Special Article: पिता चले जाते हैं, संस्कारों की रोशनी रह जाती है
सादा जीवन, उच्च विचार की अमिट विरासत दे गए मेरे पिताश्री राजर्षि लाल रामेन्द्र प्रताप नारायण सिंह ‘लाल साहब’
लेखक:- कुंवर शील वर्धन प्रताप नारायण सिंह
एडवोकेट/ पत्रकार
वरिष्ठ उपाध्यक्ष
प्रेस क्लब, गोरखपुर
भारतीय संस्कृति में पितृपक्ष केवल एक धार्मिक अनुष्ठान की अवधि नहीं है। यह उन अदृश्य ऋणों को स्मरण करने का पुण्य अवसर है, जिनसे मनुष्य का जीवन संस्कारित और सार्थक होता है। भारतीय मनीषा ने देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण की अवधारणा के माध्यम से मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़े रखा है। पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध की परंपरा इसी कृतज्ञता-बोध की जीवन्त अभिव्यक्ति है। इन दिनों जब स्मृतियों का आलोक अंतर्मन को आलोकित करता है, मेरे पूज्य पिताश्री राजर्षि लाल रामेन्द्र प्रताप नारायण सिंह ‘लालसाहब’ (भौवापार) की पुण्यतिथि पर उनका स्मरण मेरे लिए किसी तीर्थ-स्नान से कम नहीं है। उनकी स्मृति आते ही मन श्रद्धा, वात्सल्य, कृतज्ञता और भावुकता की अनगिन धाराओं में भीग उठता है।
पिताश्री मेरे लिए केवल जन्मदाता नहीं थे। वे मेरे जीवन के प्रथम गुरु, संस्कारों के कुशल शिल्पी, चिंतन के मार्गदर्शक और जीवन-पथ के प्रकाश-स्तंभ थे। माता-पिता की छत्रछाया में मनुष्य संसार को देखना सीखता है, किंतु पिता अपने आचरण से उसे यह सिखाते हैं कि संसार में रहते हुए मनुष्य कैसे बना रहा जाए। मेरे पिताश्री ने भी मुझे यही पाठ पढ़ाया—जीवन कितना भी ऊंचा क्यों न हो जाए, मनुष्य को अपनी जड़ों, अपने संस्कारों और अपनी विनम्रता से कभी विमुख नहीं होना चाहिए।
श्रीनेत राजवंश सतासी के प्रतिष्ठित परिवार में जन्म लेने के बावजूद उनका जीवन राजसी वैभव के प्रदर्शन से कोसों दूर रहा। उनके व्यक्तित्व का वास्तविक वैभव उनके विचारों की ऊंचाई और व्यवहार की सहजता में निहित था। ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ उनके लिए केवल कहने की बात नहीं थी; यह उनके जीवन का मूल मंत्र और व्यक्तित्व की पहचान थी। उन्होंने अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि कुलीनता केवल वंशपरंपरा से प्राप्त नहीं होती, बल्कि वह मनुष्य के चरित्र, सदाचार, उदारता और लोकव्यवहार से प्रतिष्ठित होती है।
उनके जीवन में भारतीय संस्कारों की गहरी जड़ें थीं। परंपरा के प्रति सम्मान और आधुनिक विचारों के प्रति उदारता—इन दोनों का सुंदर समन्वय उनके व्यक्तित्व में दिखाई देता था। वे मानते थे कि परंपरा वह दीपशिखा है, जो अतीत से वर्तमान तक प्रकाश पहुंचाती है; किंतु उस प्रकाश का उपयोग भविष्य को आलोकित करने के लिए होना चाहिए। यही कारण था कि उनका जीवन रूढ़ियों से नहीं, बल्कि संस्कारों और विवेक से संचालित होता था।
पिताश्री अत्यंत अध्ययनशील, जिज्ञासु और अन्वेषी प्रवृत्ति के विद्वान थे। पुस्तकों से उनका संबंध केवल ज्ञान अर्जित करने तक सीमित नहीं था। वे साहित्य को जीवन का दर्पण मानते थे और शब्दों में मनुष्य की संवेदना तथा समाज की आत्मा को खोजते थे। साहित्य के प्रति उनकी अनुरक्ति अत्यंत गहरी थी। वे कवि और साहित्यकार होने के साथ-साथ सुंदर एवं सारगर्भित लेखों तथा कविताओं की रचना भी करते थे। उनके चिंतन में गंभीरता थी, दृष्टि में व्यापकता थी और अभिव्यक्ति में संवेदना का स्पर्श था।
मेरी अपनी साहित्यिक अभिरुचि और लेखन के प्रति अनुराग भी उनके संस्कारों की ही देन है। जब कभी शब्दों के संसार में उतरता हूं, तब कहीं न कहीं उनकी स्मृति मेरे साथ चलती है। लगता है जैसे बचपन और अध्ययनकाल के वे दिन फिर लौट आए हों, जब वे किसी पुस्तक के पन्नों के साथ जीवन के भी पन्ने खोलकर समझाया करते थे। उन्होंने मुझे बताया कि शिक्षा केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने का साधन नहीं, बल्कि व्यक्तित्व को परिष्कृत करने की साधना है।
मेरे अध्ययनकाल में उन्होंने पिता के साथ-साथ गुरु की भूमिका भी निभाई। उन्होंने सिखाया कि जीवन में परिस्थितियां सदैव मनुष्य के अनुकूल नहीं होतीं, इसलिए परिस्थितियों से अधिक आवश्यक है—अपने भीतर धैर्य, विवेक और आत्मबल को जीवित रखना। उन्होंने सत्य के प्रति निष्ठा, वाणी में संयम, व्यवहार में शालीनता और कर्म में ईमानदारी को जीवन की अनिवार्य निधि बताया। उनके लिए मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसके कारण किसी दूसरे के जीवन में आशा, विश्वास और आत्मीयता का संचार हो।
उनके व्यक्तित्व में राजसी गरिमा और मानवीय करुणा का अद्भुत समन्वय था। वे जितने गंभीर थे, उतने ही सहज भी। विद्वानों के बीच उनकी विद्वत्ता का सम्मान था तो सामान्यजन के बीच उनकी आत्मीयता का आकर्षण। उनसे मिलने वाला व्यक्ति स्वयं को उनके निकट अनुभव करता था। उनके व्यवहार में न अहंकार था, न आडंबर। उनकी विनम्रता बनावटी नहीं, बल्कि उनके स्वभाव का स्वाभाविक अंग थी। यही कारण था कि उनका व्यक्तित्व परिचय का मोहताज नहीं था; उनका आचरण ही उनका परिचय बन जाता था।
आज समय ने उन्हें हमसे भौतिक रूप से दूर कर दिया है, किंतु स्मृतियों की दुनिया में उनका सान्निध्य आज भी उतना ही जीवंत है। उनकी आवाज, उनकी सीख, उनका स्नेह और जीवन को देखने की उनकी दृष्टि आज भी अंतर्मन में प्रतिध्वनित होती है। यह भारतीय परिवार-परंपरा की विशेषता ही है कि हमारे दिवंगत पूर्वज शरीर से विदा होकर भी हमारे संस्कारों, रीति-रिवाजों, स्मृतियों और जीवन-मूल्यों में जीवित रहते हैं।
पितृपक्ष में जब हम पितरों का तर्पण करते हैं, तब जल की प्रत्येक अंजलि के साथ केवल किसी दिवंगत आत्मा का स्मरण नहीं करते, बल्कि अपनी जड़ों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। मेरे लिए पिताश्री की पुण्यतिथि भी इसी आत्मिक कृतज्ञता का अवसर है। उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि पुष्पांजलि अथवा कर्मकांड तक सीमित नहीं हो सकती। उनके द्वारा दिए गए संस्कारों को जीवन में धारण करना ही उनके प्रति सबसे बड़ा तर्पण है।
उन्होंने जो सरलता सिखाई, उसे व्यवहार में उतारना; जो सत्यनिष्ठा सिखाई, उसे कर्म में निभाना; जो साहित्यिक संस्कार दिए, उन्हें समाज और जीवन के प्रति संवेदनशीलता में बदलना—यही मेरे लिए उनका वास्तविक श्राद्ध है। क्योंकि पूर्वजों की स्मृति तभी सार्थक होती है, जब उनकी श्रेष्ठ परंपरा अगली पीढ़ी के जीवन में प्रवाहित होती रहे।
आज पितृपक्ष की इस पावन वेला में उनके श्रीचरणों में श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए मन में यही भाव उमड़ता है कि मनुष्य की मृत्यु उसके शरीर का अंत अवश्य कर सकती है, किंतु उसके संस्कारों का नहीं। शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है, किंतु श्रेष्ठ विचार पीढ़ियों की चेतना में अपना प्रकाश छोड़ जाते हैं।
मेरे पिताश्री का जीवन मेरे लिए ऐसी ही अमूल्य धरोहर है। वे स्मृति नहीं, संस्कारों की अक्षय ज्योति हैं; वे अतीत नहीं, मेरे वर्तमान के मार्गदर्शक हैं; वे केवल मेरे पिता नहीं, मेरे भीतर जीवित वह भारतीय चेतना हैं, जो मुझे बार-बार सत्य, सरलता, शालीनता और मानवीयता की ओर लौटाती है। पितृपक्ष के इस पावन अवसर पर अपने पूज्य पिताश्री राजर्षि लाल रामेन्द्र प्रताप नारायण सिंह ‘लाल साहब’ के श्रीचरणों में कोटिशः नमन। ईश्वर से प्रार्थना है कि उनकी पुण्य स्मृतियों का आलोक सदैव हमारे जीवन-पथ को प्रकाशित करता रहे और उनके संस्कारों की यह अमूल्य विरासत आने वाली पीढ़ियों तक अक्षुण्ण रूप से प्रवाहित होती रहे।
पिताश्री, आप देह से दूर हैं, पर स्मृतियों में सदा समीप हैं।
आप हमारे बीच नहीं हैं, पर आपके संस्कार आज भी हमारे भीतर जीवित हैं।
यही आपकी सबसे बड़ी और सबसे अमूल्य विरासत है।
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