Special Article: नाना पाटेकर - एक अप्रतिम अभिनेता की जीवन के रंगमंच से विदाई
भारतीय सिनेमा मंच के क्रांतिकारी नायक नाना पाटेकर की जीवन के रंगमंच से विदाई स्तब्ध करने वाली है। इसका समाचार आते ही
लेखक- मृत्युंजय दीक्षित
भारतीय सिनेमा मंच के क्रांतिकारी नायक नाना पाटेकर की जीवन के रंगमंच से विदाई स्तब्ध करने वाली है। इसका समाचार आते ही सिनेमा जगत सहित सिने प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई। नाना पाटेकर का वास्तविक नाम विश्वनाथ पाटेकर था किंतु उनकी बहिन उन्हें नाना नाम से पुकारती थी और वे दर्शकों के बीच इसी नाम से लोकप्रिय हुए।
प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी ने नाना को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि नाना पाटेकर का जीवन तिरंगे की आन बान और शान के लिए समर्पित रहा। वो बंधनो में नहीं रहे वरन एक परिंदे की तरह फिल्मों के आसमान में उड़े।नाना पाटेकर ने समाज में व्याप्त व्यवस्था पर अपनी फिल्मों के माध्यम से करारा प्रहार किया। वह एक ऐसे क्रांतिवीर थे जिन्होंने बुराइयों के विरोध में काम किया। उनकी वाणी जितनी तेज थी उनकी खामोशी उतनी ही प्रभावी थी। वह देश विरोधियों पर निरंतर अंकुश के समर्थक थे।
नाना पाटेकर हिंदी सिनेमा से भी पहले मराठी रंगमंच के नायक बन गए थे जिसके कारण भी सिनेमा जगत में उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी थी। नाना पाटेकर का अभिनय देखने के लिए लाइन लग जाती थी। फिल्मों में उनके संवाद दर्शकों को छू जाते थे व सोचने के लिए मजबूर भी कर देते थे। नाना ने अपनी प्रतिभा से सिनेमा जगत में एक अलग पहचान बनाई। नाना ने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत 1978 में फिल्म गमन से की थी। इसके बाद सिंहासन, अंकुश, प्रतिघात, और सलाम बाम्बे जैसी लोकप्रिय फिल्में दीं। वर्ष 1992 में उन्हें अंगार फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। 1994 में क्रांतिवीर के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार और फिल्म फेयर मिला। नाना ने परिंदा, तिरंगा, अग्निसाक्षी, खामोशीःद म्यूजिकल, वेलकम, अपहरण और राजनीति जैसी फिल्मों में भी काम किया। उन्होंने सभी तरह की भूमिकाएँ एक जैसी सहजता से निभाईं। नाना हिंदी सिनेमा के नायक ही नहीं अपितु निर्देशक और लेखक भी बने। वर्ष 1991 में फिल्म ”प्रहार:द फाइनल अटैक“ से उन्होंने निर्देशन में कदम रखा।
नाना पाटेकर को 2013 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 2013 में ही महाराष्ट्र सरकार द्वारा राज कपूर विशेष योगदान पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पाटेकर एक मात्र ऐसे अभिनेता हैं जिन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता ,सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता नेता और सर्वश्रेष्ठ खलनायक की श्रेणियों में फिल्मफेयर पुरस्कार जीते।नाना पाटेकर को 2015 व 2017 में मराठी फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता श्रेणी में फिल्मफेयर मराठी पुरस्कार मिला। उन्हें 2004 में बंगाल फिल्म पत्रकार संगठन का पुरस्कार भी मिला।
नाना पाटेकर सामाजिक जीवन में भी सक्रिय रहते थे।वह किसानों के मसीहा कहे जाते थे। नाना आतंकवाद के खिलाफ अत्यंत कड़ा रुख रखते थे। पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद जब भारत और पाकिस्तान के मध्य एशिया कप में होने वाले मैच का नाना पाटेकर ने आगे बढ़कर कड़ा विरोध करते हुए कहा था कि मुझे लगता है कि जिन्होंने हमारे लोगों का खून बहाया है तो हम उनके साथ क्यों खेलें?
एक बार नाना ने एक किस्सा सुनाते हुए बताया था कि उनके पास कार नहीं थी और उन्होंने कार खरीदने के लिए पैसे एकत्र किए थे। एक दिन उन्होंने समाचार में देखा कि सूखा व अकाल के कारण किसान आत्महत्या कर रहे हैं तब उन्होंने कार खरीदने का इरादा त्याग दिया और वह पीड़ित परिवार के घर पहुंच गए तथा कार खरीदने के लिए जो रुपए एकत्र किए थे वह किसानों के परिजनों को दे आए। बाद में उन्होंने किसानों की सहायता के लिए एक नाम फाडंडेशन की स्थापना भी की। उनकी संस्था आज भी किसानों की मदद कर रही है।ये संस्था सूखाग्रस्त क्षेत्रों में बेसहारा और जरूरतमंद किसानों की मदद करती है।संस्था गांवों में तालाबों को गहरा करने, नहरों की सफाई करनेऔर नदियों को पुनर्जीवित करने का काम करती है। वह किसानों के मुद्दों पर खूब चर्चा करते थे।
नाना पाटेकर चकाचौंध से दूर सादगी भरा जीवन व्यतीत करना पसंद करते थे। उनके फार्म हाउस में 12गाय दो बैल और पांच कुत्ते थे। उनके फार्म हाउस में खेती भी होती है। नाना पाटेकर एक सच्चे राष्ट्रभक्त थे और वह कारगिल युद्ध के समय वह 60 दिनों तक जवानों के साथ श्रीनगर, द्रास और लेह जैसे मुश्किल इलाकों में रहे थे । सेना के साथ गहरा जुड़ाव होने के कारण वह 1980 के दशक में टेरीटोरियल आर्मी में भी भर्ती हुए थे। भारत का सिने जगत नाना जैसे बहु आयामी व्यक्तित्व को सदा स्मरण रखेगा।
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