दंपति को मौत की सजा, 50 से अधिक बच्चों के यौन शोषण का मामला, डार्क वेब पर बेचे जाते थे अश्लील वीडियो, POCSO कोर्ट का फैसला पूर्व जूनियर इंजीनियर और पत्नी दोषी, दुर्लभतम मामलों में शामिल
उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में एक विशेष POCSO कोर्ट ने 20 फरवरी 2026 को एक दंपति को मौत की सजा सुनाई। यह मामला
उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में एक विशेष POCSO कोर्ट ने 20 फरवरी 2026 को एक दंपति को मौत की सजा सुनाई। यह मामला चित्रकूट में 2020 में सामने आया था, जहां आरोपी राम भवन और उनकी पत्नी दुर्गावती ने 50 से अधिक बच्चों का यौन शोषण किया था। अदालत ने इस अपराध को दुर्लभतम श्रेणी में रखते हुए दोनों को फांसी की सजा दी। राम भवन उत्तर प्रदेश जल निगम विभाग में जूनियर इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे, जबकि दुर्गावती गृहिणी थीं। इस मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो ने की थी, जिसके आधार पर अदालत ने अपना फैसला सुनाया।
मामले की शुरुआत अक्टूबर 2020 में हुई, जब इंटरपोल से मिली जानकारी के आधार पर केंद्रीय जांच ब्यूरो ने चित्रकूट में छापेमारी की। जांच में पता चला कि आरोपी दंपति ने पिछले एक दशक से अधिक समय से बच्चों का यौन शोषण कर रहे थे। वे बच्चों को ऑनलाइन वीडियो गेम्स खेलने, पैसे और उपहार देकर लुभाते थे। इन बच्चों की उम्र 3 से 10 वर्ष के बीच थी, और सभी लड़के थे। दंपति ने इन बच्चों के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए और इन कृत्यों को वीडियो और फोटो में रिकॉर्ड किया। अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों से पता चला कि दंपति ने इन वीडियो और फोटो को डार्क वेब पर बेचा था। ये सामग्री 47 देशों में ग्राहकों तक पहुंचाई गई। जांच एजेंसी ने आरोपी के मोबाइल फोन, लैपटॉप और हार्ड ड्राइव से डिजिटल साक्ष्य बरामद किए, जिसमें हजारों की संख्या में ऐसी सामग्री थी। मेडिकल रिपोर्ट्स से पुष्टि हुई कि पीड़ित बच्चों को गंभीर शारीरिक और मानसिक चोटें पहुंची थीं। कुछ बच्चों को जननांगों में चोटों के कारण अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, जबकि कुछ में आंखों की विकृति जैसी समस्याएं विकसित हुईं।
विशेष POCSO अदालत के जज प्रदीप कुमार मिश्रा ने फैसले में कहा कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए इसे दुर्लभतम मामलों की श्रेणी में रखा गया है। अदालत ने भारतीय दंड संहिता, POCSO अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दोनों को दोषी ठहराया। इनमें बच्चों के साथ यौन शोषण, अश्लील सामग्री का उत्पादन, भंडारण और वितरण शामिल हैं। सजा के रूप में दोनों को फांसी तक लटकाने का आदेश दिया गया। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि प्रत्येक पीड़ित बच्चे को 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। यह राशि पीड़ितों के पुनर्वास और चिकित्सा के लिए उपयोग की जाएगी। मामले में कुल 33 पीड़ितों की पहचान की गई, लेकिन जांच में 50 से अधिक बच्चों के शामिल होने का अनुमान लगाया गया। कुछ पीड़ितों के बयान अदालत में दर्ज किए गए, जिनमें उन्होंने दंपति द्वारा किए गए कृत्यों का वर्णन किया।
केंद्रीय जांच ब्यूरो की जांच में पता चला कि राम भवन अपने पद का दुरुपयोग कर बच्चों तक पहुंचते थे। वे विभागीय कार्यों के दौरान आसपास के इलाकों में जाते थे और वहां से बच्चों को चुनते थे। दुर्गावती घर पर इन कृत्यों में सहयोग करती थीं। दंपति ने इन वीडियो को डार्क वेब प्लेटफॉर्म्स पर अपलोड किया, जहां से इन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेचा जाता था। जांच एजेंसी ने विदेशी ग्राहकों के साथ लेनदेन के साक्ष्य भी बरामद किए। यह मामला उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में सामने आया, जहां चित्रकूट और बांदा जिलों में घटनाएं हुईं। दंपति चित्रकूट में रहते थे, और अपराध वहीं किए गए। गिरफ्तारी के बाद दोनों को जेल में रखा गया था, और ट्रायल के दौरान उन्हें न्यायिक हिरासत में रखा गया। अदालत ने 18 फरवरी 2026 को दोनों को दोषी करार दिया, और दो दिन बाद सजा का ऐलान किया।
केंद्रीय जांच ब्यूरो ने मामले की चार्जशीट 2021 में दाखिल की थी, जिसमें विस्तृत जांच रिपोर्ट शामिल थी। जांच में पाया गया कि दंपति ने बच्चों को धमकाकर चुप रखा था। कुछ पीड़ितों को पैसे देकर या डराकर मौन रखा गया। मामले में गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई, और ट्रायल के दौरान विशेष सावधानियां बरती गईं। अदालत के फैसले में अपराध की क्रूरता पर जोर दिया गया। जज ने कहा कि पीड़ितों पर शारीरिक और मानसिक दोनों तरह का प्रभाव पड़ा है, जो जीवनभर रहेगा। दंपति के कृत्यों से समाज में भय का माहौल बना। यह मामला बच्चों की सुरक्षा और डिजिटल अपराधों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता को उजागर करता है। केंद्रीय जांच ब्यूरो ने इंटरपोल के सहयोग से मामले की जांच की, जिसमें विदेशी एजेंसियों से डेटा साझा किया गया। जांच में पाया गया कि वीडियो डार्क वेब पर विशेष प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से बेचे जाते थे, जहां गुमनामी सुनिश्चित होती है। दंपति ने तीन मोबाइल नंबरों का उपयोग कर सामग्री अपलोड की थी।
ट्रायल के दौरान विशेष लोक अभियोजक ने मामले की गंभीरता पर जोर दिया। अदालत में प्रस्तुत दस्तावेजों में पीड़ितों की मेडिकल जांच रिपोर्ट्स शामिल थीं, जो चोटों की गहराई दर्शाती हैं। कुछ पीड़ितों में स्थायी विकलांगता जैसी समस्याएं विकसित हुईं। दंपति ने अपराधों को घर पर अंजाम दिया, जहां बच्चों को बुलाया जाता था। यह फैसला POCSO अधिनियम के तहत मौत की सजा का एक उदाहरण है, जहां अपराध की गंभीरता को देखते हुए अधिकतम सजा दी गई। उत्तर प्रदेश सरकार ने पीड़ितों के लिए मुआवजा योजना के तहत राशि आवंटित करने का आदेश दिया। मामले की सुनवाई बंद कमरे में हुई, जहां केवल संबंधित पक्ष मौजूद थे। मामले में कुल 33 पीड़ितों के बयान दर्ज किए गए, लेकिन जांच एजेंसी का अनुमान है कि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है। कुछ बच्चे ऐसे थे जिन्हें दंपति ने पड़ोस या विभागीय क्षेत्रों से चुना था। अपराधों की अवधि 2010 से 2020 तक बताई गई। दंपति की गिरफ्तारी के बाद उनके घर से इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए गए, जिनमें अपराध के साक्ष्य थे।
केंद्रीय जांच ब्यूरो ने मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा, क्योंकि सामग्री विदेशों में बेची गई थी। जांच में पाया गया कि दंपति ने ग्राहकों से भुगतान क्रिप्टोकरेंसी या अन्य गुमनाम तरीकों से लिया था। यह मामला बच्चों के खिलाफ डिजिटल अपराधों की चुनौती को दर्शाता है। जांच एजेंसी की भूमिका केंद्रीय जांच ब्यूरो ने इंटरपोल के साथ मिलकर जांच की। डिजिटल साक्ष्य और अंतरराष्ट्रीय लेनदेन ट्रैक किए। पीड़ितों की पहचान और बयान दर्ज किए।अदालत ने सजा सुनाते हुए कहा कि ऐसे अपराध समाज के लिए खतरा हैं और इन पर सख्त कार्रवाई जरूरी है। दंपति को सजा के खिलाफ अपील का अधिकार है, लेकिन फिलहाल वे जेल में हैं। यह फैसला 21 फरवरी 2026 तक की अपडेट्स के अनुसार है, जिसमें कोई नया विकास नहीं हुआ है।
Also Read- Sambhal : राजेंद्र पेंसिया का निरीक्षण, तहसील-ब्लॉक से लेकर कोतवाली तक व्यवस्थाओं की परखी हकीकत
What's Your Reaction?











