Sitapur: इस होली फीकी पड़ी फगुआ की परंपरा, चौपालों से गायब हुए होलीहार। 

कभी बसंत पंचमी के साथ ही गांव-गांव में होली की आहट सुनाई देने लगती थी। ढोल, मंजीरा और झांझ की थाप पर फगुआ गीतों की ऐसी मधुर

Mar 3, 2026 - 22:26
 0  7
Sitapur: इस होली फीकी पड़ी फगुआ की परंपरा, चौपालों से गायब हुए होलीहार। 
इस होली फीकी पड़ी फगुआ की परंपरा, चौपालों से गायब हुए होलीहार। 

सीतापुर। कभी बसंत पंचमी के साथ ही गांव-गांव में होली की आहट सुनाई देने लगती थी। ढोल, मंजीरा और झांझ की थाप पर फगुआ गीतों की ऐसी मधुर धुन छिड़ती थी कि खेत-खलिहान, गलियां और चौपालें रंगों से पहले ही रस में डूब जाती थीं। होली तक हर शाम फगुआ की महफिल सजती थी, जहां होलीहार पारंपरिक गीत गाकर और रंग-भंग की तरंग में नृत्य कर पूरे गांव को आपसी मेल-जोल के सूत्र में बांध देते थे। लेकिन इस वर्ष भी गांवों की चौपालें सूनी नजर आईं। फगुआ गीतों की वह मिठास, ढोल-मंजीरे की गूंज और टोली बनाकर गाने वाले होलीहार अब दिखाई नहीं देते।

कबीरों की परंपरा भी हुई विलुप्त

पुराने समय में होली के दौरान ‘कबीरें’ गाने की विशेष परंपरा थी। होलीहार टोली बनाकर एक गांव से दूसरे गांव जाते और व्यंग्य व हास्य से भरे गीतों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करते थे। हालांकि समय के साथ इन गीतों में बढ़ती अश्लीलता के कारण समाज ने धीरे-धीरे दूरी बना ली। परिणामस्वरूप यह जीवंत लोक परंपरा अब स्मृतियों में सिमटती जा रही है।

भक्ति और मर्यादा से जुड़े थे फगुआ गीत

अवध क्षेत्र की पहचान रहे फगुआ गीतों में भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, माता सीता और हनुमान से जुड़े प्रसंगों का विशेष स्थान होता था। मर्यादा और भक्ति से ओत-प्रोत ये गीत होली के उल्लास को सांस्कृतिक गरिमा प्रदान करते थे।
इसके साथ ही भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला, ब्रज की होली और भगवान शिव से जुड़े फाग गीत भी पूरे उत्साह से गाए जाते थे। फगुआ केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि भक्ति, लोकजीवन और सामाजिक चेतना का संगम हुआ करता था।

बदलती जीवनशैली का असर

जानकारों के अनुसार पहले घर-घर में संवाद था और चौपालें सामाजिक एकता का केंद्र थीं। अब गांवों में राजनीति की बढ़ती पैठ, शराबखोरी की प्रवृत्ति और बदलती जीवनशैली ने इन परंपराओं को पीछे धकेल दिया है। जहां पहले ढोल-मंजीरे की गूंज होती थी, वहां अब तेज डीजे, फिल्मी गीत और मोबाइल स्पीकरों का शोर सुनाई देता है।

नई पीढ़ी हो रही अनजान

इस बदलाव का सबसे अधिक असर नई पीढ़ी पर पड़ा है। बच्चे और युवा पारंपरिक फगुआ गीतों से लगभग अनजान हो चुके हैं। उनके लिए होली का अर्थ केवल रंग, पानी और फिल्मी धुनों पर नृत्य तक सीमित रह गया है।लोक संस्कृति के विशेषज्ञ इसे भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरण का संकेत मानते हैं। उनका कहना है कि जब लोकगीत, लोकनृत्य और परंपराएं समाप्त होती हैं, तो समाज की आत्मा भी कमजोर पड़ने लगती है। इस होली में भी बसंत पंचमी से लेकर रंगोत्सव तक गांवों की चौपालें फगुआ के बिना सूनी रहीं। जो सांस्कृतिक उत्सव कभी पूरे माहौल को जीवंत कर देता था, वह अब बुजुर्गों की यादों और पुराने कैसेटों तक सीमित होकर रह गया है।

Also Read- यूपी की नई पहचान: 1 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा यूपी, सिंगापुर-जापान दौरे ने खोले नए द्वार।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

INA News_Admin आई.एन. ए. न्यूज़ (INA NEWS) initiate news agency भारत में सबसे तेजी से बढ़ती हुई हिंदी समाचार एजेंसी है, 2017 से एक बड़ा सफर तय करके आज आप सभी के बीच एक पहचान बना सकी है| हमारा प्रयास यही है कि अपने पाठक तक सच और सही जानकारी पहुंचाएं जिसमें सही और समय का ख़ास महत्व है।