हाथरस की रामलीला में तीन दशकों में बदला आस्था का स्वरूप, स्थानीय समर्पण की जगह पेशेवर मंडलियों ने ली
हाथरस की ऐतिहासिक रामलीला में तीन दशकों में आया बड़ा बदलाव। 25 दिन के कड़े अनुशासन और मंदिर प्रवास की जगह अब पेशेवर मंडलियों के मंचन ने ली।
हाथरस नगर की सुप्रसिद्ध रामलीला ने समय के प्रवाह के साथ अपनी पुरानी पहचान और प्रस्तुति के तौर-तरीकों में व्यापक परिवर्तन देखा है। कभी समूचे नगर की साझी आस्था, कठिन अनुशासन और सामाजिक सहभागिता की धुरी रही यह प्रस्तुति अब पेशेवर कलाकारों और बाहरी मंडलियों के प्रदर्शन तक सीमित होती जा रही है। पूर्व के दौर में प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण, माता सीता, भरत और शत्रुघ्न के पावन स्वरूपों का चयन स्थानीय बस्तियों से ही किया जाता था। उन बालकों के लिए धार्मिक शुचिता का पालन अनिवार्य होता था और पूरे पच्चीस दिनों तक उन्हें सांसारिक घर-परिवार से दूर देवालयों में रहकर साधना करनी पड़ती थी। आज वही मंचन सिमटकर लगभग बारह से पंद्रह दिनों का रह गया है और मंच पर बाहरी कलाकारों की उपस्थिति दिखाई देती है।
पुराने समय में इन पवित्र स्वरूपों का चयन कोई साधारण अभिनय नहीं माना जाता था, बल्कि यह समाज द्वारा सौंपी गई एक बड़ी आध्यात्मिक जिम्मेदारी होती थी। चयनित पात्रों को लोग साक्षात विग्रह की भांति पूजते थे और मोहल्लों में उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेने की होड़ रहती थी। पात्रों को चौपाइयों के गायन, संवाद अदायगी और धार्मिक नियमों का गहन अभ्यास कराया जाता था। एक बार जिस भूमिका को जो पात्र अपनाता था, वह पूरे उत्सव में उसी एक रूप में लीन रहता था। शहर के अलग-अलग मोहल्लों में विभिन्न प्रसंग मंचित होते थे, जैसे पत्थर वाले बाजार में आकाशवाणी का दृश्य और अन्य खुले स्थानों पर राजगद्दी का प्रसंग। मंचन समाप्त होने के उपरांत सभी पात्र विधि-विधान से पतित पावनी गंगा में स्नान कर ही अपने गृहस्थ जीवन में लौटते थे।
वरिष्ठ कलाकार बताते हैं कि अतीत में सार्वजनिक धार्मिक सभा रामलीला समिति पूरी निष्ठा से स्थानीय प्रतिभाओं को मंच देती थी। उस दौर में माता जानकी और फिर एक दशक से अधिक समय तक प्रभु श्रीराम की भूमिका निभाने वाले स्थानीय कलाकार याद करते हैं कि पहले पात्रों के भीतर जो समर्पण, पवित्रता और सेवा भाव होता था, वह आज के मशीनी और व्यावसायिक युग में दुर्लभ हो गया है। इसके बाद जब स्थानीय स्तर पर समय का अभाव होने लगा, तो मंचन के लिए मथुरा और वृंदावन की मंडलियों को आमंत्रित करने की शुरुआत हुई।
समय के साथ दर्शकों की व्यस्तता बढ़ी और आयोजकों ने मंचन की अवधि घटा दी। अब अलग-अलग बाजारों में घूमने के बजाय अधिकांश प्रसंग एक ही निश्चित मंच पर प्रस्तुत किए जाते हैं। हालांकि आज भी नगर के खाद्यान्न व्यापारी, दाल मिल संचालक, आढ़ती और कपास कारोबारी इस धार्मिक उत्सव को संपन्न कराने के लिए आर्थिक संसाधन जुटाते हैं।
इसके साथ ही पारंपरिक भजन गायन और पूज्य संतों के आशीर्वाद की अनूठी प्रथाएं भी अब मंद पड़ चुकी हैं। पहले राम वनवास जैसे भावुक प्रसंगों पर स्थानीय गायकों की टोलियां करुणामयी भजनों से दर्शकों की आंखें नम कर देती थीं। राम बारात के समय दूल्हे के भेष में सजे स्वरूप गोवर्धन जाकर संतों से शुभाशीष प्राप्त करते थे। उस समय के प्रसंगों से समाज को पारिवारिक प्रेम, मातृ-पितृ भक्ति और स्वामी सेवा की गहरी सीख मिलती थी। भले ही आधुनिक दौर में पेशेवर मंडलियों के आने से स्थानीय सहभागिता कम हुई हो, लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं के कारण यह रामलीला आज भी हाथरस की प्रमुख सांस्कृतिक धरोहर बनी हुई है।
What's Your Reaction?



