सोशल मीडिया पर बवंडर लाने वाले डिजिटल आंदोलन 'कॉकरोच जनता पार्टी' के संस्थापक अभिजीत दिपके का दिल्ली के बाद अब मुंबई और महाराष्ट्र की तरफ कूच
देश की राजनीति और सामाजिक विमर्श में इन दिनों एक बेहद अजीब और चौंकाने वाला नाम हर तरफ गूंज रहा है। यह नाम है
- देश के बेरोजगार और इंटरनेट पर सक्रिय युवाओं के गुस्से को नई आवाज देने वाले युवा रणनीतिकार का दावा - यह कोई मजाक नहीं, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ शांतिपूर्ण क्रांति है
- नीट परीक्षा विवाद और पेपर लीक को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर अड़ी मुहिम, क्या डिजिटल स्पेस से निकलकर जमीनी स्तर पर पास होगा यह नया प्रयोग
देश की राजनीति और सामाजिक विमर्श में इन दिनों एक बेहद अजीब और चौंकाने वाला नाम हर तरफ गूंज रहा है। यह नाम है 'कॉकरोच जनता पार्टी' का, जिसने इंटरनेट की आभासी दुनिया से निकलकर अब देश की राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर अपनी जमीनी ताकत का अहसास करा दिया है। इस अनोखे और व्यंग्यात्मक आंदोलन की शुरुआत करने वाले तीस वर्षीय डिजिटल रणनीतिकार अभिजीत दिपके हाल ही में अमेरिका के बोस्टन से भारत लौटे हैं। भारत आते ही उन्होंने दिल्ली पुलिस से कड़ी मशक्कत के बाद जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन की आधिकारिक अनुमति हासिल की। इस प्रदर्शन में देश के विभिन्न हिस्सों से आए हजारों युवाओं और छात्रों ने हिस्सा लिया, जिसके बाद इस आंदोलन का अगला पड़ाव अब देश की आर्थिक राजधानी मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों की तरफ बढ़ रहा है। सोशल मीडिया पर जिस तेजी से इस मुहिम ने पैर पसारे हैं, उसने पारंपरिक राजनीतिक दलों और सत्ता के गलियारों में बैठे नीति-नियंताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि युवाओं का यह गुस्सा आने वाले समय में देश की राजनीति को किस दिशा में लेकर जाएगा।
इस आंदोलन की पृष्ठभूमि और इसके अनोखे नामकरण की कहानी भी देश के सर्वोच्च संस्थान से जुड़ी हुई है। दरअसल, देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा एक अदालती सुनवाई के दौरान बेरोजगार युवाओं और कुछ प्रदर्शनकारियों के संदर्भ में कथित तौर पर समाज के परजीवी और 'कॉकरोच' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। इस टिप्पणी ने देश के उन करोड़ों युवाओं के स्वाभिमान को गहरी ठेस पहुंचाई जो सालों से सरकारी नौकरियों, पारदर्शी परीक्षाओं और रोजगार के अवसरों की तलाश में भटक रहे हैं। अभिजीत दिपके ने इस अपमानजनक शब्द को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बनाने का फैसला किया और व्यंग्य के रूप में 'कॉकरोच जनता पार्टी' के गठन का ऑनलाइन एलान कर दिया। उन्होंने युवाओं से अपील की कि यदि व्यवस्था उन्हें कीड़ा समझती है, तो वे सब एक साथ आकर अपनी ताकत दिखाएं। यह विचार इतनी तेजी से वायरल हुआ कि महज कुछ ही दिनों के भीतर इस संगठन के इंस्टाग्राम अकाउंट पर दो करोड़ से अधिक फॉलोअर्स जुड़ गए, जिसने देश के सबसे बड़े राजनीतिक दल के सोशल मीडिया बेस को भी पीछे छोड़ दिया।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए पहले बड़े प्रदर्शन के बाद इस आंदोलन की सफलता और विफलता को लेकर बहस छिड़ गई है। आंदोलन के सूत्रधार जब हाथों में देश के संविधान निर्माता डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर की किताब लेकर दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरे, तो उनके स्वागत के लिए छात्रों का भारी हुजूम उमड़ पड़ा। प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने नई दिल्ली जिले को बारह अलग-अलग जोन में बांट दिया था और भारी संख्या में सुरक्षा बल तैनात किए थे। आंदोलनकारियों ने बेहद शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से अपनी मांगों को रखा और हिंसक तौर-तरीकों से खुद को पूरी तरह दूर रखा। इस प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य देश की राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा यानी नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार होने वाले पेपर लीक के मामलों पर सरकार को घेरना था। युवाओं का कहना है कि वे सालों तक दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन परीक्षा के दिन पेपर लीक हो जाता है या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है, जिससे उनका भविष्य अंधकार में डूब रहा है।
इस आंदोलन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की तरफ से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने दिल्ली में हुए इस प्रदर्शन और वहां दिए गए भाषणों पर तंज कसते हुए कहा कि यह युवाओं की वास्तविक आकांक्षाओं को नहीं दर्शाता, बल्कि समाज में कानूनविहीनता और अराजकता फैलाने की मानसिकता को बढ़ावा देता है। इस पर पलटवार करते हुए अभिजीत दिपके ने मुंबई और अपने गृह क्षेत्र छत्रपति संभाजीनगर पहुंचने पर कहा कि क्या देश के संविधान की प्रति हाथ में लेकर चलना या समानता और अधिकारों की बात करना अराजकता है? उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य के नेतृत्व को ऐसी टिप्पणियां शोभा नहीं देतीं। आंदोलन की तरफ से यह भी साफ किया गया है कि जो लोग सरकार के फैसलों पर सवाल उठाते हैं, उन्हें तुरंत देशविरोधी करार देने का चलन अब बंद होना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में अपनी बात रखना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है।
अभिजीत दिपके ने इस बात की भी घोषणा की है कि उनका यह संगठन फिलहाल किसी भी मुख्यधारा के राजनीतिक दल के साथ कोई गठबंधन या सक्रिय समझौता नहीं करेगा। उन्होंने साफ किया कि देश के युवाओं का भरोसा पारंपरिक राजनीतिक पार्टियों से पूरी तरह उठ चुका है क्योंकि विपक्ष में रहने पर जो दल युवाओं के मुद्दों को उठाते हैं, सत्ता में आते ही वे भी उसी ढर्रे पर चलने लगते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि जो भी राजनीतिक दल या नेता उनके इस आंदोलन के उद्देश्यों और मांगों का समर्थन करना चाहते हैं, वे बाहर से अपना समर्थन दे सकते हैं, लेकिन संगठन के भीतर किसी भी स्थापित राजनेता को प्रवेश नहीं दिया जाएगा। आंदोलन का पूरा ध्यान इस समय देश के भीतर एक ऐसे युवा प्रेशर ग्रुप का निर्माण करना है जो सरकारों को युवाओं से जुड़े नीतिगत फैसलों पर जवाबदेह बनाने के लिए मजबूर कर सके।
इस आंदोलन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या यह सिर्फ इंटरनेट और सोशल मीडिया की दुनिया का एक तात्कालिक ट्रेंड बनकर रह जाएगा या जमीन पर कोई ठोस राजनीतिक या सामाजिक बदलाव ला पाएगा। आलोचकों का मानना है कि वर्चुअल दुनिया में करोड़ों की संख्या में लाइक्स और फॉलोअर्स जुटाना आसान है, लेकिन देश की जटिल चुनावी और प्रशासनिक राजनीति में पैर जमाना बेहद कठिन काम है। इसके विपरीत, इस मुहिम से जुड़े छात्रों और युवाओं का तर्क है कि हर बड़े बदलाव की शुरुआत एक विचार से ही होती है। आज का युवा वर्ग सोशल मीडिया पर ही अपनी ज्यादातर जानकारियां हासिल करता है और वहीं अपनी राय बनाता है, इसलिए इस डिजिटल एकजुटता को कम आंकना एक बड़ी भूल होगी। दिल्ली के बाद अब मुंबई के युवाओं को इस मुहिम से जोड़ने की तैयारी चल रही है, जिससे यह साफ हो जाएगा कि यह प्रयोग कितना टिकाऊ है।
What's Your Reaction?




