नैमिषारण्य: भागवत कथा केवल सुनने की नहीं, आचरण में ढालने की विद्या है - धनश्री लेले
नैमिषारण्य के कालीपीठ में आयोजित भागवत महाकुंभ में कथा वाचिका धनश्री लेले ने श्रीकृष्ण-सुदामा प्रसंग और डॉ. चारूदत्त आफले ने श्रीराम चरित पर प्रेरक विचार रखे।
Report : संदीप चौरसिया INA NEWS सीतापुर
श्रीमद्भागवत कथा सुनने का नहीं, जीवन में उतारने का माध्यम: धनश्री लेले
उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में स्थित प्रसिद्ध तपोस्थली नैमिषारण्य के कालीपीठ संस्थान में श्रीमद्भागवत महाकुंभ का आयोजन पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ संपन्न हो रहा है। इस भव्य आध्यात्मिक अनुष्ठान में एक ओर जहां मराठी भाषा में श्रीमद्भागवत कथा का प्रवाह हो रहा है, वहीं दूसरी ओर हिंदी भाषा में श्रीराम कथा की अमृतवर्षा श्रद्धालुओं को भावविभोर कर रही है। आयोजन के मुख्य संकल्पी कालीपीठाधीश्वर गोपाल शास्त्री के सानिध्य में देश भर से आए भक्त इस ज्ञान गंगा में डुबकी लगा रहे हैं।
आयोजन के दौरान मुंबई से पधारीं प्रख्यात कथा वाचिका धनश्री लेले ने श्रीमद्भागवत कथा के गूढ़ रहस्य, राजा परीक्षित के उद्धार और भगवान श्रीकृष्ण व सुदामा की अमर मित्रता के प्रसंग को बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि सच्ची मित्रता सांसारिक वैभव, धन-दौलत, सामाजिक पद या प्रतिष्ठा की मोहताज नहीं होती। भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारिका का अधिपति होने के बाद भी अपने दरिद्र बालसखा सुदामा को देखते ही गले से लगा लिया और अश्रु बहाते हुए उनका आदर-सत्कार किया। सुदामा संकोचवश पोटली में बंधा मुट्ठीभर साधारण अन्न छिपा रहे थे, किंतु प्रभु ने उस तुच्छ भेंट के पीछे छिपे अपार स्नेह और निष्काम समर्पण को पहचानकर उसे सहर्ष स्वीकार किया। उन्होंने समझाया कि ईश्वर बाहरी वस्तुओं या आडंबर के भूखे नहीं हैं, वे केवल भक्त के निश्छल भाव को देखते हैं।

कथा वाचक ने मानव जीवन के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि सांसारिक जीवन पूरी तरह अनिश्चित है, इसलिए व्यक्ति को निरंतर सत्कर्म, सत्य और भक्ति की राह पर अग्रसर रहना चाहिए। श्रीमद्भागवत केवल कानों से सुनने का विषय नहीं है, बल्कि इसे आचरण में धारण करना ही इसकी असली सार्थकता है। कथा हमें दुर्गुणों का त्याग कर अच्छाइयों को अंगीकार करने, सत्संग से जुड़ने और सनातन संस्कृति के उच्च आदर्शों का पालन करने की सीख देती है। परिवार में वरिष्ठ जनों का आदर करना, उन्हें नमन करना और मस्तक पर तिलक धारण कर अपनी संस्कृति के प्रति निष्ठा प्रकट करना जीवन के आधारभूत मूल्यों में शामिल होना चाहिए।
धार्मिक अनुष्ठान के दूसरे सत्र में डॉ. चारूदत्त आफले ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन आदर्शों पर केंद्रित कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि परमात्मा अपने प्रिय भक्तों की कठिन परीक्षाएं अवश्य लेते हैं, किंतु अंत में अपनी असीम कृपा की वर्षा भी उन्हीं पर करते हैं। श्रीराम का संपूर्ण चरित्र सत्य, त्याग, पितृभक्ति और धर्मरक्षा का अनुपम उदाहरण है। जीवन के संघर्ष व्यक्ति को टूट जाने के लिए नहीं, बल्कि परिपक्व बनाने और नया अनुभव देने के लिए आते हैं। जब मनुष्य सांसारिक बंधनों और झूठे आश्रयों से मुक्त होकर संपूर्ण समर्पण के साथ प्रभु की शरण में पहुंचता है, तब ईश्वर बिना किसी विलंब के अपने भक्त की पुकार सुनते हैं। गजेंद्र मोक्ष प्रसंग की व्याख्या के साथ कथा का यह सत्र भक्ति रस में लीन होकर संपन्न हुआ।
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