गया के मूर्तिकार की अनूठी कला: पेंसिल के छिलके, शार्पनर और इरेज़र से गढ़ीं मां दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं
बिहार के गया में एक कलाकार ने पेंसिल के छिलके, शार्पनर और इरेज़र जैसी रोजमर्रा की स्टेशनरी का उपयोग करके मां दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की आकर्षक प्रतिमाएं तैयार की हैं। जानिए इस अनूठी कला का पूरा विवरण।
- स्टेशनरी सामग्री से बनाई मां दुर्गा की मनमोहक मूर्ति: बिहार के गया के कलाकार की अनूठी पहल, इको-फ्रेंडली कला की हो रही तारीफ
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- गया में कला का अद्भुत रूप: इरेज़र, शार्पनर और पेंसिल की छीलन से रची गई देवी दुर्गा की भव्य मूर्ति
दुर्गा पूजा के पावन अवसर पर बिहार के गया जिले से कला और नवाचार का एक अनूठा संगम सामने आया है। यहां के एक स्थानीय कलाकार ने पारंपरिक मिट्टी और रासायनिक रंगों से हटकर दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली स्टेशनरी सामग्री पेंसिल के छिलके (Pencil Shavings), शार्पनर और इरेज़र (रबड़) के माध्यम से मां दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की मनमोहक और बारीक प्रतिमाएं तैयार की हैं। इस अनूठी रचनात्मकता को देखने के लिए स्थानीय लोग और कला प्रेमी बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं।
- वेस्ट मटेरियल और स्टेशनरी का बारीक समन्वय
प्रतिमा निर्माण की प्रक्रिया काफी श्रमसाध्य और धैर्य की मांग करने वाली रही है। कलाकार ने प्रतिमा के मुकुट, आभूषण और पोशाक के सुनहरे व रंगीन किनारों को उभारने के लिए विभिन्न रंगों की पेंसिलों को छीलकर प्राप्त होने वाले घुमावदार छिलकों का इस्तेमाल किया है। देवी के अस्त्र-शस्त्र, बाह्य संरचना और आधार स्तंभ को मजबूती देने के लिए अलग-अलग आकारों के प्लास्टिक और मेटल शार्पनर का उपयोग किया गया है। वहीं, चेहरे के बारीक भावों और आभूषणों की नक्काशी को संतुलित रूप देने के लिए इरेज़र (रबड़) को तराशकर सटीक स्थान पर स्थापित किया गया है। मां दुर्गा के साथ-साथ भगवान गणेश, कार्तिकेय, माता लक्ष्मी और माता सरस्वती के प्रतीकों को भी इसी तकनीक से ढाला गया है।
- पर्यावरण संरक्षण और 'बेस्ट आउट ऑफ वेस्ट' का संदेश
पारंपरिक मूर्तियों में अक्सर इस्तेमाल होने वाले प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) और कृत्रिम रासायनिक रंगों से जलस्रोतों को पहुंचने वाले नुकसान के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से भी यह पहल काफी सराहनीय मानी जा रही है। कलाकार का कहना है कि इस कार्य का मुख्य उद्देश्य बच्चों और युवाओं को यह दिखाना है कि पढ़ाई में इस्तेमाल होने वाली सामान्य और व्यर्थ समझकर फेंक दी जाने वाली वस्तुओं से भी उच्च कोटि की कलाकृतियां बनाई जा सकती हैं। यह प्रयास 'बेस्ट आउट ऑफ वेस्ट' की अवधारणा को साकार करने के साथ-साथ त्योहारों में पर्यावरण अनुकूल साधनों के उपयोग को बढ़ावा देता है।
इस कलाकृति की बारीकी और संतुलन को देखकर स्थानीय नागरिक और कला समीक्षक प्रभावित हैं। स्टेशनरी के हर एक छोटे हिस्से को व्यवस्थित कर देवी की उग्र और ममतामयी दोनों मुद्राओं का जिस कुशलता से चित्रण किया गया है, वह स्थानीय प्रतिभा की विविधता को रेखांकित करता है। पूजा पंडालों और प्रदर्शनियों में इस तरह के रचनात्मक प्रयोगों से दुर्गा पूजा उत्सव में एक नया आकर्षण जुड़ रहा है।
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