Mathura News: मथुरा की 19 साल से बंद छाता चीनी मिल में लगेगा एथेनॉल प्लांट, 200 करोड़ की लागत से बदलेगी तस्वीर
मथुरा की 19 वर्षों से बंद छाता चीनी मिल में ₹200 करोड़ से अधिक की लागत से 3.96 करोड़ लीटर क्षमता का एथेनॉल प्लांट लगेगा। गन्ने के अलावा मक्का और धान से भी उत्पादन होगा।
मथुरा/लखनऊ। उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र में लगभग दो दशकों से बंद पड़ी एक ऐतिहासिक औद्योगिक धरोहर को पुनर्जीवित करने का रास्ता साफ हो गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में लखनऊ में आयोजित कैबिनेट बैठक में मथुरा जनपद की छाता चीनी मिल परिसर में अत्याधुनिक एथेनॉल प्लांट की स्थापना के प्रस्ताव को विधिवत मंजूरी दे दी गई। इस परियोजना पर 200 करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी का निवेश किया जाएगा। प्लांट की वार्षिक उत्पादन क्षमता 3.96 करोड़ लीटर (लगभग 120 किलो लीटर प्रतिदिन) निर्धारित की गई है।
कैबिनेट बैठक के उपरांत प्रदेश के गन्ना विकास एवं चीनी मिल मंत्री चौ. लक्ष्मीनारायण ने इस ऐतिहासिक फैसले का विस्तृत विवरण साझा किया। उन्होंने बताया कि छाता चीनी मिल पिछले 19 वर्षों से पूरी तरह निष्क्रिय और बंद पड़ी थी। पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान इस मिल को दोबारा चालू करने के लिए कोई ठोस वित्तीय कदम नहीं उठाया गया, जिससे क्षेत्रीय किसानों और श्रमिकों को भारी निराशा हाथ लगी थी। अब वर्तमान सरकार ने इसे बहु-उपयोगी ऊर्जा उत्पादन केंद्र के रूप में विकसित करने का नीतिगत फैसला किया है।
साल के 11 महीने चलेगा उत्पादन चक्र: गन्ने के साथ मक्का और धान का होगा उपयोग
परियोजना की सबसे बड़ी तकनीकी विशेषता इसका 'मल्टी-फीडस्टॉक' (Multi-feedstock) मॉडल होना है। पारंपरिक रूप से चीनी मिलें और उनसे जुड़ी डिस्टिलरी केवल गन्ना पेराई सत्र के दौरान ही 4 से 5 महीने चल पाती हैं, जिसके बाद वे कच्चे माल के अभाव में बंद हो जाती हैं। लेकिन छाता में लगने वाला यह एक्सटेंशन प्लांट साल के 12 में से 11 महीने निरंतर संचालित किया जाएगा।
योजना के अनुसार, गन्ना पेराई सत्र समाप्त होने के बाद जब शीरा (Molasses) या गन्ने का रस उपलब्ध नहीं होगा, तब प्लांट में मोटे अनाजों का उपयोग किया जाएगा। इसमें विशेष रूप से मक्का (Corn) और टूटे हुए चावल या धान (Paddy/Rice) से एथेनॉल तैयार किया जाएगा। इस व्यवस्था से प्लांट में मशीनरी idle नहीं रहेगी और उत्पादन लागत में स्थिरता बनी रहेगी।
मथुरा और आसपास के किसानों के लिए वरदान
इस एकीकृत प्लांट का सीधा प्रभाव मथुरा, आगरा, हाथरस, अलीगढ़ और सीमावर्ती जनपदों के कृषि परिदृश्य पर पड़ेगा:
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फसल विविधीकरण को प्रोत्साहन: केवल पारंपरिक फसलों तक सीमित रहने वाले स्थानीय किसानों को अब मक्का जैसी कम पानी वाली फसलों की गारंटीड बिक्री का अवसर मिलेगा।
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गन्ना किसानों को राहत: ब्रज और पश्चिमी यूपी के गन्ना उत्पादकों को फसल बेचने के लिए दूर की मिलों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। स्थानीय स्तर पर खरीद सुनिश्चित होने से समय और ढुलाई खर्च की बचत होगी।
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अन्नदाताओं की आय में वृद्धि: धान और मक्के की स्थानीय मांग बढ़ने से किसानों को अपनी उपज का लाभकारी और समयबद्ध भुगतान मिल सकेगा।
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से 40 मिनट की दूरी: लॉजिस्टिक्स का रणनीतिक केंद्र
छाता चीनी मिल परिसर की भौगोलिक स्थिति इस परियोजना के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ बनकर उभरी है। यह परिसर जेवर में स्थित आगामी नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से लगभग 40 मिनट की दूरी पर स्थित है। साथ ही यह क्षेत्र राष्ट्रीय राजमार्ग (दिल्ली-आगरा हाईवे) और रेलवे फ्रेट कॉरिडोर के नेटवर्क से सीधा जुड़ा हुआ है।
इस रणनीतिक कनेक्टिविटी को देखते हुए शासन की योजना केवल एक डिस्टिलरी लगाने तक सीमित नहीं है। मिल के पास उपलब्ध लगभग सैकड़ों एकड़ अतिरिक्त भूमि पर वेयरहाउसिंग (गोदाम), एग्री-लॉजिस्टिक्स हब और कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं विकसित करने की रूपरेखा भी तैयार की जा रही है। एयरपोर्ट से सीधा जुड़ाव होने के चलते यहां उत्पादित जैव-ईंधन और संबंधित सह-उत्पादों (By-products) को देश-विदेश के औद्योगिक गलियारों तक तेजी से भेजा जा सकेगा।
हजारों युवाओं को रोजगार और हरित ऊर्जा का लक्ष्य
इस 200 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजना के धरातल पर उतरने से स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे। तकनीकी पदों, जैसे प्लांट ऑपरेटर, केमिकल इंजीनियर और लैब टेक्नीशियन के साथ-साथ परिवहन, लोडिंग, सुरक्षा और पैकेजिंग जैसे क्षेत्रों में स्थानीय ग्रामीण युवाओं को प्राथमिकता के आधार पर कार्य मिलेगा।
इसके अलावा, यह प्लांट केंद्र सरकार के 'एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम' (पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण के राष्ट्रीय लक्ष्य) में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी को मजबूती प्रदान करेगा। कच्चे तेल के आयात को घटाने और कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में गन्ने और मोटे अनाज से बनने वाला यह जैव-ईंधन पर्यावरण के लिए भी गेमचेंजर सिद्ध होगा।
गन्ना विकास विभाग अब कंसेंशन-कम-लीज अथवा आवश्यक अनुबंध प्रणाली के माध्यम से कार्यदायी एजेंसी के चयन और संयंत्र की नींव रखने की प्रशासनिक प्रक्रिया को तेजी से अंतिम रूप देने में जुट गया है।
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