खेत से विदेशी बाजार तक सीधी चेन: यूपी के आबकारी निर्यात में 45.4% का उछाल, राष्ट्रीय हिस्सेदारी 12.6% हुई
यूपी की त्रिवर्षीय आबकारी निर्यात नीति से पहली तिमाही में निर्यात 45.4% बढ़कर 127.8 लाख डॉलर पहुंचा। राष्ट्रीय हिस्सेदारी बढ़कर 12.6% हुई। बस्ती का शीरा भी वैश्विक बाजार पहुंचा।
लखनऊ। राज्य को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के संकल्प के तहत लागू की गई उत्तर प्रदेश सरकार की त्रिवर्षीय आबकारी निर्यात नीति (2026-29) का जमीनी असर अब व्यापक औद्योगिक और कृषि आपूर्ति श्रृंखला पर साफ नजर आने लगा है। खेतों में तैयार होने वाले गन्ने, शीरे और खाद्यान्न से लेकर डिस्टिलरी, बॉटलिंग प्लांट, पैकेजिंग, भंडारण और लॉजिस्टिक्स तक पूरी वैल्यू चेन को इस नीति से नया संबल मिला है। चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल से जून) के दौरान उत्तर प्रदेश के आबकारी निर्यात में पिछले वर्ष की समान तिमाही की तुलना में 45.4 प्रतिशत की जोरदार छलांग दर्ज की गई है, जो इसी अवधि में दर्ज देश की 18.3 प्रतिशत की राष्ट्रीय विकास दर से ढाई गुना से भी अधिक है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में भारत से कुल आबकारी निर्यात करीब 10.17 करोड़ अमेरिकी डॉलर दर्ज किया गया। इस कुल राष्ट्रीय कारोबार में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 127.8 लाख डॉलर (लगभग 1.27 करोड़ डॉलर) पर पहुंच गई है। पिछले वित्तीय वर्ष की समान अवधि में यह आंकड़ा 87.9 लाख डॉलर था। इस तरह प्रदेश ने केवल एक तिमाही के भीतर 39.9 लाख अमेरिकी डॉलर की शुद्ध अतिरिक्त वृद्धि हासिल की है। देश के कुल आबकारी निर्यात में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 10.2 प्रतिशत से बढ़कर 12.6 प्रतिशत हो चुकी है, जिसके बल पर प्रदेश अब महाराष्ट्र और पंजाब के बाद देश में तीसरे स्थान पर स्थापित हो गया है।
नई औद्योगिक इकाइयों की स्थापना और बंद पड़े प्लांट्स में उत्पादन
निर्यात नीति के सरलीकरण और निवेशकों को दी जा रही विनियामक रियायतों के चलते प्रदेश में घरेलू और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बड़े पैमाने पर निवेश शुरू किया है। उन्नाव में यूनाइटेड ब्रुअरीज तथा हरदोई में माउंट एवरेस्ट ब्रुअरीज अपनी नई अत्याधुनिक विनिर्माण इकाइयां स्थापित कर रही हैं। इसके अतिरिक्त फर्रुखाबाद में वुडपेकर ग्रीनएग्री न्यूट्रिएंट्स ने अपना प्लांट स्थापित किया है।
औद्योगिक संवर्धन का बड़ा उदाहरण मुरादाबाद में देखने को मिला, जहां एलाइड ब्लेंडर्स एंड डिस्टिलर्स ने वर्षों से बंद पड़ी औद्योगिक इकाई का जीर्णोद्धार कर वहां दोबारा उत्पादन शुरू करा दिया है। गोरखपुर स्थित कियान डिस्टिलरी ने बायो-एथेनॉल उत्पादन के साथ-साथ अब पोर्टेबल स्पिरिट (पेय आसवनी) और ब्रुअरी लाइसेंस के लिए औपचारिक आवेदन किया है। दूसरी ओर, दिग्गज शराब निर्माता कंपनी रैडिको खेतान अपने अन्य राज्यों में स्थित उत्पादन संयंत्रों से अंतरराष्ट्रीय निर्यात कोटा स्थानांतरित करते हुए उत्तर प्रदेश के सीतापुर और रामपुर प्लांट्स को अपना मुख्य निर्यात केंद्र बना रही है।
बस्ती के शीरे ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में बनाई पहचान
आबकारी नीति केवल डिस्टिलरी कंपनियों के मुनाफे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने गन्ना किसानों और चीनी मिलों के उप-उत्पादों को भी विदेशी मुद्रा अर्जन का सशक्त जरिया बना दिया है। प्रदेश के आबकारी मंत्री नितिन अग्रवाल के अनुसार, कृषि आधारित सह-उत्पाद अब सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार की मांग पूरी कर रहे हैं।
हाल ही में बस्ती जनपद से 25 हजार कुंतल शीरे (मोलासेस) का सीधा निर्यात विदेशी बाजार में किया गया, जिससे राज्य को लगभग 5 लाख अमेरिकी डॉलर की विदेशी मुद्रा हासिल हुई। चूंकि शीरा एक पृथक कस्टम शुल्क वर्गीकरण के अंतर्गत आता है, इसलिए यह कमाई मुख्य आबकारी उत्पादों के 127.8 लाख डॉलर के आंकड़ों से पूरी तरह अतिरिक्त है। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि प्रदेश का ग्रामीण कृषि क्षेत्र अब सीधे तौर पर वैश्विक व्यापार तंत्र का अभिन्न अंग बनता जा रहा है।
बॉटलिंग और पैकेजिंग उद्योग में 45.7 फीसदी की वृद्धि
निर्यात में आए इस उछाल का सीधा असर सहायक उद्योगों पर पड़ा है। आबकारी आयुक्त डॉ. आदर्श सिंह ने बताया कि अप्रैल से जुलाई 2026 के चार महीनों के दौरान उत्तर प्रदेश की बॉटलिंग इकाइयों ने अन्य राज्यों को पिछले वर्ष की तुलना में 1.64 करोड़ अधिक बोतलें आपूर्ति कीं। यह लगभग 45.7 प्रतिशत की अभूतपूर्व वृद्धि है।
आबकारी आयुक्त के अनुसार, जब शराब या स्पिरिट का निर्यात बढ़ता है, तो उसका सकारात्मक असर केवल लिकर उत्पादक तक सीमित नहीं रहता। इसके साथ कांच और पीईटी बोतलों का निर्माण, कॉर्क और क्राउन कैप्स की मांग, उच्च गुणवत्ता वाले लेबल्स की प्रिंटिंग, कार्टन और नालीदार बॉक्स की पैकेजिंग, गोदामों में भंडारण और अंततः माल ढुलाई करने वाले ट्रांसपोर्टरों तक आर्थिक तरलता पहुंचती है।
नीतिगत स्तर पर प्रक्रियाओं को पेपरलेस बनाने, निर्यात पास और परमिट निर्गमन को पारदर्शी करने तथा अंतर-राज्यीय परिवहन को आसान बनाने के प्रशासनिक फैसलों ने उत्तर प्रदेश को देश के शीर्ष आबकारी निर्यात हब के रूप में स्थापित करने की दिशा में ठोस जमीन तैयार कर दी है।
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