मित्र पत्रकार, मेरे भीतर बहुत शोर है…!
सुनो मित्र पत्रकार, मेरे भीतर इतना शोर है कि बाहरी दुनिया के कौतूहल का कोई स्वर अब मुझ तक पहुँच ही नहीं पाता।
मित्र पत्रकार, मेरे भीतर बहुत शोर है…!
सुनो मित्र पत्रकार,
मेरे भीतर इतना शोर है कि बाहरी दुनिया के कौतूहल का कोई स्वर अब मुझ तक पहुँच ही नहीं पाता।
पत्रकारिता के तमाम भ्रम मेरे भीतर कहीं एक-एक कर टूट रहे हैं। अंतर्मन के किसी कोने में जैसे एक ऐसा मलबा इकट्ठा होता जा रहा है, जो एक दिन मेरे अस्तित्व को ही ध्वस्त कर देगा। वक्त मुट्ठी से रेत की तरह फिसलता जा रहा है और मैं हूँ कि दिन-ब-दिन क्षीण होता जा रहा हूँ।
मित्र पत्रकार, मैं अशक्त हूँ, शिथिल हूँ। अपने ही भीतर पसरते अँधेरे को देख रहा हूँ, किंतु उसे रोकने के लिए स्वयं को असमर्थ पा रहा हूँ। कभी जिन सवालों के उत्तर तलाशने के लिए कलम उठाई थी, आज उन्हीं सवालों के बीच अपने अस्तित्व का अर्थ खोज रहा हूँ।
स्याह रातें अब केवल सोने की औपचारिकता निभाने भी नहीं आतीं। वे मौन का लिबास ओढ़कर मेरी आत्मा की गहराइयों में उतरती हैं। मेरी पीड़ा का सूक्ष्म निरीक्षण करती हैं, मेरे अंतर्द्वंद्व का गहन अध्ययन करती हैं और फिर मुझे मेरे ही सवालों के सामने अकेला छोड़ देती हैं।
इसके बाद वे मेरे अंतःकरण को धीरे-धीरे कठोरता की ओर धकेलती हैं। मेरी संवेदनशीलता, मेरी करुणा और मेरे भीतर बची हुई मनुष्यता को धराशायी करने लगती हैं। न जाने कितनी भावनाएँ हैं, जिन्हें मैं अब अपने ही भीतर दम तोड़ते हुए महसूस करता हूँ।
डरता हूँ, मित्र पत्रकार!
कहीं ऐसा न हो कि दुनिया के दुख लिखते-लिखते मैं स्वयं इतना कठोर हो जाऊँ कि किसी का दर्द महसूस करना ही भूल जाऊँ। कहीं ऐसा न हो कि अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने वाला मेरा स्वर, मेरे ही भीतर उठते शोर में कहीं खो जाए। कहीं ऐसा न हो कि सच लिखने की जिद में मैं अपने भीतर बचे हुए उस इंसान को ही खो दूँ, जिसके कारण कभी पत्रकारिता से प्रेम हुआ था।
अब कोई मुझे यह बताए कि जिसके भीतर इतना शोर हो, उसके कानों तक बाहरी दुनिया की आवाज आखिर पहुँचे भी तो कैसे?
वह तो स्वयं अपने मौन को ओढ़े, अपने ही अंतर्द्वंद्व से जूझ रहा होगा। बाहर की दुनिया उसे उदासीन समझती होगी, जबकि वह भीतर जाने कितनी लड़ाइयाँ हार और जीत रहा होगा।
मित्र पत्रकार, हर मौन सहमति नहीं होता, हर खामोशी अहंकार नहीं होती और हर दूरी किसी से नाराजगी का संकेत भी नहीं होती।
कभी-कभी मनुष्य इसलिए भी चुप हो जाता है, क्योंकि उसके भीतर कहने के लिए इतना कुछ होता है कि शब्द ही उसका साथ छोड़ देते हैं।
और शायद मैं भी आज उसी मोड़ पर खड़ा हूँ…
जहाँ कलम अब भी मेरे हाथ में है, सवाल अब भी मेरे भीतर हैं, लेकिन उत्तर खोजने की शक्ति कहीं थककर बैठ गई है।
मैं दुनिया को जगाते-जगाते स्वयं अपने भीतर की नींद खो चुका हूँ।
और अब, मित्र पत्रकार, मुझे कुछ देर के लिए दुनिया की आवाज नहीं, अपने भीतर के शोर से मुक्ति चाहिए।
क्योंकि जब भीतर का मनुष्य ही टूटने लगे, तब बाहर की दुनिया को बचाने की लड़ाई भी कितनी कठिन हो जाती है…!
तुम्हारा मित्र -राजेन्द्र सिंह जादौन
What's Your Reaction?

