Bombay High Court on ECI: सॉफ्टवेयर की गलतियों पर बॉम्बे हाईकोर्ट सख्त, चुनाव आयोग से पूछा- क्या तकनीक कानून से ऊपर हो गई?
Bombay HC on Election Commission: बॉम्बे हाईकोर्ट ने गोवा में विशेष सारांश संशोधन (SIR) और मतदाता सूची में गड़बड़ी को लेकर चुनाव आयोग के तकनीकी रवैये पर तीखा तंज कसा है।
- 'कानून भूलकर सिर्फ सॉफ्टवेयर के पीछे भागें?': SIR को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट की चुनाव आयोग को कड़ी फटकार, मतदाता सूची में गड़बड़ी पर उठाए सवाल
- Goa SIR Voter List Row: मतदाता सूची से जुड़े मामले पर बॉम्बे हाई कोर्ट की चुनाव आयोग पर तल्ख टिप्पणी, सॉफ्टवेयर बाध्यताओं पर जताया ऐतराज
- चुनाव आयोग पर बॉम्बे हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणी: क्या आयोग के सॉफ्टवेयर की वजह से नागरिकों के कानूनी अधिकार छीन लिए जाएंगे?
बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) की गोवा पीठ ने मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (Special Summary Revision - SIR) और सॉफ्टवेयर की तकनीकी खामियों को लेकर भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के प्रशासनिक रवैये पर अत्यंत तल्ख टिप्पणी की है। अदालत ने आयोग द्वारा कानूनी प्रावधानों के ऊपर तकनीकी सॉफ्टवेयर की सीमाओं का हवाला देने पर नाराजगी जाहिर करते हुए तीखे शब्दों में कहा—"क्या हमें कानून को भूल जाना चाहिए और केवल सॉफ्टवेयर के पीछे भागना चाहिए?"
उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि निर्वाचन आयोग का प्राथमिक संवैधानिक दायित्व निष्पक्ष, सटीक और पारदर्शी मतदाता सूची तैयार करना है। कोई भी तकनीकी प्रणाली या डिजिटल सॉफ्टवेयर कानून के स्थापित नियमों और नागरिकों के मताधिकार की रक्षा करने वाले वैधानिक प्रावधानों का स्थान नहीं ले सकता।
- क्या है पूरा मामला और विवाद की जड़?
यह पूरा मामला गोवा में मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) के दौरान सामने आई विसंगतियों से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष शिकायत दर्ज कराई थी कि मतदाता सूची में संशोधन, नाम जोड़ने और पते में परिवर्तन की प्रक्रियाओं के दौरान तकनीकी गड़बड़ियों के चलते कई वैध मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
जब निर्वाचन आयोग के कानूनी प्रतिनिधियों ने अदालत में यह दलील दी कि आयोग का केंद्रीय सॉफ्टवेयर कुछ खास प्रक्रियाओं या सुधारों को तय प्रारूप के बाहर स्वीकार नहीं करता अथवा सॉफ्टवेयर में तकनीकी सीमाओं के कारण तत्काल बदलाव संभव नहीं हो पा रहा है, तो इस पर खंडपीठ का धैर्य जवाब दे गया।
अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह अस्वीकार्य बताते हुए कहा कि चुनाव आयोग द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा सॉफ्टवेयर कानून को लागू करने और नागरिकों की सुविधा के लिए बनाया गया साधन मात्र है, न कि वह कानून की व्याख्या को सीमित करने वाला कोई स्वतंत्र नियम।
- तकनीकी सीमाओं के नाम पर अधिकारों की अनदेखी नहीं
बॉम्बे हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि यदि आयोग के किसी सॉफ्टवेयर में कोई प्रक्रियागत या तकनीकी खामी है, तो आयोग का यह दायित्व है कि वह अपने तकनीकी तंत्र को वैधानिक नियमों के अनुरूप ढाले, न कि नागरिकों से यह उम्मीद करे कि वे अपने कानूनी अधिकारों को सॉफ्टवेयर के मुताबिक सीमित कर लें।
न्यायालय ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता पहचान और मताधिकार की शुचिता सर्वोपरि होती है। यदि कोई नागरिक कानून के तहत मतदाता बनने या सूची में संशोधन कराने की योग्यता रखता है, तो किसी सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर की जटिलता उसे इस अधिकार से वंचित करने का वैध आधार नहीं बन सकती।
- चुनाव आयोग के डिजिटल तंत्र पर उठते सवाल
हाल के वर्षों में निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूची के डिजिटलीकरण, ऑनलाइन फॉर्म सबमिशन और मतदाता डेटाबेस के प्रबंधन के लिए विशेष आईटी प्लेटफॉर्म्स और अनुप्रयोगों को अनिवार्य बनाया है। हालांकि, देश के विभिन्न हिस्सों से अक्सर यह शिकायतें आती रही हैं कि सिस्टम में स्वचालित डुप्लिकेशन चेक, नाम विलोपन (डिलिशन) और पते के सत्यापन के दौरान तकनीकी खामियों के चलते वास्तविक मतदाताओं के नाम गायब हो जाते हैं या उनमें गलतियां रह जाती हैं।
बॉम्बे उच्च न्यायालय की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब तकनीकी निर्भरता और कानूनी जवाबदेही के बीच का संतुलन देशभर की अदालतों में बहस का विषय बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च न्यायालय का यह कड़ा रुख निर्वाचन आयोग को अपने तकनीकी बुनियादी ढांचे में व्यापक सुधार करने और मानवीय निगरानी को प्राथमिकता देने के लिए बाध्य करेगा।
अदालत ने निर्वाचन आयोग के संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे कानून की मूल भावना के अनुरूप कार्य करें और अगली सुनवाई से पूर्व मामले में आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाकर विस्तृत जवाब दाखिल करें।
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