लोकसभा स्पीकर ओम बिरला सदन में लौटे, अविश्वास प्रस्ताव गिरने के बाद दी सफाई।
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने 12 मार्च 2026 को सदन में वापसी की, जहां उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव के गिरने के बाद सदस्यों को संबोधित किया। बुधवार
- ओम बिरला ने आरोपों का तथ्यों से खंडन किया, निष्पक्षता पर जोर दिया
- विपक्ष के प्रस्ताव को ध्वनिमत से खारिज, संसद में तनावपूर्ण बहस के बाद सामान्य कार्यवाही
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने 12 मार्च 2026 को सदन में वापसी की, जहां उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव के गिरने के बाद सदस्यों को संबोधित किया। बुधवार 11 मार्च को विपक्ष द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को ध्वनिमत से खारिज कर दिया गया था, जिसके बाद स्पीकर सदन से अनुपस्थित रहे थे। इस प्रस्ताव का नोटिस मिलने के बाद से ही ओम बिरला लोकसभा की कार्यवाही में हिस्सा नहीं ले रहे थे, लेकिन प्रस्ताव गिरने के बाद उन्होंने सदन में लौटकर अपनी स्थिति स्पष्ट की। ओम बिरला ने सदस्यों के सामने तथ्यों का हवाला देते हुए खुद पर लगाए गए सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि उनकी भूमिका हमेशा निष्पक्ष रही है और संसद की गरिमा बनाए रखना उनका प्राथमिक दायित्व है। यह घटना संसद के बजट सत्र के दौरान हुई, जहां विपक्षी सदस्यों ने स्पीकर पर पक्षपात का आरोप लगाया था। ओम बिरला की वापसी से सदन की कार्यवाही सामान्य रूप से आगे बढ़ी, लेकिन विपक्ष के कुछ सदस्यों ने अभी भी अपनी असहमति जताई। यह पहली बार नहीं है जब स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया, लेकिन इसकी हार ने संसद में सत्ता पक्ष की मजबूती को दर्शाया।
अविश्वास प्रस्ताव की शुरुआत 10 मार्च को हुई, जब कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने 50 से अधिक विपक्षी सदस्यों के समर्थन से नोटिस दिया। प्रस्ताव में स्पीकर पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने संसद की कार्यवाही में विपक्ष को दबाया और नियमों का पालन नहीं किया। दो दिनों तक चली बहस में विपक्षी सदस्यों ने स्पीकर की निष्पक्षता पर सवाल उठाए, जबकि सत्ता पक्ष ने उनका बचाव किया। जगदंबिका पाल की अध्यक्षता में हुई बहस में अमित शाह ने विपक्ष पर संसद की गरिमा गिराने का आरोप लगाया। बहस के दौरान सदन में हंगामा हुआ, नारे लगाए गए और कई बार कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। 11 मार्च को ध्वनिमत से प्रस्ताव गिरा, जिसके बाद सदन एक दिन के लिए स्थगित हो गया। यह प्रस्ताव 1979 के बाद स्पीकर के खिलाफ पहला ऐसा प्रयास था, जो असफल रहा। विपक्ष का दावा था कि स्पीकर ने कई बिलों पर बहस को सीमित किया और विपक्षी सदस्यों को बोलने का मौका नहीं दिया। सत्ता पक्ष ने इसे राजनीतिक स्टंट बताया और कहा कि स्पीकर ने नियमों का पालन किया।
ओम बिरला की वापसी के दौरान सदन में उनका संबोधन महत्वपूर्ण रहा, जहां उन्होंने 12 घंटे से अधिक चली बहस का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि संसद में सभी सदस्यों को समान अवसर मिलते हैं और उनकी भूमिका केवल नियमों को लागू करने की है। बिरला ने तथ्यों का हवाला देते हुए बताया कि विपक्ष को पर्याप्त समय दिया गया था और कई मुद्दों पर चर्चा हुई। उन्होंने आरोपों को निराधार बताया और कहा कि ऐसे प्रस्ताव संसद की उत्पादकता को प्रभावित करते हैं। संबोधन में उन्होंने संसद की गरिमा बनाए रखने की अपील की और कहा कि सभी सदस्य मिलकर राष्ट्रहित में काम करें। यह संबोधन लगभग 30 मिनट लंबा था, जिसमें उन्होंने अपनी अनुपस्थिति के दौरान सदन की कार्यवाही का भी जिक्र किया। बिरला ने कहा कि अविश्वास प्रस्ताव के दौरान स्पीकर की अनुपस्थिति परंपरा है, ताकि निष्पक्ष बहस हो सके। उनके संबोधन से सत्ता पक्ष के सदस्यों ने मेज थपथपाकर समर्थन जताया, जबकि विपक्ष ने कुछ असहमति दिखाई।
इस घटना ने संसद में स्पीकर की भूमिका पर नई बहस छेड़ दी है। संविधान के अनुच्छेद 93 और 94 के अनुसार स्पीकर का चुनाव सदन करता है और अविश्वास प्रस्ताव से हटाया जा सकता है। लेकिन इतिहास में ऐसे प्रस्ताव दुर्लभ रहे हैं और ज्यादातर असफल हुए। ओम बिरला 2019 से स्पीकर हैं और उनके कार्यकाल में कई विवादास्पद फैसले आए, जैसे सदस्यों की निलंबन और बिलों की तेज पासिंग। विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर सत्ता पक्ष की ओर झुके रहते हैं, जबकि बिरला ने हमेशा निष्पक्षता का दावा किया। इस प्रस्ताव की हार से विपक्ष की एकता पर भी सवाल उठे, क्योंकि सभी विपक्षी दल पूरी तरह एकजुट नहीं दिखे। कुछ दलों ने समर्थन दिया लेकिन बहस में सक्रिय नहीं रहे। यह घटना बजट सत्र को प्रभावित कर सकती है, जहां महत्वपूर्ण बिल लंबित हैं।
सदन में वापसी के बाद ओम बिरला ने कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाया और लंबित मुद्दों पर चर्चा शुरू की। उन्होंने सदस्यों से अपील की कि संसद को राजनीतिक लड़ाई का मैदान न बनाएं बल्कि जनता की समस्याओं पर फोकस करें। संबोधन में उन्होंने संसद की डिजिटलीकरण और सदस्यों की ट्रेनिंग जैसे अपने योगदान का जिक्र किया। बिरला ने कहा कि उनके कार्यकाल में संसद की उत्पादकता बढ़ी है और कई ऐतिहासिक फैसले हुए। विपक्ष के कुछ सदस्यों ने उनके संबोधन पर प्रतिक्रिया दी लेकिन सदन में हंगामा नहीं हुआ। यह वापसी संसद की परंपराओं को मजबूत करती है, जहां स्पीकर की भूमिका संवेदनशील होती है। बिरला की वापसी से सदन का माहौल सामान्य हुआ और बजट चर्चा आगे बढ़ी।
इस पूरे प्रकरण से राजनीतिक दलों के बीच तनाव बढ़ा है। विपक्ष ने प्रस्ताव गिरने के बाद भी स्पीकर की निष्पक्षता पर सवाल उठाए और कहा कि ध्वनिमत से फैसला लोकतंत्र की हत्या है। सत्ता पक्ष ने विपक्ष को संसद बाधित करने का दोषी ठहराया। यह घटना 2026 के बजट सत्र की एक प्रमुख घटना बनी, जहां पहले से ही अमित शाह के बयान पर विवाद चल रहा था। स्पीकर की वापसी से सत्र के बाकी दिनों में कार्यवाही सुचारू रहने की उम्मीद है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे प्रस्ताव विपक्ष की रणनीति का हिस्सा होते हैं लेकिन सफलता दुर्लभ है।
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