति में वे पिछले 13 वर्षों से हैं, और उनके शरीर में स्थायी संकुचन (कॉन्ट्रैक्चर्स) हो चुके हैं, साथ ही बेड सोर्स जैसी समस्याएं भी उत्पन्न हो गई हैं। इस दुर्घटना ने न केवल हरीश के जीवन को बदल दिया, बल्कि उनके परिवार को भी भावनात्मक और आर्थिक रूप से तोड़ दिया। हरीश, जो कभी जिमिंग और फुटबॉल के शौकीन थे, अब एक ऐसे शरीर में कैद हैं जहां जीवन केवल कृत्रिम साधनों से चल रहा है। इस घटना ने चिकित्सा विज्ञान की सीमाओं को भी उजागर किया, जहां इलाज केवल जीवन को लंबा खींचता है, लेकिन गुणवत्ता नहीं सुधारता।
हरीश के परिवार की स्थिति बेहद दयनीय रही है। उनके पिता अशोक राणा और मां ने पिछले 13 वर्षों में अपने बेटे की देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ी। वे उसे कभी अकेला नहीं छोड़ते थे, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उनकी चिंता बढ़ती गई कि उनके बाद हरीश की देखभाल कौन करेगा। परिवार ने अपनी सारी बचत खर्च कर दी, यहां तक कि दिल्ली स्थित अपना आवास भी बेच दिया ताकि चिकित्सा व्यय वहन कर सकें। आर्थिक तंगी के अलावा भावनात्मक पीड़ा भी असहनीय थी—हर दिन हरीश को ऐसे हाल में देखना, जहां वह दर्द महसूस करता है लेकिन व्यक्त नहीं कर पाता। परिवार ने कई बार अदालतों का दरवाजा खटखटाया, लेकिन शुरुआती याचिकाएं खारिज हो गईं। अंततः, उन्होंने पैसिव युथनेसिया की अपील की, जिसमें लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की मांग की गई ताकि हरीश को गरिमापूर्ण तरीके से विदा किया जा सके। पिता अशोक ने कहा कि यह फैसला उनके लिए कठिन है, लेकिन बेटे की पीड़ा को लंबा खींचना और भी दुखदायी है। मां ने भावुक होकर बताया कि हर रात वे सोचती हैं कि क्या उनका बेटा कभी सामान्य जीवन जी पाएगा। परिवार की यह अपील केवल व्यक्तिगत नहीं थी, बल्कि उन लाखों परिवारों की आवाज थी जो ऐसी स्थितियों में फंसे हैं। इस अपील में उन्होंने जोर दिया कि हरीश का जीवन अब केवल कृत्रिम साधनों पर टिका है, और इसे जारी रखना उनकी गरिमा का अपमान है।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई एक लंबी प्रक्रिया थी, जो 2024 से शुरू हुई। परिवार ने पहले दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की, लेकिन वहां इसे खारिज कर दिया गया क्योंकि हरीश को टर्मिनली इल नहीं माना गया और वे स्वतंत्र रूप से सांस ले रहे थे। फिर, 2025 में सुप्रीम कोर्ट में दोबारा अपील की गई, जहां कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दो स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड गठित किए। प्राइमरी बोर्ड गाजियाबाद से था, जबकि सेकंडरी बोर्ड एम्स, दिल्ली से। इन बोर्डों ने हरीश की स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन किया। सुनवाई के दौरान जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने परिवार की भावनाओं को गहराई से समझा। कोर्ट ने केंद्र सरकार से भी राय मांगी, जो शुरू में पैलिएटिव केयर की सलाह दे रही थी, लेकिन बोर्ड रिपोर्ट्स के बाद सहमत हो गई। सुनवाई में कोर्ट ने जीवन और मृत्यु की जटिलताओं पर चर्चा की, और यह तय किया कि जब इलाज व्यर्थ हो, तो इसे जारी रखना अनुचित है। इस प्रक्रिया ने भारत में पैसिव युथनेसिया के लिए एक मिसाल कायम की, जहां अदालतें अब मेडिकल बोर्डों की राय पर निर्भर करती हैं। मेडिकल बोर्डों की रिपोर्ट्स इस मामले में निर्णायक साबित हुईं। गाजियाबाद के प्राइमरी बोर्ड ने पाया कि हरीश का ब्रेनस्टेम कार्यरत है, लेकिन उनका शरीर क्षीण हो चुका है, सभी अंगों में स्थायी संकुचन हैं, और रिकवरी की संभावना नगण्य है। वे क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन (सीएएनएच) पर निर्भर हैं, जो पीईजी ट्यूब के माध्यम से दिया जाता है। एम्स के सेकंडरी बोर्ड ने पुष्टि की कि हरीश पर्मानेंट वेजिटेटिव स्टेट में हैं, जहां वे नींद-जागने के चक्र में रहते हैं लेकिन कोई सार्थक इंटरैक्शन नहीं करते। बोर्ड ने कहा कि सीएएनएच जारी रखने से उनकी स्थिति में सुधार नहीं होगा, बल्कि यह केवल जीवन को लंबा खींचेगा। बोर्डों ने सुझाव दिया कि इलाज व्यर्थ है और इसे हटाना हरीश के सर्वोत्तम हित में होगा। इन रिपोर्ट्स ने कोर्ट को आधार प्रदान किया, जहां जजों ने माना कि सीएएनएच एक मेडिकल ट्रीटमेंट है, न कि बेसिक केयर, और इसे हटाया जा सकता है।
11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें हरीश की लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की अनुमति दी गई। जस्टिस परदीवाला ने फैसले की शुरुआत में शेक्सपियर का उद्धरण दिया: "टू बी ऑर नॉट टू बी", और कहा कि यह अब "राइट टू डाई" की व्याख्या के लिए इस्तेमाल हो रहा है। उन्होंने हरीश को "ब्राइट यंग मैन" बताया जो 13 वर्षों से पीड़ा सह रहा है। जस्टिस विश्वनाथन ने संस्कृत सुभाषित का जिक्र किया कि "मानसिक चिंता अंतिम संस्कार की आग से ज्यादा विनाशकारी है"। कोर्ट ने आदेश दिया कि हरीश को एम्स, दिल्ली के पैलिएटिव केयर में भर्ती किया जाए, जहां एक योजना बनाकर सीएएनएच हटाया जाएगा। फैसले में कहा गया कि यह निर्णय तर्क से परे है, यह प्रेम, हानि, चिकित्सा और दया का मिश्रण है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मौत चुनना नहीं, बल्कि जीवन को कृत्रिम रूप से लंबा न खींचना है। यह फैसला भारत में पैसिव युथनेसिया के कानूनी ढांचे को मजबूत करता है। 2018 के कॉमन कॉज जजमेंट ने पैसिव युथनेसिया को वैध बनाया, लेकिन यह पहला केस है जहां अदालत ने इसे लागू किया। पैसिव और एक्टिव युथनेसिया में फर्क स्पष्ट है—पैसिव में इलाज रोकना है, जबकि एक्टिव में जानबूझकर मौत देना, जो अवैध है। कोर्ट ने विधायी खामियों पर चिंता जताई और केंद्र को कानून बनाने की सलाह दी। यह फैसला उन मामलों के लिए मिसाल बनेगा जहां रोगी की रिकवरी असंभव है।
- पैसिव युथनेसिया क्या है?
पैसिव युथनेसिया में जीवन रक्षक इलाज रोक दिया जाता है, जैसे वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब हटाना। यह एक्टिव से अलग है, जहां घातक दवा दी जाती है। भारत में 2011 के अरुणा शानबाग केस से इसकी शुरुआत हुई, और 2018 में इसे मौलिक अधिकार का हिस्सा बनाया गया।
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