Sambhal: 20 साल से ढोलक की थाप से गूंजते मेले: अमरोहा के कारीगर इमरान अहमद की अनोखी मेहनत।
सम्भल के ऐतिहासिक ध्वजा मेले में इस बार भी पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज सुनाई दे रही है। मेले में अमरोहा से आए कारीगर इमरान अहमद
उवैस दानिश, सम्भल
सम्भल के ऐतिहासिक ध्वजा मेले में इस बार भी पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज सुनाई दे रही है। मेले में अमरोहा से आए कारीगर इमरान अहमद अपनी हाथ से बनाई ढोलकें बेच रहे हैं। इमरान अहमद पिछले 20 साल से अधिक समय से ढोलक बनाने का काम कर रहे हैं और यह हुनर उनके पूरे परिवार की रोज़ी-रोटी का सहारा बना हुआ है।
इमरान अहमद बताते हैं कि ढोलक बनाने की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है। सबसे पहले लकड़ी को चीरकर उसका आकार तैयार किया जाता है, जिसमें लगभग एक घंटा लगता है। इसके बाद ढोलक को रंगाई और मढ़ाई के लिए अलग-अलग कारीगरों के पास भेजा जाता है। हर कारीगर अपने हुनर से इसे अंतिम रूप देता है, तब जाकर एक ढोलक पूरी तरह तैयार होती है। उन्होंने बताया कि उनके परिवार के सभी सदस्य इस काम में हाथ बंटाते हैं। बच्चे से लेकर बड़े तक हर कोई ढोलक बनाने की प्रक्रिया में शामिल रहता है। इमरान अहमद केवल सम्भल ही नहीं, बल्कि काशीपुर के चैती मेले, जल-झूलनी के मेले और मुरादाबाद समेत कई जगह लगने वाले मेलों में अपनी दुकान लगाते हैं। ढोलक की कीमत भी आकार और गुणवत्ता के हिसाब से अलग-अलग होती है। सबसे छोटी ढोलक करीब 100 रुपये से शुरू होती है, जबकि बड़ी और बेहतर गुणवत्ता वाली ढोलक 3500 से 5000 रुपये तक बिकती है। इमरान अहमद का कहना है कि हिंदू हो या मुस्लिम, हर तरह के मेलों में उनकी ढोलकों की अच्छी मांग रहती है। मेले में उनकी ढोलकों की थाप लोगों को खूब आकर्षित करती है और यही उनके परिवार की आजीविका का मुख्य साधन भी है।
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