UP Cabinet Decision: यूपी में अभियंताओं के वित्तीय अधिकारों में बढ़ोतरी, 31 साल पुराने नियमों में संशोधन को कैबिनेट की मंजूरी

उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने अभियंत्रण विभागों के इंजीनियरों के वित्तीय अधिकारों में वृद्धि को मंजूरी दी है। 31 साल बाद 1995 के नियमों में संशोधन से विकास कार्यों में तेजी आएगी।

By INA News Desk
Sep 16, 2026 - 10:52
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UP Cabinet Decision: यूपी में अभियंताओं के वित्तीय अधिकारों में बढ़ोतरी, 31 साल पुराने नियमों में संशोधन को कैबिनेट की मंजूरी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बुनियादी ढांचे के विकास को रफ्तार देने और निर्माण परियोजनाओं के क्रियान्वयन में होने वाली अनावश्यक कागजी देरी को समाप्त करने के लिए राज्य सरकार ने तीन दशक पुराने प्रशासनिक ढांचे में बड़ा सुधार किया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में मंगलवार को आयोजित मंत्रिपरिषद की बैठक में प्रदेश के सभी प्रमुख तकनीकी व अभियंत्रण विभागों के अभियंताओं के वित्तीय अधिकारों (फाइनेंशियल पावर्स) के प्रतिनिधायन में उल्लेखनीय वृद्धि किए जाने के प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी गई।

इस नीतिगत निर्णय का मुख्य उद्देश्य अधिशासी अभियंता (ईई), अधीक्षण अभियंता (एसई) और मुख्य अभियंता (सीई) स्तर के तकनीकी अधिकारियों को जमीनी स्तर पर त्वरित निर्णय लेने में सक्षम बनाना है। अब तक मामूली और आपातकालीन निर्माण कार्यों के वित्तीय अनुमोदन के लिए भी फाइलों को शासन और विभागाध्यक्ष स्तर तक भेजना पड़ता था, जिससे विकास कार्य महीनों तक लंबित रहते थे। नए संशोधन के बाद निर्णय लेने की प्रक्रिया का विकेंद्रीकरण होगा और योजनाओं को समयबद्ध ढंग से पूरा कराया जा सकेगा।

1995 की व्यवस्था: 31 साल पुरानी वित्तीय सीमाएं बन चुकी थीं अड़चन

उत्तर प्रदेश के वित्तीय नियम संग्रह (फाइनेंशियल हैंडबुक) खंड-1 के अंतर्गत विभिन्न अभियंत्रण संवर्गों के अधिकारियों के लिए वित्तीय अधिकारों की सीमा निर्धारित की गई है। समय-समय पर शासनादेशों के जरिए इसमें छोटे बदलाव होते रहे, लेकिन व्यापक रूप से वित्तीय अधिकारों की वर्तमान व्यवस्था वित्त (लेखा) अनुभाग-2 के वर्ष 1995 में जारी शासनादेश पर आधारित थी।

पिछले 31 वर्षों के दौरान परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। 1995 से लेकर 2026 तक के तीन दशकों में:

  • सीमेंट, सरिया (स्टील), गिट्टी, डामर (बिटुमेन) जैसी बुनियादी निर्माण सामग्रियों के बाजार मूल्य में कई गुना वृद्धि हो चुकी है।

  • मजदूरी, श्रम दरें और मशीनरी संचालन (ईंधन, लीज व मेंटेनेंस) की लागत अत्यधिक बढ़ गई है।

  • परामर्श, तकनीकी परीक्षण और आधुनिक सर्वे सेवाओं के शुल्क में भी व्यापक परिवर्तन आया है।

लागत सूचकांक में भारी वृद्धि के कारण 1995 में तय की गई वित्तीय सीमाएं आज के दौर में पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुकी थीं। एक छोटे से पुलिया निर्माण, सड़क के पैचवर्क या नहर के तटबंध की मरम्मत जैसे सामान्य कार्यों का प्राक्कलन (एस्टीमेट) भी पुरानी वित्तीय सीमाओं को पार कर जाता था। नतीजतन, फाइलें निचले कार्यालयों से मुख्यालय और फिर शासन तक चक्कर काटती रहती थीं।

किन-किन विभागों को मिलेगा सीधे तौर पर लाभ?

मंत्रिपरिषद द्वारा स्वीकृत इस व्यवस्था का विस्तार राज्य के लगभग सभी बड़े तकनीकी विभागों में प्रभावी होगा। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

  • लोक निर्माण विभाग (PWD): राज्य राजमार्गों, जिला मार्गों, सेतुओं और सरकारी भवनों के निर्माण व रख-रखाव का कार्य।

  • सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग: प्रमुख नहरों, बैराजों और बाढ़ सुरक्षा तटबंधों के अनुरक्षण से जुड़े प्रोजेक्ट्स।

  • लघु सिंचाई विभाग: ग्रामीण जल संचयन, चेकडैम और नलकूप अवसंरचना।

  • ग्रामीण अभियंत्रण विभाग (RED): गांवों में संपर्क मार्ग, पंचायत भवन और ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर के कार्य।

  • अन्य तकनीकी इकाइयां: राजकीय निर्माण निगम, सेतु निगम व अन्य संबंधित निर्माण एजेंसियां।

वित्तीय सीमाओं के पुनरीक्षण से इन विभागों के मैदानी अभियंताओं को अपने स्तर पर ही निविदा स्वीकृति, अनुबंध निष्पादन और मरम्मत कार्यों के भुगतान आदेश जारी करने का अधिकार मिल जाएगा।

प्रशासनिक विकेंद्रीकरण से खत्म होगी 'रेड टेप' संस्कृति

प्रशासनिक सुधारों की दृष्टि से यह फैसला राज्य में लालफीताशाही (रेड टेप) को कम करने वाला साबित होगा। पूर्व में जब किसी आपात स्थिति—जैसे भारी बारिश में सड़क धंसना, नहर का किनारा टूटना या पुलिया क्षतिग्रस्त होना—का सामना होता था, तो फील्ड इंजीनियर अपनी वित्तीय सीमा समाप्त होने के कारण तुरंत काम शुरू नहीं करा पाते थे।

उच्च स्तर से वित्तीय स्वीकृति प्राप्त करने की इस लंबी प्रक्रिया के चलते मरम्मत कार्यों में अनावश्यक विलंब होता था, जिससे आम जनता को कठिनाई उठानी पड़ती थी और बाद में परियोजना की लागत (कॉस्ट ओवररन) भी बढ़ जाती थी। अब संशोधित सीमाओं के लागू होने से फील्ड स्तर के अधिकारी मौके पर ही तकनीकी और वित्तीय मंजूरी देकर कार्य प्रारंभ करा सकेंगे।

जवाबदेही और वित्तीय पारदर्शिता पर भी निगरानी

वित्तीय अधिकारों में वृद्धि के साथ-साथ शासन ने पारदर्शिता बनाए रखने के लिए डिजिटल ऑडिट और ई-टेंडरिंग नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। वित्तीय अधिकारों के प्रतिनिधायन का अर्थ यह नहीं होगा कि वित्तीय अनुशासन से कोई समझौता किया जाए।

सभी स्वीकृतियां संबंधित विभाग के ऑनलाइन पोर्टल, राज्य के ई-प्रोक्योरमेंट सिस्टम और वित्तीय नियमों के कड़े दायरे में ही दी जाएंगी। साथ ही, वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा समय-समय पर इन स्वीकृतियों का रैंडम ऑडिट भी किया जाएगा ताकि संसाधनों के दुरुपयोग की कोई गुंजाइश न रहे।

राज्य सरकार के इस कदम से आने वाले दिनों में विशेषकर ग्रामीण इलाकों में सड़कों की तत्काल मरम्मत, बाढ़ सुरक्षा के त्वरित उपाय और किसानों के लिए सिंचाई प्रबंधों को गति मिलना तय माना जा रहा है। वित्त विभाग द्वारा जल्द ही संशोधित वित्तीय सीमाओं की विस्तृत अधिसूचना जारी की जाएगी।

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