स्मृति शेष:-हिन्दी,भोजपुरी,पत्रकारिता जगत के अनमोल रतन- बहु आयामी व्यक्तित्व डॉ अर्जुन तिवारी

मैंने ने डॉ स्व. श्री अर्जुन तिवारी साहब पर एक आलेख लिखा था जो आज मिल गया तो सोचा शेयर कर दूं... श्री गिरिजेश जी ने लिखने

By INA News Desk
Oct 24, 2026 - 12:19
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स्मृति शेष:-हिन्दी,भोजपुरी,पत्रकारिता जगत के अनमोल रतन- बहु आयामी व्यक्तित्व डॉ अर्जुन तिवारी
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बहु आयामी व्यक्तित्व डॉ अर्जुन तिवारी (जन्म तिथि)

मैंने ने डॉ स्व श्री अर्जुन तिवारी साहब पर एक आलेख लिखा था जो आज मिल गया तो सोचा शेयर कर दूं... श्री गिरिजेश जी ने लिखने को कहा था तो....


प्रो..( डॉ.) श्री अर्जुन तिवारी जी:- मुझे आप जैसे विशाल एवं विराट व्यक्तित्व के बारे में दो शब्द लिखने का परम् सौभाग्य प्राप्त हुआ है इसके लिए विद्वान पिता के विद्वान पुत्र श्री गिरिजेश तिवारी जी का आजीवन आभारी रहूंगा। मुझे तो ऐसा लग रहा है मानो मेरे लिए यही सरस्वती और श्लाका पुरस्कार  है।।

धन बल तो बहुतों के पास होता है,
नौकरी भी  तो बहुत लोग करते हैं।

जिसका बचपन तपिश में गुजरा है
उसमें से अर्जुन तिवारी निकलते हैं।

आपका जन्म 24 अक्टूबर सन् 1941 ईस्वी ग्राम -देवढ़ियां, पोस्ट -परसागढ़, जनपद - सारण, बिहार राज्य में हुआ था। यह वही पवित्र भूमि है जहां पर अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा जैसे कालजई महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने 4-5 वर्षो तक रहकर मठ में साधना में एक साधक रहे। डॉ अर्जुन तिवारी जी के पिता श्री रास बिहारी तिवारी जी बिहार पुलिस में थे, पितामह श्री जगदम्ब तिवारी, चाचा श्री मदन तिवारी जी काशी में पुरोहिती का काम करते थे...इन सभी विद्वतजनों का इनके उपर काफी प्रभाव पड़ा। चाचा जी के सौजन्य से अपने तीनों भाईयों यथा सच्चिदानन्द तिवारी, दिनेश्वर तिवारी, अर्जुन तिवारी काशी विद्याध्ययन हेतु आ गये। अपने चाचा जी के सहयोग से आपका प्रवेश डी. ए.वी. में हो गया और यहीं से इंटरमीडिएट तक की शिक्षा पूरी की। अपने चाचा जी के कर्त्तव्य परायणता और विश्वास को ध्यान में रखते हुए बालक अर्जुन रात-दिन सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई में ही लगे रहते थे... चाहे कैसी भी परिस्थिति आ जाती यह बालक उन विषम परिस्थितियों में भी बिल्कुल नहीं घबराता बल्कि और दृढ़ संकल्प से अपने कर्तव्य पथ से बिना बिचलित हुए पढ़ने का पुनीत कार्य करते रहे और परिश्रम भी ईश्वर की कृपा से चाचा जी की छत्रछाया में फलित होता रहा एक अजीब इत्तेफाक यह भी है कि एक अंग्रेजी का विद्यार्थी हिन्दी में भी समान अधिकार रखता था। उसके बाद क्रमशः स्नातक, स्नातकोत्तर (अंग्रेजी से), तत्पश्चात हिन्दी विषय से भी स्नातकोत्तर कर लिये।।जब डी. ए.वी. में पढ़ रहे थे तो वहां के स्वनामधन्य श्री बेढब बनारसी का आपके जीवन पर अमिट प्रभाव पड़ा....आपके गुरु भी थे।

पढ़ने  वाले  तो लाखों  में होते हैं 
करोड़ो श्री अर्जुन तिवारी होते हैं ।।

अब नौकरी का सफरनामा शुरू हुआ... भाटपार रानी( देवरिया) 1946 ईस्वी में बाबा राघव दास कृषक इंटर कॉलेज में अंग्रेजी के प्रवक्ता थे जबकि हिन्दी भी पढ़ाना नहीं भूलते थे ‌। सन् 1980 में मदन मोहन मालवीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिन्दी के व्याख्याता नियुक्त किए गए। सन् 1979 में गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के मूर्धन्य साहित्यकार एवं विद्वान आचार्य श्री रामचन्द्र तिवारी जी के निर्देशन में "पूर्वी उत्तरप्रदेश में हिन्दी पत्रकारिता का उद्भव एवं विकास" विषय पर अपना शोध प्रबंध पूर्ण किये।

कौन  जानता  था  तिमिर को चीरने
तम के  तिलिस्म को  तोड़ने के लिए,

ये अर्जुन अदीप्त को  भेदने के लिए
ज्ञान प्रत्यंचा चढ़ाया रौशनी के लिए।

अध्यापन अनुभव:-पत्रकारिता एवं साहित्य का स्नातकोत्तर कक्षाओं में 34 वर्षों तक अध्यापन।
काशी विद्यापीठ (पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष) से अवकाश प्राप्त सन् 2001में।
सम्पादन:-शाश्वत शिक्षा शास्त्र,काशी विद्यापीठ कौस्तुभ गौरव ग्रंथ, रामेश्वर टांटिया रचनावली ‌।

वृत्त चित्र निर्माण -काशी विद्यापीठ,बाबा राघव दास, गांधी वृत्त चित्र निर्माण -निर्देशन।।

पुरस्कार/सम्मान:-1-उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ द्वारा सन् 1998 में अनुशंसित
2-सन 1999में नामित पुरस्कार से पुरस्कृत (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान)
3-दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा कर्नाटक द्वारा हिन्दी के विशिष्ट सेवा हेतु 1993 में सम्मान
4-बाबू विष्णु पराड़कर नामित पुरस्कार अलंकृत
5-राहुल सांकृत्यायन नामित पुरस्कार 2015
6-धर्मवीर भारती सर्जना पुरस्कार
7-प्रो विद्यानिवास मिश्र स्मृति पत्रकारिता सम्मान
8-पूर्वांच्चल रत्न सम्मान
9-विभिन्न संस्थाओं से अभिनंदन एवं स्मृति चिन्हों द्वारा सम्मानित।।
 चीरकर अंधेरा शाश्वत चिरन्तन
विषम  परिस्थितियों में निरन्तर।

अपने नाम  को चरितार्थ करना
ओढ़ लिया  परिश्रम  का गहना।

आपकी पहली पुस्तक "स्वतंत्रता आंदोलन और हिन्दी पत्रकारिता" सन् 1980 में प्रकाशित हुई.विमोचन डॉ ठाकुर प्रसाद सिंह जी, श्री जयदेव सिंह जी, पंडित श्री केशव चन्द मिश्र, विश्वविद्यालय प्रकाशन के पुरुषोत्तम दास मोदी द्वारा संयुक्त रूप से भारतीय मनीषा के सर्वश्रेष्ठ विद्वतजनों द्वारा हुआ।

अक्सर यही देखा गया है कि कोई अगर विद्वान है तो उनका एक ही विषय होता है लेकिन इनमें एक अलौकिक तेज था ईश्वरीय वरदान जैसा रहा तभी हिन्दी, अंग्रेजी, भोजपुरी और पत्रकारिता विषयों पर समान अधिकार रखते थे।।
धन्य हैं विधाता और विधाता की महिमा जिनकी कृपा से अपने अनहद परिश्रम के बल पर अनन्त ज्ञान के ज्ञानकोश रहे आप।
आपके द्वारा प्रकाशित ग्रंथों को लिखना भी बड़ा कठिन कार्य है.. जहां तक मुझे ज्ञात है श्री भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी ने अल्प समय में जितने ग्रंथों को लिखा था उसी प्रकार आपका भी है।।

भाग्य को जिसने कर्म से बदल डाला
था कठिन संघर्ष करना तो कर डाला।
चाचा जी के विश्वास  को सार्थक कर
अपने आपको ज्ञान में ही उड़ेल डाला।

1-स्वतंत्रतता आन्दोलन एवं हिन्दी पत्रकारिता
2-भज गोविन्दम
3-शंकर रत्नमालिका
4-आधुनिक पत्रकारिता
5-जनसंचार एवं हिन्दी पत्रकारिता
6-हिन्दी पत्रकारिता का वृहद इतिहास
7- इतिहास निर्माता पत्रकार
8-कषि ग्रामीण विकास पत्रकारिता
9-ई-जर्नलिज्म
10-राष्ट्रपिता की पत्रकारिता
11-पराड़कर जी -एक जीवनी
12-सम्पादकाचार्य पंडित अम्बिका प्रसाद वाजपेयी
13-मीडिया समग्र
14-जनसंपर्क सिद्धांत एवं व्यवहार
15-आधुनिक विज्ञापन
16-सम्पूर्ण पत्रकारिता
17-सद्भाव -सेतु -शंकर
18-देवराहा दर्शन
19-हिन्दी व्याकरण और रचना
20-भोजपुरी साहित्य का इतिहास
21-भोजपुरी- हिन्दी -अंग्रेजी -त्रिभाषी शब्दकोश
22-भोजपुरी लोकोक्ति सागर
23-भोजपुरी हिन्दी शब्दकोश
24-समकालीन भोजपुरी साहित्य क समीक्षा अध्ययन
25-आजादी के लड़ाई आ जुझारू भोजपुरिया
26-प्रेरणापुंज बापू विराट
27- सोशल मीडिया 

हिन्दी प्रोत्साहन विशेषज्ञ समिति:- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा गठित उच्च शिक्षा में हिन्दी प्रोत्साहन विशेषज्ञ समिति के अध्यक्ष के रूप में अपनी सक्रियता से 16 विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभाग की स्थापना में सफलता प्राप्त करवाया आपने।

बहुत विद्वान  ज्ञानी  हुए  हैं, होंगे भी
लेकिन हिन्दी ,भोजपुरी, पत्रकारिता।

तीनों पर समान अधिकार  प्राप्त कर
अचंभित कर दिया गुणीजनों को भी।

नहीं  कोई  दूसरा  अकेला ऐसा होगा
अर्जुन   तिवारी  बनने का स्वप्न होगा।

ऐसा कोई नहीं गांव और  शहर होगा
जहां पे इनका डंका  नहीं बजा होगा।

एक अर्जुन  तिवारी  जी ही जन्म लिये
अब  नहीं  कोई  अर्जुन  तिवारी होगा।

आया अप्रैल 23, दिन था  भी मनहूस
सन् इक्कीस  में  विधाता  लिये छीन।

आपकी विद्वता के हिसाब से आपको
मिलना चाहिए हिन्दी सम्मान ज्ञानपीठ।

सरस्वती,श्लाका और आपके लिए तो
बना हुआ है पद्म भूषण जैसे आभूषण।

हम मांगते हैं सरकार से अब भी दे दें
आपका  सम्मान  भी होगा  सम्मानित।

जन्मदिन:-अप्रैल 24 सन 1941
लेख स्वरचित एवं मौलिक
@सर्वाधिकार सुरक्षित।।


                            लेखक: राम बहादुर राय                            
भरौली,बलिया,उत्तरप्रदेश
पिन कोड-277501

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