वैश्विक कूटनीति के पटल पर अमेरिकी राष्ट्रपति का बड़ा बयान, नई दिल्ली में गूंजी 'आई लव मोदी' की आवाज।
वैश्विक राजनीति और भू-राजनीतिक समीकरणों में उस समय एक नया और बेहद शक्तिशाली मोड़ आ गया, जब संयुक्त राज्य अमेरिका
- पश्चिम एशिया के संकट और व्यापारिक तनाव के बीच अमेरिका का खुला प्रस्ताव, भारत के साथ रणनीतिक संबंधों को सौ प्रतिशत का भरोसा
- अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक समीकरणों में आया नया भूचाल, वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत-अमेरिका की अटूट साझेदारी का नया दौर
वैश्विक राजनीति और भू-राजनीतिक समीकरणों में उस समय एक नया और बेहद शक्तिशाली मोड़ आ गया, जब संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अपने गहरे लगाव और सम्मान को एक बार फिर दुनिया के सामने प्रदर्शित किया। भारत की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित एक बेहद प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय राजनयिक कार्यक्रम के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ने वाशिंगटन से सीधे एक सरप्राइज ऑडियो कॉल के जरिए अपनी आवाज दर्ज कराई। इस लाइव फोन कॉल के दौरान उन्होंने न केवल भारत के प्रति अपना गहरा प्रेम प्रदर्शित किया बल्कि स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे प्रधानमंत्री मोदी को बेहद प्यार करते हैं और उनके बहुत बड़े प्रशंसक हैं। मौजूदा दौर में जब पूरी दुनिया विभिन्न युद्धों, आर्थिक पाबंदियों और कूटनीतिक तनावों से जूझ रही है, तब अमेरिकी राष्ट्रपति का यह सार्वजनिक बयान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के बढ़ते दबदबे की कहानी बयां करता है।
यह पूरी घटना नई दिल्ली के प्रगति मैदान स्थित भारत मंडपम में आयोजित अमेरिकी दूतावास के एक भव्य कार्यक्रम के दौरान घटित हुई, जहां भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो दोनों ही मंच पर उपस्थित थे। कार्यक्रम के बीच में जब अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने अपने मोबाइल फोन को मुख्य माइक्रोफोन के पास लगाया, तो पूरा हॉल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आवाज से गूंज उठा। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि भारत और अमेरिका के संबंध इतिहास के सबसे मजबूत दौर में पहुंच चुके हैं और नई दिल्ली किसी भी वैश्विक परिस्थिति में वाशिंगटन पर सौ प्रतिशत भरोसा कर सकती है। इस अप्रत्याशित और खुले कूटनीतिक प्रस्ताव ने दुनिया भर की महाशक्तियों का ध्यान इस तरफ आकर्षित किया है, क्योंकि अमेरिका ने साफ कर दिया है कि संकट के समय भारत को किसी भी प्रकार की सहायता की आवश्यकता होगी तो वह सीधे व्हाइट हाउस से तुरंत उपलब्ध कराई जाएगी।
वर्तमान समय में यह बयान इसलिए भी पूरी दुनिया में भारी तनाव और चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि पिछले कुछ महीनों से दोनों देशों के संबंधों में व्यापारिक शुल्कों और वैश्विक रणनीतियों को लेकर कई तरह के उतार-चढ़ाव देखे जा रहे थे। अमेरिकी प्रशासन द्वारा रूसी तेल की खरीद को लेकर भारत पर बनाए जा रहे दबाव और उसके बाद लगाए गए अतिरिक्त टैरिफ के कारण दोनों देशों के बीच कूटनीतिक गलियारों में एक तरह की खामोश तल्खी देखी जा रही थी। हालांकि, पश्चिम एशिया में जारी भीषण सैन्य संकट, इजरायल-इरान संघर्ष और सामरिक महत्व के समुद्री मार्ग जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) की नाकेबंदी के बीच अमेरिका को अब यह भली-भांति समझ आ चुका है कि वैश्विक शांति और आर्थिक स्थिरता बहाल करने में भारत की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने पुराने सभी गतिरोधों को पीछे छोड़ते हुए भारत को एक खुला और बेहद उदार सहयोग का प्रस्ताव दिया है।
अमेरिकी राष्ट्रपति के इस खुले प्रस्ताव और भारत के प्रति झुकाव के पीछे गहरे कूटनीतिक और आर्थिक हित भी छिपे हुए हैं, जिन पर दोनों देश पिछले काफी समय से परदे के पीछे काम कर रहे थे। अमेरिकी राजदूत ने इस अवसर पर यह भी साझा किया कि दोनों देशों के वाणिज्य मंत्रालयों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर बातचीत अंतिम चरण में पहुंच चुकी है, जिसके अगले कुछ हफ्तों के भीतर हस्ताक्षरित होने की पूरी उम्मीद है। इसके अतिरिक्त, भारत अब अमेरिका के नेतृत्व वाले विशेष तकनीकी गठबंधन का हिस्सा बन चुका है जो दुनिया भर में सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्रिटिकल मिनरल्स (महत्वपूर्ण खनिजों) की सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला सुनिश्चित करने का काम करता है। इन तमाम मजबूत आर्थिक साझेदारियों के कारण ही वाशिंगटन अब नई दिल्ली को एशिया में अपने सबसे भरोसेमंद और मजबूत स्तंभ के रूप में देख रहा है।
इस हाई-प्रोफाइल अमेरिकी दौरे और राष्ट्रपति के लाइव संदेश ने दुनिया के अन्य शक्तिशाली देशों, विशेषकर चीन और यूरोपीय देशों के रणनीतिकारों को भी सतर्क कर दिया है। अमेरिका के नवनियुक्त विदेश मंत्री मार्को रुबियो की यह चार दिवसीय भारत यात्रा इस दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि वे वाशिंगटन में भारत के हितों की वकालत करने वाले प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं। नई दिल्ली में होने वाली आगामी 'क्वाड' संगठन के विदेश मंत्रियों की बैठक से ठीक पहले अमेरिका का यह रुख यह साफ करता है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को बनाए रखने के लिए चारों लोकतांत्रिक देश एक बेहद मजबूत सैन्य और रणनीतिक चक्रव्यूह तैयार कर रहे हैं। इस गठबंधन की मजबूती से उन विस्तारवादी ताकतों को सीधा संदेश गया है जो इस समुद्री क्षेत्र में अपना एकतरफा दबदबा बनाने का प्रयास कर रही थीं।
हालांकि, इस मधुर कूटनीति के बीच दोनों देशों के रणनीतिक गलियारों में कुछ मुद्दों को लेकर असहजता और आंतरिक चुनौतियां भी बनी हुई हैं। अमेरिकी संसद के भीतर कई कानून निर्माता इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हैं कि भारत को रूस के साथ अपने पुराने व्यापारिक और सैन्य संबंधों को बनाए रखने की खुली छूट दी जाए, जबकि अमेरिका लगातार रूस पर कड़े प्रतिबंध लागू कर रहा है। हाल ही में अमेरिकी ट्रेजरी द्वारा भारतीय जहाजों पर फंसे रूसी कच्चे तेल की खरीद के लिए दी गई तीस दिनों की विशेष छूट को लेकर भी अमेरिकी राजनीति में बहस छिड़ गई है। कुछ राजनीतिक हल्कों का मानना है कि राष्ट्रपति ट्रंप भारत को बहुत अधिक रियायतें दे रहे हैं, जिससे अमेरिकी प्रतिबंधों का वैश्विक प्रभाव कमजोर हो सकता है, लेकिन ट्रंप प्रशासन का मानना है कि भारत जैसी महाशक्ति को साथ लिए बिना एशिया में अमेरिकी हितों की रक्षा कर पाना संभव नहीं है।
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