Special Article: जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा का पर्व दीपोत्सव : कथा-प्रथा

भारतीय संस्कृति में पर्व और त्योहार केवल उल्लास, उत्सव तथा परंपराओं के निर्वहन के माध्यम नहीं हैं, अपितु वे जीवन-दर्शन, आध्यात्मिक

By INA News Desk
Nov 7, 2026 - 15:51
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Special Article: जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा का पर्व दीपोत्सव : कथा-प्रथा
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लेखक:~ कुंवर शील वर्धन प्रताप नारायण सिंह

भारतीय संस्कृति में पर्व और त्योहार केवल उल्लास, उत्सव तथा परंपराओं के निर्वहन के माध्यम नहीं हैं, अपितु वे जीवन-दर्शन, आध्यात्मिक चेतना और मानवीय मूल्यों के संवाहक भी हैं। इन्हीं सांस्कृतिक पर्वों की शृंखला में दीपावली का स्थान अत्यंत विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण है। कार्तिक अमावस्या की अंधकारमयी रात्रि में असंख्य दीपों का प्रज्वलन केवल घर-आँगन को आलोकित करने की परंपरा नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन में व्याप्त अज्ञान, अहंकार, लोभ, ईर्ष्या और नकारात्मकता को तिरोहित कर सत्य, सद्भाव, करुणा एवं सदाचार की प्रतिष्ठा करने का सांस्कृतिक उद्घोष है। वस्तुतः दीपोत्सव भारतीय जीवन-मूल्यों की वह सनातन अभिव्यक्ति है, जिसमें धर्म, दर्शन, लोकविश्वास, कृषि-संस्कृति और पारिवारिक आत्मीयता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
दीपावली की सर्वाधिक प्रचलित पौराणिक मान्यता भगवान श्रीराम के चौदह वर्षों के वनवास और रावण-वध के उपरांत माता सीता तथा अनुज लक्ष्मण के साथ अयोध्या प्रत्यावर्तन से जुड़ी है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आगमन पर अयोध्यावासियों ने दीप प्रज्वलित कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की थी। यह प्रसंग केवल एक आदर्श राजा के राज्याभिषेक अथवा आगमन का उत्सव नहीं, बल्कि अन्याय पर न्याय, अधर्म पर धर्म और अहंकार पर मर्यादा की विजय का प्रतीक है। इसी प्रकार श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के अत्याचारों से देवियों एवं जनसामान्य को मुक्ति दिलाने का आख्यान नरक चतुर्दशी की परंपरा से संबद्ध है। इन कथाओं का अंतर्निहित संदेश यही है कि जब मनुष्य अपने भीतर के अंधकार को परास्त करता है, तभी वास्तविक दीपावली घटित होती है।
दीपोत्सव की परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष गोवंश और कृषि-संस्कृति के प्रति भारतीय समाज की कृतज्ञता भी है। प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था में गाय, बैल और अन्य पशुधन केवल आजीविका के साधन नहीं थे, बल्कि ग्रामीण जीवन की समृद्धि और आत्मनिर्भरता के आधार थे। गोपालन, दुग्ध उत्पादन, कृषि कार्य तथा परिवहन में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इसीलिए दीपावली से संबद्ध विभिन्न लोकपरंपराओं में गोपूजन, गोवर्धन पूजा और पशुधन के अलंकरण की परिपाटी विकसित हुई। छत्तीसगढ़ के अनेक ग्रामीण अंचलों में गोवंश से जुड़ी लोकपरंपराएँ, राउत समुदाय का उत्सव और कर्मा जैसे लोकनृत्य इस सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखते हैं।
गोवंश के प्रति करुणा, सत्यनिष्ठा और मातृत्व के आदर्श को अभिव्यक्त करने वाला एक अत्यंत मार्मिक आख्यान पद्मपुराण के सृष्टिखंड में वर्णित नंदा गाय और व्याघ्र की कथा है। आख्यान के अनुसार, वन में चरते समय नंदा नामक गाय का सामना एक व्याघ्र से हो जाता है। मृत्यु के भय से विचलित होने के स्थान पर वह अपने भूखे बछड़े को अंतिम बार दूध पिलाने और फिर लौटकर आने का वचन देती है। व्याघ्र उसकी सत्यनिष्ठा पर विश्वास कर उसे जाने देता है। गाय अपने बछड़े को दूध पिलाकर उसे समस्त परिस्थिति से अवगत कराती है और पुनः अपने वचन का निर्वहन करने वन की ओर चल पड़ती है। अंततः उसके सत्य, मातृत्व और वचनपालन से व्याघ्र का हृदय परिवर्तित हो जाता है। यह कथा भारतीय लोकमानस में सत्य, करुणा, मातृप्रेम और प्राणिमात्र के प्रति संवेदनशीलता का अनुपम उदाहरण है। महाराष्ट्र सहित विभिन्न क्षेत्रों में गाय और व्याघ्र से संबद्ध लोककथाएँ तथा वसुबारस जैसी परंपराएँ भी प्रचलित हैं। इन आख्यानों का मर्म यह है कि नैतिकता की प्रतिष्ठा मनुष्य तक सीमित नहीं, बल्कि समस्त जीव-जगत के प्रति दया और उत्तरदायित्व में निहित है।
दीपोत्सव का एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रसंग भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत धारण करने की कथा है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में वर्णित इस प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र के अहंकार का शमन करते हुए ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत की पूजा और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश दिया। गोवर्धन पूजा वस्तुतः पर्वत, वनस्पति, जल, पशुधन और पर्यावरण के संरक्षण की भारतीय चेतना का प्रतीक है। अन्नकूट की परंपरा में विविध प्रकार के अन्न एवं व्यंजनों का नैवेद्य अर्पित करना कृषि-समृद्धि और सामुदायिक सहभागिता के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम है।
धनतेरस से प्रारंभ होने वाला दीपोत्सव स्वास्थ्य, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नयन की कामना से भी जुड़ा हुआ है। समुद्र मंथन के पौराणिक आख्यान में भगवान धन्वंतरि का अमृतकलश के साथ प्राकट्य आयुर्वेद, आरोग्य और जीवन-संरक्षण की महत्ता को प्रतिष्ठित करता है। इसीलिए धनतेरस को धन्वंतरि जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन धन, आरोग्य और ऐश्वर्य के प्रतीक के रूप में भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी तथा भगवान कुबेर की उपासना की जाती है। भारतीय दर्शन में धन की सार्थकता उसके सदुपयोग में निहित है। जिस समृद्धि से समाज का कल्याण न हो, वह वास्तविक संपन्नता नहीं हो सकती।
धनतेरस पर यमदीपदान की परंपरा भी लोकविश्वासों में विशेष महत्त्व रखती है। प्रचलित लोककथा के अनुसार, राजा हेम के पुत्र की अल्पायु में मृत्यु की भविष्यवाणी हुई थी। किंतु उसकी पत्नी ने दीप प्रज्वलित कर रात्रि जागरण किया और अपने पति की रक्षा के लिए यमराज के आगमन का मार्ग अवरुद्ध कर दिया। इस कथा के आधार पर यमदीपदान को अकाल मृत्यु से रक्षा की मंगलकामना से जोड़ा जाता है। यह आख्यान हमें जीवन की अनिश्चितता के बीच आशा, प्रेम और पारिवारिक उत्तरदायित्व की महत्ता का बोध कराता है।
कार्तिक अमावस्या को माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की संयुक्त उपासना दीपावली का केंद्रीय धार्मिक विधान है। माता लक्ष्मी धन, ऐश्वर्य, सौभाग्य और समृद्धि की अधिष्ठात्री हैं, जबकि भगवान गणेश विवेक, बुद्धि, शुभारंभ और विघ्नविनाश के प्रतीक हैं। दोनों की संयुक्त आराधना का आध्यात्मिक आशय यह है कि धन के साथ विवेक और समृद्धि के साथ सद्बुद्धि का होना अनिवार्य है। केवल संपत्ति अर्जित करना जीवन की सफलता नहीं है; उसका न्यायपूर्ण, नैतिक और लोककल्याणकारी उपयोग ही वास्तविक लक्ष्मी-प्राप्ति है। इसी अवसर पर बहीखातों, लेखनी और ज्ञानोपकरणों का पूजन भी कर्म, विद्या और व्यवसाय में शुचिता के महत्त्व को रेखांकित करता है।
दीपोत्सव का उल्लास कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट तथा द्वितीया को भाई दूज के रूप में आगे बढ़ता है। भाई दूज से जुड़ी यम और यमुना की पौराणिक कथा भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और पारस्परिक संरक्षण का संदेश देती है। बहन द्वारा भाई के दीर्घायु एवं मंगलमय जीवन की कामना और भाई द्वारा बहन के सम्मान तथा सुरक्षा का संकल्प भारतीय पारिवारिक व्यवस्था की आत्मीय संवेदना को अभिव्यक्त करता है।
समकालीन परिवेश में दीपावली की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। आज जब भौतिक उपलब्धियों की प्रतिस्पर्धा में पारिवारिक संबंधों की ऊष्मा, सामाजिक सद्भाव और पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित हो रहे हैं, तब दीपोत्सव हमें अपनी मूल सांस्कृतिक चेतना की ओर लौटने का अवसर प्रदान करता है। पर्व की सार्थकता केवल विद्युत झालरों, आतिशबाजी और महँगे उपहारों में नहीं, बल्कि किसी निराश व्यक्ति के जीवन में आशा का दीप प्रज्वलित करने, निर्धन के साथ प्रसन्नता बाँटने, वृद्धजनों का सम्मान करने, प्रकृति और पशुधन की रक्षा करने तथा समाज में प्रेम और सौहार्द का विस्तार करने में है। पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व निभाते हुए ध्वनि एवं वायु प्रदूषण से बचना और मिट्टी के दीपों तथा स्थानीय शिल्पकारों को प्रोत्साहित करना भी इस पर्व की भावना के अनुरूप है।
वस्तुतः दीपावली की प्रत्येक कथा, प्रत्येक परंपरा और प्रत्येक अनुष्ठान के भीतर कोई न कोई जीवनोपयोगी संदेश अंतर्निहित है। कहीं सत्य की विजय है, कहीं मातृत्व की करुणा, कहीं प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, कहीं आरोग्य की कामना तो कहीं पारिवारिक आत्मीयता का अमर विधान। आवश्यकता इस बात की है कि हम इन परंपराओं को केवल कर्मकांड तक सीमित न रखें, बल्कि इनके अंतर्निहित जीवन-दर्शन को अपने आचरण में आत्मसात करें। दीपक तभी सार्थक है, जब उसका प्रकाश दूसरों के जीवन तक पहुँचे। इसीलिए दीपोत्सव का वास्तविक अर्थ अपने अंतर्मन को प्रकाशित करना और समूचे समाज में सद्भाव, संवेदना, नैतिकता तथा मानवीय गरिमा की प्रतिष्ठा करना है। यही भारतीय संस्कृति का शाश्वत संदेश और दीपावली के आलोक का वास्तविक अभिप्राय है।


लेखक:~ कुंवर शील वर्धन प्रताप नारायण सिंह
एडवोकेट / पत्रकार
वरिष्ठ उपाध्यक्ष, गोरखपुर प्रेस क्लब

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