Lucknow : राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष बबिता सिंह चौहान ने पारिवारिक विवाद निवारण क्लिनिक की सराहना की

एफडीआरसी का मुख्य उद्देश्य पारिवारिक कलह, घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न और वैवाहिक विवादों को दंडात्मक कार्रवाई के बजाय संवेदनशील परामर्श, मध्यस्थता और आपसी सं

Jan 6, 2026 - 23:12
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Lucknow : राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष बबिता सिंह चौहान ने पारिवारिक विवाद निवारण क्लिनिक की सराहना की
Lucknow : राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष बबिता सिंह चौहान ने पारिवारिक विवाद निवारण क्लिनिक की सराहना की

पारिवारिक विवाद निवारण क्लिनिक- न्याय, सहानुभूति और संवाद से सामाजिक सौहार्द की दिशा में सराहनीय पहल

उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष बबिता सिंह चौहान ने उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा संचालित पारिवारिक विवाद निवारण क्लिनिक (एफडीआरसी) को महिलाओं, बच्चों और परिवार की गरिमा तथा अधिकारों की रक्षा के लिए एक प्रभावी, जन-केंद्रित और दूरदर्शी पहल बताया है।

एफडीआरसी का मुख्य उद्देश्य पारिवारिक कलह, घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न और वैवाहिक विवादों को दंडात्मक कार्रवाई के बजाय संवेदनशील परामर्श, मध्यस्थता और आपसी संवाद से सुलझाना है। इससे पीड़ितों को लंबी कानूनी प्रक्रिया, सामाजिक कलंक और मानसिक उत्पीड़न से बचाया जा सके। यह पहल कानून और करुणा के बीच संतुलन बनाकर न्याय को अधिक मानवीय बनाती है।

यह प्रयोगात्मक पहल वर्ष 2019 में गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) पुलिस और शारदा विश्वविद्यालय के बीच एमओयू से शुरू हुई। 10 जुलाई 2020 को औपचारिक रूप से शुरू होने के बाद यह एक सफल मॉडल बन गई। इससे न्यायालयों और पुलिस पर बढ़ते बोझ में कमी आई है। बाद में प्रदेश के विभिन्न जिलों में परिवार परामर्श केंद्र और एफडीआरसी इकाइयां स्थापित की गईं, जिन्होंने सैकड़ों मामलों में सुलह, पुनर्मिलन और शांतिपूर्ण समाधान सुनिश्चित किया।

इन क्लिनिकों में पुलिस अधिकारी, प्रशिक्षित काउंसलर, सामाजिक कार्यकर्ता और जरूरत पड़ने पर विधिक विशेषज्ञों की बहु-विषयक टीम काम करती है। इससे मामलों का निष्पक्ष, गोपनीय और दबाव-मुक्त समाधान संभव होता है। विशेष रूप से महिला पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति से महिलाओं को अपनी बात निर्भीकता से रखने का सुरक्षित माहौल मिलता है।

बबिता सिंह चौहान ने स्पष्ट किया कि जहां परामर्श या मध्यस्थता से समाधान संभव नहीं होता या गंभीर अपराध के तथ्य सामने आते हैं, वहां कानून के अनुसार कठोर और त्वरित कार्रवाई की जाती है। महिला आयोग इस बात पर सतर्क है कि किसी भी स्थिति में महिलाओं, बच्चों और कमजोर वर्गों के अधिकारों से समझौता न हो।

उन्होंने चुनौतियों का भी जिक्र किया। प्रशिक्षित काउंसलरों की कमी, सामाजिक दबाव और जागरूकता का अभाव अभी बाकी हैं। इनसे निपटने के लिए पुलिस, महिला आयोग, एनजीओ, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों के बीच समन्वित सहयोग, निरंतर प्रशिक्षण, जन-जागरूकता अभियान तथा मनोवैज्ञानिक और कानूनी सहायता बढ़ाने की जरूरत है।

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