सोनू सूद की ये बात सोचने पर मजबूर कर देगी, 'दारू बेचने वाले को कहीं नहीं जाना पड़ता, दूध बेचने वाले को घर-घर जाना पड़ता है'
बॉलीवुड अभिनेता और समाजसेवी सोनू सूद ने हाल ही में एक विचारोत्तेजक बयान दिया है, जो लोगों को गहरे चिंतन में डाल रहा है। उन्होंने कहा कि
बॉलीवुड अभिनेता और समाजसेवी सोनू सूद ने हाल ही में एक विचारोत्तेजक बयान दिया है, जो लोगों को गहरे चिंतन में डाल रहा है। उन्होंने कहा कि "दारू बेचने वाले को कहीं नहीं जाना पड़ता लेकिन दूध बेचने वाले को घर-घर जाना पड़ता है"। यह वाक्य समाज में व्याप्त दोहरे मापदंडों, नैतिक मूल्यों और व्यवसायिक प्राथमिकताओं पर सीधा प्रहार करता है। सोनू सूद ने यह बात 22 फरवरी 2026 को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के माध्यम से साझा की, जिसमें उन्होंने लिखा कि समाज उन चीजों को आसानी से स्वीकार कर लेता है जो हानिकारक हैं, लेकिन उपयोगी और जीवनदायी चीजों के लिए लोग कम सम्मान दिखाते हैं। बयान के बाद सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई, जहां लोग इसे समाज की विसंगतियों का प्रतीक मान रहे हैं। सोनू सूद ने स्पष्ट किया कि उनका इरादा किसी व्यवसाय को नीचा दिखाना नहीं है, बल्कि समाज में प्राथमिकताओं के उलट-पुलट होने की ओर इशारा करना है। यह बयान उनकी पुरानी सोशल वर्क वाली छवि से अलग एक दार्शनिक और व्यंग्यात्मक अंदाज में आया है।
सोनू सूद का यह बयान भारतीय समाज में लंबे समय से चली आ रही एक विसंगति को छूता है। दारू जैसी चीजें, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं और कई बार सामाजिक समस्याओं का कारण बनती हैं, उनके विक्रेताओं को बाजार में खुलेआम जगह मिल जाती है। दुकानें मुख्य बाजारों में लगी रहती हैं, लोग खुद वहां जाते हैं और खरीदारी करते हैं। वहीं दूध, जो जीवन का आधार है, बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के लिए आवश्यक है, उसके विक्रेताओं को सुबह-सुबह घर-घर जाकर ग्राहकों को ढूंढना पड़ता है। यह विरोधाभास समाज की उन प्राथमिकताओं को दर्शाता है, जहां हानिकारक चीजों को आसानी से स्थान मिल जाता है लेकिन उपयोगी चीजों के लिए मेहनत करनी पड़ती है। सोनू सूद ने इस विरोधाभास को कुछ शब्दों में समेटकर लोगों के सामने रख दिया है। उनका बयान उन लोगों के लिए भी है जो रोजमर्रा की जिंदगी में छोटे-छोटे काम करने वालों की मेहनत को कम आंकते हैं।
यह बयान सोनू सूद की उस छवि से जुड़ता है जो उन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान बनाई थी, जब उन्होंने हजारों प्रवासी मजदूरों की मदद की और उन्हें घर पहुंचाया। उन्होंने तब भी समाज से अपील की थी कि मेहनतकश लोगों का सम्मान करें। अब यह बयान उसी सोच का विस्तार लगता है। सोनू सूद ने कई बार कहा है कि समाज को उन लोगों की कद्र करनी चाहिए जो रोजाना मेहनत करके दूसरों की जरूरतें पूरी करते हैं। दूध बेचने वाले की मेहनत सुबह चार बजे से शुरू होती है, वे ठंड में, बारिश में, गर्मी में घर-घर जाते हैं ताकि हर परिवार को ताजा दूध मिल सके। वहीं शराब की दुकानें सरकार द्वारा निर्धारित समय पर खुलती हैं और ग्राहक खुद आते हैं। यह तुलना समाज में मेहनत और आसान कमाई के बीच के फर्क को स्पष्ट करती है। सोनू सूद का कहना है कि जो लोग समाज के लिए अच्छा करते हैं, उन्हें उतना सम्मान नहीं मिलता जितना हानिकारक चीजें बेचने वालों को मिल जाता है।
बयान के बाद समाज में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आई हैं। कुछ लोगों ने इसे सही ठहराया और कहा कि समाज में वास्तव में ऐसे दोहरे मापदंड हैं। कई लोग दूध विक्रेताओं, सब्जी वालों, रेहड़ी-पटरी वालों की मेहनत की तारीफ करते हुए कहते हैं कि ये लोग सुबह उठकर काम करते हैं ताकि शहर की सुबह शुरू हो सके। वहीं कुछ लोगों ने बयान को अतिशयोक्तिपूर्ण बताया और कहा कि शराब और दूध की तुलना ठीक नहीं है क्योंकि दोनों के उद्देश्य अलग हैं। लेकिन अधिकांश लोग इस बात से सहमत दिखे कि मेहनत करने वाले को सम्मान की कमी महसूस होती है। सोनू सूद ने इस बयान से उन छोटे व्यापारियों और मेहनतकश लोगों की आवाज बुलंद की है जो रोजाना संघर्ष करते हैं लेकिन समाज में उनकी कद्र कम होती है। उनका यह बयान उन लोगों के लिए प्रेरणा बन सकता है जो मेहनत से जीते हैं।
सोनू सूद ने इस बयान को एक पोस्ट के जरिए साझा किया, जिसमें उन्होंने लिखा कि यह सोचने वाली बात है कि समाज किसे महत्व देता है। उन्होंने कहा कि दूध बेचने वाला हर घर की जरूरत पूरी करता है लेकिन उसे हर घर जाकर ग्राहक बनाना पड़ता है, जबकि दारू बेचने वाले को ग्राहक खुद ढूंढते हैं। यह वाक्य समाज की उन प्राथमिकताओं पर चोट करता है जहां हानिकारक चीजें आसानी से बिक जाती हैं लेकिन उपयोगी चीजों के लिए मेहनत करनी पड़ती है। सोनू सूद ने कई बार कहा है कि समाज को अपनी सोच बदलनी चाहिए और मेहनतकश लोगों को सम्मान देना चाहिए। उनका यह बयान उन छोटे व्यापारियों के लिए भी है जो रोजाना संघर्ष करते हैं। यह बयान लोगों को सोचने पर मजबूर करता है कि हम किस तरह की चीजों को प्राथमिकता देते हैं।
यह बयान भारतीय समाज में व्याप्त उन विसंगतियों को सामने लाता है जहां उपयोगी और हानिकारक के बीच मूल्यांकन उलट-पुलट है। दूध विक्रेता की मेहनत अनदेखी रह जाती है जबकि शराब जैसे उत्पाद आसानी से बिक जाते हैं। सोनू सूद ने इस विरोधाभास को कुछ शब्दों में पिरोकर समाज के सामने रख दिया है। उनका बयान उन लोगों के लिए भी है जो रोजाना मेहनत करते हैं लेकिन सम्मान नहीं पाते। यह समाज से अपील है कि हम अपनी प्राथमिकताओं को फिर से परखें और मेहनतकशों को वह सम्मान दें जो वे हकदार हैं।
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