'जेलर-2' की चर्चा के बीच बड़ा सवाल: बस कंडक्टर शिवाजी राव गायकवाड़ कैसे बने भारतीय सिनेमा के 'सुपरस्टार रजनीकांत'?
'जेलर-2' की चर्चा के बीच समझिए कि बेंगलुरु में बस कंडक्टर रहे शिवाजी राव गायकवाड़ ने कैसे अपने अनोखे अंदाज, स्क्रीन प्रेजेंस और सहज व्यक्तित्व के दम पर रजनीकांत का ऐतिहासिक ब्रांड गढ़ा।
- परदे पर अनूठा स्वैग और ज़मीन से जुड़ाव: जानिए कैसे पाँच दशकों तक बॉक्स ऑफिस के सबसे बड़े ब्रांड बने रहे रजनीकांत
- रजनीकांत का 'सिनेमैटिक करिश्मा': विलेन के किरदारों से निकलकर कैसे गढ़ा दक्षिण से उत्तर तक का बेजोड़ स्टारडम
- जेलर' के बाद अगले अध्याय का इंतज़ार: समझिए रजनीकांत के ब्रांड की मजबूती और दर्शकों के साथ भावनात्मक रिश्ते का सच
भारतीय सिनेमा में कई नायक आए और गए, लेकिन रजनीकांत का नाम एक ऐसा नाम है जो पीढ़ी दर पीढ़ी सिनेमाई सीमाओं, भाषाई बाधाओं और उम्र के तकाजों से ऊपर बना हुआ है। हाल के दौर में निर्देशक नेल्सन दिलीपकुमार की फ़िल्म 'जेलर' की जबर्दस्त बॉक्स ऑफिस सफलता और उसके बाद इसके अगले भाग 'जेलर-2' को लेकर चल रही औपचारिक तैयारियों के बीच यह सवाल फिर चर्चा में है कि आख़िर बेंगलुरु ट्रांसपोर्ट सर्विस में कंडक्टर रहे शिवाजी राव गायकवाड़ भारतीय सिनेमा का इतना विराट ब्रांड कैसे बने?
रजनीकांत की यह यात्रा केवल हिट फ़िल्में देने भर की नहीं है। यह कहानी अभिनय शैली के नए व्याकरण, परदे पर एक ख़ास 'मैनरिज्म' की रचना और निजी जीवन की असाधारण सादगी के उस तालमेल की है, जिसे भारतीय सिनेमा ने बहुत कम अभिनेताओं में देखा है।
- खलनायकी से नायकत्व का सफ़र: के. बालचंदर की खोज
रजनीकांत की शुरुआत किसी पारंपरिक रोमांटिक नायक के तौर पर नहीं हुई थी। साल 1975 में निर्देशक के. बालचंदर ने फ़िल्म 'अपूर्व रागंगल' में उन्हें एक छोटा सा नकारात्मक किरदार दिया था। उस दौर में तमिल सिनेमा पर मुख्य रूप से सौम्य और क्लासिकल अभिनय का प्रभाव था।
रजनीकांत ने उस ढर्रे को तोड़ा। सिगरेट को हवा में उछालकर होंठों तक लाना, चश्मे को तेज़ी से घुमाना, कोट को एक ख़ास झटके से पहनना और तेज़ गति से चलने का उनका अंदाज़ दर्शकों को एक झटके में आकर्षित कर गया। सत्तर के दशक के अंत तक उन्होंने कई फ़िल्मों में विलेन और एंटी-हीरो की भूमिकाएं निभाईं, लेकिन उनके इसी ख़ास अंदाज़ ने उन्हें सीधे आम जनमानस, ख़ासकर युवाओं और कामगार तबके के बीच लोकप्रिय बना दिया।
- आम आदमी की आकांक्षाओं का प्रतिनिधि चेहरा
अस्सी और नब्बे के दशक में रजनीकांत ने 'मुरुट्टू कालई', 'बाशा', 'मुथु', 'अन्नामलाई' और 'पदयप्पा' जैसी फ़िल्मों के ज़रिए अपने स्टारडम को उस मुक़ाम पर पहुँचा दिया, जहाँ उनका नाम ही फ़िल्म की सफलता की गारंटी बन गया। इन फ़िल्मों की मूल संरचना में रजनीकांत अक्सर एक आम आदमी ऑटो चालक, दूधवाला, नौकर या मज़दूर की भूमिका में होते थे, जो अन्याय के ख़िलाफ़ अपनी ताक़त और ईमानदारी के बल पर खड़ा होता है।
इस सामाजिक पृष्ठभूमि वाले किरदारों ने उन्हें आम दर्शकों का नायक बना दिया। दर्शक सिनेमा हॉल में रजनीकांत के ज़रिए अपनी ही दमित आकांक्षाओं और संघर्षों की जीत देख रहे थे।
- परदे पर महानायक, परदे के पीछे निहायत सादगी
ब्रांड रजनीकांत का सबसे अनूठा पहलू यह है कि उनका सिनेमाई व्यक्तित्व और वास्तविक जीवन एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं। कैमरे के सामने जहाँ वे बेजोड़ ऊर्जा, आधुनिक स्टाइल और अजेय नायक के रूप में दिखते हैं, वहीं सार्वजनिक जीवन में वे सफ़ेद कुर्ते-पायजामे में बिना किसी विग, मेकअप या बनावट के स्वाभाविक रूप से सामने आते हैं।
भारतीय फ़िल्म उद्योग में जहाँ नायक अपनी उम्र और कमज़ोरियों को छिपाने की भरसक कोशिश करते हैं, रजनीकांत ने अपनी बढ़ती उम्र को कभी छिपाने का प्रयास नहीं किया। प्रशंसकों के बीच उनकी यह सच्चाई और आध्यात्मिक रुझान उनके प्रति सम्मान को केवल एक फ़िल्मी स्टार से आगे बढ़ाकर एक सांस्कृतिक प्रतीक में बदल देता है।
- जापान से लेकर उत्तर भारत तक का विस्तार
रजनीकांत की स्वीकार्यता सिर्फ़ दक्षिण भारत तक सीमित नहीं रही। अमिताभ बच्चन के समानांतर 'अंधा कानून', 'गिरफ्तार' और 'हम' जैसी हिंदी फ़िल्मों में उन्होंने उत्तर भारत के दर्शकों को भी अपना मुरीद बनाया।
वहीं, साल 1995 की फ़िल्म 'मुथु' जब जापान में 'मुथु: ओदोरू महाराजा' के नाम से रिलीज़ हुई, तो उसने वहां कमाई के नए कीर्तिमान बनाए और जापानी दर्शकों के बीच रजनीकांत का एक नया प्रशंसक वर्ग तैयार कर दिया।
- उम्र के सातवें दशक में भी बॉक्स ऑफिस का भरोसा
आज जब वे अपने जीवन के सातवें दशक में हैं, तब भी नई पीढ़ी के युवा निर्देशकों के साथ काम करते हुए वे नए सिनेमाई प्रयोगों का हिस्सा बन रहे हैं। 'जेलर' में टाइगर मुथुवेल पांडियन की भूमिका में उनका संयमित लेकिन विस्फोटक अंदाज़ यह साबित करता है कि उनका ब्रांड किसी एक दौर का मोहताज नहीं है। यही कारण है कि उनकी हर नई फ़िल्म या उसकी सीक्वल की सुगबुगाहट पूरे देश के सिनेमा बाज़ार में एक बड़ी हलचल पैदा कर देती है।
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