'कार कोई खिलौना नहीं': 3 लोगों की जान लेने वाले नाबालिग के पिता पर चलेगा मुकदमा, कर्नाटक हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
कर्नाटक हाईकोर्ट ने नाबालिग बेटे द्वारा कार से 3 लोगों को कुचलने के मामले में पिता के खिलाफ मुकदमा जारी रखने का आदेश दिया है। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि कार कोई खिलौना नहीं है।
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सड़क सुरक्षा और नाबालिगों द्वारा अनियंत्रित वाहन चलाने के गंभीर मामलों पर एक बेहद महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल कायम करते हुए कर्नाटक उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि मोटर वाहन कोई खिलौना नहीं हैं जिन्हें बच्चों के हाथों में खेलने के लिए थमा दिया जाए। उच्च न्यायालय ने उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें एक पिता ने अपने नाबालिग बेटे द्वारा तीन लोगों की जान लेने वाली सड़क दुर्घटना के मामले में खुद के खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे को रद्द करने की गुहार लगाई थी। अदालत ने आदेश दिया है कि पिता को इस मामले में नियमित अदालती सुनवाई (ट्रायल) का सामना करना ही होगा।
मामले की सुनवाई करते हुए पीठ ने अत्यंत सख्त टिप्पणी दर्ज की। अदालत ने कहा कि माता-पिता की यह मूलभूत कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि उनके नाबालिग बच्चे, जिनके पास न तो वैध ड्राइविंग लाइसेंस है और न ही वाहन चलाने की परिपक्वता, सार्वजनिक सड़कों पर चार पहिया वाहन लेकर न निकलें। जब एक अभिभावक अपने नाबालिग बच्चे को कार की चाबी सौंपता है या वाहन तक उसकी खुली पहुंच की अनुमति देता है, तो वह संभावित खतरे से अनजान नहीं हो सकता।
प्रकरण के अनुसार, नाबालिग वाहन चालक ने लापरवाही और तेज गति से गाड़ी चलाते हुए तीन निर्दोष लोगों को कुचल दिया था, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई थी। पुलिस जांच में यह सामने आया कि वाहन पिता के नाम पर पंजीकृत था और नाबालिग को वाहन चलाने की सुविधा घर से ही मिली थी। इसके बाद पुलिस ने मोटर वाहन संशोधन अधिनियम (एमवीए) की सख्त धाराओं और भारतीय दंड संहिता (अब भारतीय न्याय संहिता) के सुसंगत प्रावधानों के तहत वाहन स्वामी पिता को भी सह-अभियुक्त बनाया था।
पिता की ओर से अदालत में दलील दी गई थी कि दुर्घटना के समय वह मौके पर मौजूद नहीं थे और दुर्घटना के लिए केवल चालक को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस तर्क को पूरी तरह अस्वीकार्य करार दिया। अदालत ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 199ए का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि नाबालिग द्वारा किए गए अपराध की स्थिति में वाहन का स्वामी अथवा अभिभावक तब तक दोषी माना जाएगा जब तक कि वह यह साबित न कर दे कि अपराध उसकी जानकारी के बिना हुआ था या उसने इसे रोकने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए थे। अदालत के इस फैसले से उन अभिभावकों के लिए कड़ा कानूनी संदेश गया है जो नाबालिग बच्चों को खुलेआम दोपहिया या चारपहिया वाहन चलाने की छूट देते हैं।
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