लेखक: हरेराम सिंह
चौदह सौ पचपन साल गए, चन्द्रवार इक ठाठ ठये ।
ज्येष्ठ सुदी, बरसाइत की पूरनमासी प्रकट भये ।।
'चरित्र बोध' में कबीरदास का जन्म 1455 विक्रमी ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा को ( सन् 1398 ई.) को माना जाता है और जन्म- स्थान काशी । काशी में उनका रहना हुआ और मृत्यु बस्ती जिला के मगहर में बताया जाता है । विभिन्न मतभेदों के बावजूद उनके जन्म से लेकर वैचारिक स्तर पर, अब तक जिस रूप में और जितना, जाना और स्वीकार किया गया- वह पर्याप्त नहीं है । कबीर उससे कहीं आगे की चीज हैं और बहुत भिन्न भी । कबीर को नापसंद करने वाले उन पर तरह- तरह के आरोप गढ़ते आए, किंतु कबीर ने उन सबकी कभी परवाह नहीं की । ऐसे लोगों को कबीर के जन्म से लेकर, उनके विचार तक में असंगति ही असंगति दिखाई देती है । वे कबीर का पाठ अभी भी गलत तरीके से करने के आदि हैं । इसी वजह से कबीर अभी तक ठीक से पढ़े नहीं गए।
कबीर को किसी ने हिन्दूवादी नजरिए से देखा तो किसी ने मुस्लिम नजरिए से । किंतु कबीर इन दोनों से भिन्न थे । बिल्कुल अलग । आज कबीर की प्रासंगिता और अधिक बढ़ गई है । क्योंकि कबीर के पास सवाल हैं और उन सवालों से टकराने की हिम्मत रुढ़िवादी लोगों में नहीं है । कबीर के तर्कों एवं उदाहरणों के आगे वे या तो निस्तेज़ हैं या धराशायी । यहीं कारण है कि कबीर की व्याख्या सांप्रदायिक नजरिए से नहीं किया जा सकता । क्योंकि कबीर सांप्रदायिक किसी भी तरीके से नहीं हैं और न समाज को सांप्रदायिक होने देना चाहते हैं ।
कबीर को समझने के लिए कई लोगों ने, अलग- अलग विद्वानों, मनीषियों ने अलग- अलग समय में, प्रयत्न किया । किसी ने कबीर के तत्त्वबोध को समझने की कोशिश की , तो किसी ने उनके ज्ञान को नकारा । आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ' हिन्दी साहित्य का इतिहास' में कबीर को बहुत नकारा है, फिर भी उनकी खुबियों को अंततः स्वीकार करने के सिवा उनके पास कोई रास्ता नही बच पाता है ।
सुभाष चंद्र कुशवाहा ने " कबीर हैं कि मरते नहीं" में कबीर को ‘एक नूर ते सब जन उपज्या’ तथा " एक बूँद एक मल मूतर एक चाम एक गुदा।/ एक जाति थै सब उपजा कौन बाह्मन कौन सूदा।।" के माध्यम से इन दोनों स्थापनाओं को अद्वैत, बौद्धों, सिद्धों, सूफियों और नाथों के प्रभाव से ग्रहण किया माना। वे यह भी मानते हैं कि यह प्रभाव, बहुदेववाद, छुआछूत और तत्कालीन कर्मकांडी पाखंडों को नकारने की आवश्यकता से ग्रहण किया गया था। यह जातिवाद और मूर्तिपूजा के विरुद्ध था तथा कबीर के समय उत्तर भारत में सूफी दर्शन का व्यापक प्रभाव था जो प्यार और समर्पण को ही अपनी भक्ति मानते थे। इस तरह सुभाष चंद्र कुशवाहा ने कबीर का समेकित मूल्यांकन प्रस्तुत किया जो बहुत हद तक पूर्ववर्ती आलोचकों की दृष्टि से बहुत भिन्न तथा अलग तरीके से किया था । कबीर को देखने-परखने का उनका तरीका बहुत हद तक बहुजनवादी था जो कि कबीर के विचार को, उन पर पड़े प्रभाव को स्पष्ट करता था ।
कबीर को जीना, एक अलग ही सुखानुभूति प्रदान करता है। उनका पाठ बहुत ही सुखद एवं बहुत ही आश्चर्यजनक है । डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह व डॉ. शशिकला कुमारी की " नए औजार से कबीर की खुदाई "(2026) पुस्तक का प्रकाशित होना, अपने आप में युग की बड़ी परिघटना है । इस पुस्तक में कबीर के काव्य को बौद्ध आलोचना दृष्टि से देखा गया है । इससे पूर्व सुभाषचंद्र कुशवाहा की पुस्तक " कबीर हैं कि मरते नहीं" (2020) आई थी । वह पुस्तक भी काफी पढ़ी गई । कारण कबीर को समझने के लिए जिस दृष्टि का सहारा लिया गया था, वह पूर्ववर्ती आलोचकों से बहुत हद तक भिन्न तथा लॉजिकल था, जहाँ कबीर हिन्दू कर्मकांड एवं बहुदेववाद से मुक्त दिखाई देते हैं और ऐसा वे हैं भी ।
प्रभाकर माचवे ने 'कबीर '(1984) लिखा । इस पुस्तक में कबीर के मूल तत्त्व को उन्होंने " ब्रह्म " समझा है और यह माना है कि वह देश, काल, गुण समस्त परिणामों से परे है । परम तत्त्व आनंद है जिसके आगे भौतिक सुख व्यर्थ है । यह परमतत्त्व ज्ञान का ही दूसरा रूप है । यह बरगद के बीज जैसा सूक्ष्म तथा विशाल है । इसकी तुलना उन्होंने सूफ़ियों के " नूर " से की है । बहुत हद तक कबीर को देखने - समझने का तरीका हजारी प्रसाद द्विवेदी की तरह होते हुए भी बहुत हद तक ईश्वरवादी एवं धार्मिक ही है जहाँ वे कहते हैं कि कबीर का ईश्वर इस्लाम के एकेश्वरवाद और हिंदू के बहुदेववाद से परे का है । फिर भी वे परमात्मा को बुद्ध के पर्याय के रूप में समझते हैं । जबकि बुद्ध आत्मावादी नहीं थे । हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 'कबीर'(1942) में आलोचना पुस्तक में कबीर पर नाथपंथियों के प्रभाव की खोजबीन की है, जिसके आदि प्रवर्तक स्वयं शिव माने जाते हैं । हजारी प्रसाद द्विवेदी ने निर्गुण शिव को कबी-पंथ के सत्यपुरुष के बराबर स्वीकार किया है और सगुण शिव को निरंजन पुरुष के तौर पर । शक्ति को आद्याशक्ति । कबीरदास की वाणियों में आया " नाद" शब्द को स्वयंवेद्य मानते हुए उसे ' निर्मल वेद' बताया है । उन्होंने लिखा है कि कबीर के सृष्टि- तत्त्व को समझने के लिए योगियों और तांत्रिकों के नाद और बिंदु, निर्गुण और सगुण तथा शक्ति और शिव के रहस्य को हमें अच्छी तरह मन में रख लेने की जरूरत है । वे इसके लिए " प्रथमे बीज कि खेतं ।" को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं । वे एक जगह लिखते हैं कि -" वे उस संत को अपना सारा जप- तप दलाली में भेंट कर देने को तैयार थे जो उन्हें सहज सुख के योग्य बना दे, जो उन्हें एक बूंद की 'राम-रस' चखा दे । यह राम ही उनकी सहजवस्था का सुख है ।"
है कोउ संत सहज सुख उपजै जाकों जप-तप देउँ दलाली ।
एक बूंद भरि देइ राम-रस, ज्यूँ भरि देई कलाली ।।
हजारी प्रसाद द्विवेदी को कबीर के " सहज सुख " में सीधे तौर पर " सहजयान" का प्रभाव नज़र नहीं आता । वहीं डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह को सीधे बुद्ध नज़र आते हैं हैं जिनके आगे सब कुछ तुच्छ है । बुद्ध सुख के खान हैं । डॉ.श्यामसुंदर दास ने " कबीर ग्रंथावली "(1928) में कबीर के बारे में मत है- " कबीरदास जी ने धार्मिक सिद्धांतों के साथ-साथ उनकी पुष्टि के लिए अनेक स्थानों पर अलौकिक आचरण अथवा व्यवहारों का वर्णन किया है । यदि उनकी वाणी का पूरा-पूरा विवेचन किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि उनके साखियों का विशेष संबंध लौकिक आचरणों से है तथा पदों का संबंध विशेष कर धार्मिक सिद्धांतों तथा अंशतः मौलिक आचरण से है ।"
कबीर करत है बीनती, भौसागर के ताई ।
बंदे ऊपरि जोर होत है, जँम कूँ बरिज गुसाई ॥
अली सरदार जाफ़री ने ' कबीर बानी'(1998) में कबीर के " निराकार, निरगुन, अविनासी, कर वाही को संग" को " क़ुल हू अल्लाह अहद"( क़ुरान की आयत जिसका अर्थ है कि अल्लाह एक है ।) के रूप में समझा है और पृष्ठ 16 पर लिखा है- " कबीरदास एक मुसलमान सूफ़ी थे जो हिंदू भक्ति की भाषा में बात कर रहे थे । चूँकि उन्होंने अपने आप को बार-बार जुलाहा कहा है इसलिए यह यक़ीन के साथ कहा जा सकता है कि उन्होंने इस्लाम का परित्याग नहीं किया था लेकिन उनकी धज हिंदुओं की-सी थी । माथे पर तिलक लगाते थे, और शरीर पर जनेऊ पहनते थे और साहस तो इतना था कि ब्राह्मणों पर व्यंग्य करते थे ।" जबकि इसके पूर्व कबीर की वाणी- " सरगुन की सेवा करो, निरगुन का करो ज्ञान/ निरगुन सरगुन के परे, तहीं हमारा ध्यान ।" को इस्लाम में इंसान की जिम्मेदारियों के बरअक्स पहला- ख़ुदा का हक़ तथा दूसरा बंदों का हक़ से जोड़ा । मतलब साफ़ है कि अली सरदार जाफ़री ने कबीर के दिल- व- दिमाग़ को इस्लाम के सिद्धांतों के नजदीक लाकर खड़ा करने की नाकाम कोशिश की है, क्योंकि कबीर सिर्फ़ इतना ही नहीं थे । कबीर के ठीक-ठीक मूल्यांकन के लिए ये हिन्दूवादी और इस्लामवादी दृष्टियाँ पर्याप्त कभी हो ही नहीं सकतीं ।
यह सही है कि कबीर की दृष्टि अपने समय में हर तरफ़ थी । कबीर जब चिंतन कर रहे होते हैं तब उनके आगे 'बराव' नहीं है । वह उचित उदाहरण प्रचलित मतों के बीच से ही चुनते हैं ताकि सहजता से अपनी बात कह दें और समझा भी दें । इसी क्रम में वे कभी हिन्दू और कभी इस्लाम के सिद्धांतों तथा संदर्भों से होते हुए गुजरते हैं तथा सत्य की तलाश करते हैं । मौलिकता के आगे कर्मकांड एवं उपरी दिखावा को बेजरूरियात करार देते हैं । कबीर को खींचकर किसी पाले में नहीं डाला जा सकता है । वे बुद्ध की तरह अटल हैं । समझ और सिद्धांतों से समझौता नहीं करने वाले । फिर भी आश्चर्य है कि सबके अपने- अपने कबीर हैं ! किंतु, कबीर का सत्य अटल है । वह न बहरा है, न गूँगा है और न ही विनाशी है । वह अविनाशी है । क्योंकि " सत्य " अविनाशी ही होता है । कबीर को बबूल का जंगल एवं अन्य संप्रदायों के बड़ा गाँव नहीं चाहिए, उनके लिए चंदन की कुटकी तथा साफ़ हृदय वाले इंसान(बैश्नों) की कुटिया ही प्यारी है ।
चंदन की कुटकी भली, नाँ बँबूर की अबराँऊँ ।
बैश्नों की छपरी भली, नाँ साषत का बड गाऊँ ।।
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