Special Article: लोकानां वरदा भव- लोकमंगल की अधिष्ठात्री मां दुर्गा
भारतीय संस्कृति में मातृशक्ति की उपासना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और समर्पण की सनातन अभिव्यक्ति
लेखक: कुंवर शील वर्धन प्रताप नारायण सिंह
एडवोकेट/ पत्रकार
वरिष्ठ उपाध्यक्ष
गोरखपुर प्रेस क्लब
भारतीय संस्कृति में मातृशक्ति की उपासना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और समर्पण की सनातन अभिव्यक्ति है। नवरात्रि का पर्व इसी उदात्त चेतना का प्रतीक है, जिसमें साधक आदिशक्ति मां दुर्गा की आराधना के माध्यम से आत्मबल, विवेक, करुणा और लोककल्याण की प्रेरणा प्राप्त करता है। ‘लोकानां वरदा भव’ अर्थात समस्त लोकों का कल्याण करने वाली बनो—यह भाव देवी-उपासना के मूल उद्देश्य को उद्घाटित करता है। शक्ति की सार्थकता तभी है, जब वह समस्त सृष्टि के संरक्षण, संवर्धन और कल्याण में नियोजित हो।
मानव जीवन का प्रारंभ ही मातृस्नेह की छाया में होता है। अंधकार से प्रकाश की ओर आते ही नवजात शिशु सर्वप्रथम अपनी जननी के सान्निध्य और वात्सल्य की आकांक्षा करता है। मां की गोद में उसे सुरक्षा, शांति और अपनत्व का सहज अनुभव होता है। मातृत्व की यही अनुभूति कालांतर में मातृशक्ति की उपासना का आध्यात्मिक आधार बनती है। सृष्टि के प्राचीन अवशेषों से लेकर आधुनिक सभ्यता तक मातृदेवी की आराधना के विविध रूप दृष्टिगोचर होते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि मातृशक्ति के प्रति श्रद्धा किसी एक काल, विचारधारा अथवा संप्रदाय तक सीमित नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना की सार्वभौमिक अभिव्यक्ति है।
भारतीय परंपरा में शक्ति को सृष्टि की मूल प्रेरणा माना गया है। शक्ति के बिना शिव भी निष्क्रिय हैं। यह दार्शनिक मान्यता इस तथ्य को रेखांकित करती है कि चेतना और क्रियाशीलता, संकल्प और सिद्धि तथा ज्ञान और कर्म का समन्वय ही सृजन को संभव बनाता है। जिस प्रकार अग्नि की दाहकता, सूर्य का प्रकाश और वायु की गति उनके स्वभावगत सामर्थ्य के परिचायक हैं, उसी प्रकार जगत की समस्त क्रियाशीलता के मूल में शक्ति का ही अधिष्ठान है। यही शक्ति जब सृजन, पालन और संरक्षण का दायित्व निभाती है, तब वह मातृरूप में पूजित होती है; जब अन्याय और अत्याचार का प्रतिरोध करती है, तब दुर्गा और चंडी के रूप में प्रतिष्ठित होती है।
भारतीय उपमहाद्वीप में मातृदेवी की उपासना के प्राचीन पुरातात्त्विक साक्ष्य हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सभ्यताओं से संबंधित प्राप्त मूर्तियों एवं अन्य अवशेषों में देखे जाते हैं। वैदिक वाङ्मय में भी देवी-तत्त्व की महिमा का विशद निरूपण मिलता है। ऋग्वेद का देवीसूक्त नारी-शक्ति की विराट सत्ता का उद्घोष करता है। इसमें वाक्-अंबृणी ऋषिका के माध्यम से देवी स्वयं को समस्त देवशक्तियों तथा जगत की क्रियाशीलता का आधार घोषित करती हैं। ऋग्वेद का रात्रिसूक्त भी देवी की महिमा का स्तवन करता है। इन वैदिक अभिव्यक्तियों में शक्ति को केवल किसी अलौकिक सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि विश्वव्यापी चेतना और जीवन की आधारभूत ऊर्जा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।
देवी-महिमा के इसी आध्यात्मिक प्रवाह का अत्यंत प्रभावशाली स्वरूप ‘श्रीदुर्गासप्तशती’ में दृष्टिगत होता है। मार्कण्डेय पुराण का अंग यह ग्रंथ तेरह अध्यायों और सात सौ मंत्रात्मक श्लोकों के कारण ‘सप्तशती’ कहलाता है। इसे ‘देवीमाहात्म्य’ तथा ‘चंडीपाठ’ के नाम से भी जाना जाता है। इसमें महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के माध्यम से देवी के विविध स्वरूपों तथा उनके द्वारा संपन्न दैवी कार्यों का वर्णन मिलता है। ग्रंथ का प्रचलित पाठ तीन चरितों में विभक्त है। इसकी स्तुतियों में भक्त की विनम्रता, आत्मसमर्पण, निर्भयता और लोककल्याण की कामना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
दुर्गासप्तशती की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें देवी को केवल भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली आराध्या के रूप में सीमित नहीं किया गया, बल्कि उन्हें समस्त प्राणियों में विद्यमान चेतना, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, शक्ति, श्रद्धा, शांति और मातृभाव के रूप में भी स्वीकार किया गया है। ‘या देवी सर्वभूतेषु’ से आरंभ होने वाली स्तुति इसी व्यापक दृष्टि की परिचायक है। यह मान्यता मनुष्य को प्रत्येक जीव में दैवी अंश देखने की प्रेरणा देती है। जब समस्त प्राणियों में एक ही चेतना का दर्शन होने लगता है, तब भेदभाव, अहंकार, घृणा और शोषण के लिए स्थान स्वतः संकुचित हो जाता है। इस प्रकार देवी-उपासना व्यक्ति को आत्मकल्याण के साथ-साथ सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध भी कराती है।
दुर्गासप्तशती का मध्यम चरित महिषासुरमर्दिनी के रूप में देवी की विजय का आख्यान प्रस्तुत करता है। महिषासुर केवल एक पौराणिक असुर का नाम नहीं, बल्कि अहंकार, उन्माद, अनियंत्रित महत्त्वाकांक्षा और दुराचार की उस प्रवृत्ति का भी प्रतीक माना जा सकता है, जो शक्ति के मद में मर्यादाओं को भंग करती है। देवताओं की संयुक्त शक्तियों से प्रकट हुई भगवती दुर्गा का विजय-आख्यान इस सत्य को प्रतिष्ठित करता है कि जब सद्गुण संगठित होते हैं, तब दुष्प्रवृत्तियों का प्रतिरोध संभव होता है। यह प्रसंग वर्तमान समाज के लिए भी प्रासंगिक है। अन्याय, भ्रष्टाचार, हिंसा, नारी-असमानता और सामाजिक विद्वेष जैसी चुनौतियों से संघर्ष करने के लिए केवल सदिच्छा पर्याप्त नहीं; इसके लिए साहस, विवेक, संगठन और सतत कर्मशीलता भी आवश्यक हैं।
नवरात्रि का आध्यात्मिक संदेश बाह्य आडंबरों से आगे बढ़कर अंतःकरण के परिष्कार की अपेक्षा करता है। उपवास का वास्तविक आशय केवल आहार-संयम नहीं, बल्कि इंद्रियों और इच्छाओं पर विवेकपूर्ण नियंत्रण भी है। पूजा का प्रयोजन केवल पुष्प, धूप और दीप अर्पित करना नहीं, बल्कि अपने भीतर करुणा, सत्यनिष्ठा, सहिष्णुता और परोपकार के भावों का विकास करना है। कन्या-पूजन तभी सार्थक होगा, जब समाज में प्रत्येक बालिका को सम्मान, सुरक्षा, शिक्षा और समान अवसर प्राप्त हों। देवी के सम्मुख शीश झुकाने की सार्थकता इसी में है कि मनुष्य अपने व्यवहार में नारी की गरिमा को सर्वोच्च स्थान दे।
मां दुर्गा की आराधना हमें यह भी सिखाती है कि शक्ति और करुणा परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हैं। करुणा से रहित शक्ति अत्याचार का कारण बन सकती है और शक्ति से रहित करुणा अन्याय के सामने असहाय हो सकती है। अतः आदर्श जीवन वही है, जिसमें सामर्थ्य का उपयोग दुर्बल की रक्षा, पीड़ित की सहायता और वंचित को न्याय दिलाने के लिए किया जाए। यही देवी के लोकमंगलकारी स्वरूप की वास्तविक अनुभूति है।
आज जब मनुष्य भौतिक उपलब्धियों के बीच मानसिक अशांति, सामाजिक तनाव और नैतिक दुविधाओं से जूझ रहा है, तब नवरात्रि का पर्व आत्मचिंतन और आत्मजागरण का अवसर प्रदान करता है। मां दुर्गा की उपासना हमें स्मरण कराती है कि वास्तविक विजय बाहरी शत्रुओं पर अधिकार प्राप्त करने में ही नहीं, बल्कि अपने भीतर स्थित काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और अहंकार जैसी प्रवृत्तियों पर नियंत्रण स्थापित करने में भी निहित है। आत्मबल से संपन्न व्यक्ति ही परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन समुचित ढंग से कर सकता है।
वस्तुतः ‘लोकानां वरदा भव’ केवल देवी से की जाने वाली प्रार्थना नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य के लिए एक नैतिक संकल्प भी है। जिस शक्ति की हम आराधना करते हैं, उसी शक्ति के अनुरूप अपने आचरण को ढालना ही सच्ची साधना है। नवरात्रि तभी सार्थक होगी, जब मंदिरों में प्रज्वलित दीपों का प्रकाश हमारे अंतर्मन तक पहुंचे, मंत्रों की पवित्र ध्वनि हमारे व्यवहार में मधुरता घोले और देवी के प्रति हमारी श्रद्धा लोकसेवा में परिणत हो। मां दुर्गा के श्रीचरणों में यही प्रार्थना है कि उनकी कृपा से समस्त लोकों में शांति, सद्भाव, समृद्धि और धर्मनिष्ठा का प्रसार हो तथा प्रत्येक हृदय में करुणा, साहस और मानवता का दीप सदैव प्रज्वलित रहे।
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