सीएम योगी ने किया पुस्तक विमोचन: 'भारत आंतरिक इमरजेंसी 1975' में दर्ज आपातकाल के काले दौर और जनसंघर्ष की गाथा
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शतरुद्र प्रकाश की पुस्तक 'भारत आंतरिक इमरजेंसी 1975' का विमोचन किया। आपातकाल के दौर, सेंसरशिप और लोकतंत्र सेनानियों के संघर्ष पर चर्चा।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राजधानी लखनऊ स्थित अपने सरकारी आवास पर पूर्व मंत्री एवं वरिष्ठ नेता शतरुद्र प्रकाश द्वारा रचित पुस्तक "भारत आंतरिक इमरजेंसी 1975" का विधिवत विमोचन किया। इस अवसर पर लेखक ने पुस्तक की पहली प्रति मुख्यमंत्री को भेंट की। कार्यक्रम के दौरान रमेश मिश्रा और सीपी सिंह सहित कई प्रमुख गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित रहे।
यह ऐतिहासिक कृति स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर के रूप में दर्ज 1975 से 1977 के बीच की घटनाओं, नागरिक अधिकारों पर लगे प्रतिबंधों और दमन के विरुद्ध खड़े हुए जनांदोलनों का प्रामाणिक ब्योरा प्रस्तुत करती है। पुस्तक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान देश में थोपे गए आपातकाल, विपक्षी दलों के शीर्ष नेताओं व सामाजिक कार्यकर्ताओं की सामूहिक गिरफ्तारियों, न्यायपालिका पर बने दबाव और समाचार माध्यमों पर लगाई गई कड़ी सेंसरशिप का तथ्यात्मक विवरण शामिल है।
लेखक ने 21 महीनों की इस अवधि को भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे की परीक्षा के रूप में दर्ज किया है। पुस्तक में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले व्यापक जनआंदोलन, जबरन नसबंदी अभियान, झुग्गी-बस्तियों के ध्वस्तीकरण और सत्ता के मनमाने निर्णयों से जनजीवन पर पड़े गहरे प्रभावों का विश्लेषण किया गया है। तमाम प्रशासनिक बंदिशों, प्रताड़ना और जेल की यातनाओं के बावजूद लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए संघर्षरत रहे आंदोलनकारियों की जीवटता को इसमें प्रमुखता से संजोया गया है।
पुस्तक में लेखक के स्वयं के राजनीतिक सफर और आपातकाल विरोधी प्रतिरोध का भी सजीव दस्तावेज मिलता है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने वाले लेखक ने बनारस के वंचित तबकों के अधिकारों के लिए सड़क पर उतरकर संघर्ष किया था और वे सबसे युवा विधायकों में शुमार हुए थे। आपातकाल के दौर में उनकी पत्नी अंजना प्रकाश की गिरफ्तारी और भूमिगत रहकर प्रतिरोध जारी रखने वाले युवाओं के नेटवर्क का भी इसमें विवरण है। उस दौर में कड़े प्रतिबंधों को मात देकर विचारों के प्रसार के लिए गोपनीय रूप से निकाले जाने वाले साइक्लोस्टाइल बुलेटिन 'रणभेरी' की भूमिका का भी पुस्तक में विस्तार से उल्लेख किया गया है।
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