Special Article: शरद पूर्णिमा- चांदनी के बहाने जीवन में संवेदना और संतुलन की तलाश
भारतीय संस्कृति में प्रकृति केवल सौंदर्य की सृष्टा नहीं, अपितु जीवन-दर्शन की मौन व्याख्याता भी है। उसकी प्रत्येक ऋतु, प्रत्येक
लेखक- कुंवर शील वर्धन प्रताप नारायण सिंह
एडवोकेट/पत्रकार
वरिष्ठ उपाध्यक्ष
गोरखपुर प्रेस क्लब
भारतीय संस्कृति में प्रकृति केवल सौंदर्य की सृष्टा नहीं, अपितु जीवन-दर्शन की मौन व्याख्याता भी है। उसकी प्रत्येक ऋतु, प्रत्येक रंग और प्रत्येक रूप मनुष्य के अंतर्मन से संवाद करता है। कहीं वसंत नवजीवन का संदेश लेकर आता है, तो कहीं वर्षा विरहाकुल हृदय की अभिव्यक्ति बन जाती है। इन्हीं ऋतु-संवेदनाओं के मध्य शरद पूर्णिमा ऐसी अनुपम वेला है, जब आकाश में अवतरित पूर्णचंद्र अपनी धवल चांदनी से धरा को अभिसिंचित करता है और समूची प्रकृति किसी अलौकिक सौंदर्य में निमग्न प्रतीत होती है। वर्षा के अवसान के पश्चात निर्मल नभ, शीतल समीर और चंद्रकिरणों की रजत आभा मानो मनुष्य को सांसारिक आपाधापी से विरत होकर आत्मावलोकन का आमंत्रण देती है। यह पर्व केवल चंद्रदर्शन का अवसर नहीं, बल्कि जीवन में संवेदना, संतुलन और सद्भाव के पुनर्जागरण का सांस्कृतिक संदेश भी है।
भारतीय लोकजीवन में शरद पूर्णिमा का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व अत्यंत विशिष्ट है। इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। ‘को जागर्ति’ अर्थात कौन जाग रहा है—इस लोकमान्यता में मां लक्ष्मी के आगमन और समृद्धि की कामना का भाव निहित है। किंतु जागरण का एक व्यापक अर्थ यह भी है कि मनुष्य अपने विवेक, कर्तव्य और आत्मबोध के प्रति जागरूक रहे। वास्तविक समृद्धि केवल स्वर्ण, संपदा और वैभव के संचय में नहीं, अपितु संतोष, सदाचार, करुणा और उदारता से संपन्न जीवन में प्रतिष्ठित होती है। जो व्यक्ति दूसरों की पीड़ा के प्रति संवेदनशील है, अपने दायित्वों के प्रति सजग है और विपरीत परिस्थितियों में भी मानवीय मर्यादाओं का परित्याग नहीं करता, वस्तुतः वही जीवन की सच्ची लक्ष्मी का अधिकारी है।
शरद पूर्णिमा की रात्रि का संबंध श्रीकृष्ण की महारास लीला से भी जुड़ा है। भारतीय भक्तिधारा में रास केवल नृत्य और संगीत की मोहक छवि नहीं, बल्कि जीवात्मा और परमात्मा के अनन्य अनुराग की आध्यात्मिक अभिव्यक्ति है। वृंदावन की कल्पित कुंजों में बिखरी चांदनी, यमुना की लहरों का कलनाद और मुरली की मधुर तान सदियों से भारतीय काव्य-चेतना को अनुप्राणित करते रहे हैं। सूरदास की भक्ति, रसखान का कृष्णानुराग और वैष्णव साहित्य की माधुर्य-परंपरा प्रेम को आत्मविस्मृति, समर्पण और अहंकार के विसर्जन का माध्यम मानती है। इस दृष्टि से रास का संदेश है कि जहां स्वार्थ का आग्रह क्षीण होता है, वहीं आत्मीयता का विस्तार होता है। प्रेम अधिकार जताने में नहीं, दूसरे के अस्तित्व को सम्मान देने में निहित है; भक्ति केवल आराधना में नहीं, बल्कि अपने आचरण को पवित्र और परहितकारी बनाने में भी प्रतिष्ठित है।
इस पर्व पर खीर बनाकर चंद्रमा की चांदनी में रखने की परंपरा भारतीय घर-आंगन की आत्मीय स्मृतियों का अभिन्न अंग है। लोकविश्वास में इस खीर को अमृततुल्य माना जाता है। आस्था और परंपरा के इस भाव का सम्मान करते हुए यह विवेक बनाए रखना भी आवश्यक है कि धार्मिक मान्यताएं और वैज्ञानिक निष्कर्ष अलग-अलग आधारों पर प्रतिष्ठित होते हैं। फिर भी इस परंपरा की सांस्कृतिक महत्ता निर्विवाद है। परिवार का एकत्र होना, प्रसाद का वितरण, बड़ों का स्नेह और बच्चों की उत्सुकता पर्व को आत्मीयता के उत्सव में रूपांतरित कर देते हैं। परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब वे अगली पीढ़ी तक केवल कर्मकांड बनकर नहीं, बल्कि अपने भीतर निहित सद्भाव और जीवन-मूल्यों के साथ पहुंचती हैं।
वर्तमान समय में मनुष्य ने भौतिक प्रगति के अनेक सोपान पार किए हैं, किंतु इस उपलब्धि के समानांतर अंतर्मन की शांति और संबंधों की ऊष्मा अनेक चुनौतियों से घिरी हुई है। संचार के असंख्य साधनों ने दूरियों को घटाया है, परंतु कई बार निकट बैठे व्यक्तियों के बीच भी संवादहीनता की दीवार खड़ी कर दी है। प्रतिस्पर्धा की तीव्रता ने आकांक्षाओं को प्रबल किया है, किंतु धैर्य और संतोष के अवकाश को संकुचित भी किया है। उपलब्धियों की दौड़ में मनुष्य दूसरों से आगे निकलने का प्रयत्न तो करता है, परंतु अनेक बार स्वयं से संवाद करना भूल जाता है। ऐसे समय में शरद पूर्णिमा की चांदनी हमें ठहरने, अपने भीतर झांकने और जीवन की प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने की प्रेरणा देती है। आखिर जिस सफलता में मन की शांति न हो और जिस समृद्धि में संबंधों की मधुरता न बचे, उसकी पूर्णता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
चंद्रमा की महिमा उसके शीतल प्रकाश में है। वह सूर्य की भांति प्रखर ताप से नहीं, बल्कि सौम्य आभा से रात्रि की नीरवता को सौंदर्य प्रदान करता है। मनुष्य के व्यक्तित्व में भी प्रतिभा और पराक्रम के साथ विनम्रता, सहिष्णुता और करुणा का समावेश आवश्यक है। ज्ञान यदि अहंकार को पोषित करे, शक्ति यदि दुर्बल को भयभीत करे और सफलता यदि मनुष्य को दूसरों की पीड़ा से विमुख कर दे, तो वह उपलब्धि अपने नैतिक अर्थ खो देती है। जीवन का वास्तविक वैभव इस बात में नहीं कि हमारे पास कितना है, बल्कि इसमें है कि हमारे होने से किसी दूसरे के जीवन में कितनी आशा, सहजता और प्रसन्नता का संचार होता है। दूसरों के अंधकार को कोसने के स्थान पर उनके जीवन में प्रकाश का एक छोटा-सा दीप प्रज्वलित करना ही मानवीय संवेदना की सार्थक परिणति है।
प्रकृति के प्रति मनुष्य का उत्तरदायित्व भी इसी संवेदनशील दृष्टि का विस्तार है। शरद की निर्मल रात्रि, खुला आकाश और चंद्रकिरणों से आलोकित धरती उस प्राकृतिक वैभव का स्मरण कराते हैं, जिसके सहारे जीवन की समस्त गतिविधियां संचालित होती हैं। प्रदूषण, अनियंत्रित शहरीकरण और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के बीच प्रकृति से आत्मीय संबंध स्थापित करना समय की आवश्यकता है। विकास और पर्यावरण परस्पर विरोधी नहीं होने चाहिए; विवेकपूर्ण विकास वही है, जो भावी पीढ़ियों के जीवनाधार को सुरक्षित रखे। प्रकृति के सौंदर्य का उत्सव मनाना तभी सार्थक होगा, जब हम उसकी निर्मलता और संतुलन की रक्षा को अपना नैतिक दायित्व भी स्वीकार करें।
शरद पूर्णिमा का संदेश सामाजिक जीवन के लिए भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। चंद्रमा की चांदनी किसी भेदभाव के बिना समूची धरा पर बिखरती है। उसी प्रकार मनुष्यता का प्रकाश भी जाति, वर्ग, भाषा और आर्थिक विषमता की सीमाओं से परे सबके प्रति सम्मान का भाव विकसित करे। समाज की वास्तविक समृद्धि तभी संभव है, जब समर्थ व्यक्ति असहाय का संबल बने, संपन्न व्यक्ति अभावग्रस्त की पीड़ा समझे और परिवार अपने एकाकी तथा वृद्ध सदस्यों के प्रति आत्मीय उत्तरदायित्व निभाएं। उत्सवों का आलोक उन घरों तक भी पहुंचना चाहिए, जहां अभाव, बीमारी और अकेलापन जीवन की सहज प्रसन्नता को आच्छादित किए हुए हैं।
अंततः शरद पूर्णिमा हमें स्मरण कराती है कि जीवन की पूर्णता बाहरी वैभव से अधिक अंतर्मन की निर्मलता में निहित है। जिस प्रकार मेघों के छंटने पर चंद्रमा की आभा निखर उठती है, उसी प्रकार अहंकार, ईर्ष्या और द्वेष के आवरण हटने पर मनुष्य का वास्तविक स्वरूप प्रकाशित होता है। यदि इस पर्व पर हम अपने संबंधों में आत्मीयता, व्यवहार में विनम्रता, विचारों में उदारता और प्रकृति के प्रति अपने आचरण में उत्तरदायित्व का संकल्प धारण कर सकें, तो चांदनी का यह उत्सव हमारे जीवन में स्थायी अर्थ ग्रहण कर लेगा। आकाश का पूर्णचंद्र प्रतिवर्ष उदित होता है; आवश्यकता केवल इतनी है कि उसके शीतल प्रकाश का कुछ अंश हमारे अंतर्मन में भी उतर सके। संवेदना से संपन्न हृदय, संतुलित विचार और सद्भावपूर्ण आचरण ही जीवन की वास्तविक पूर्णिमा हैं। यही शरद पूर्णिमा का शाश्वत संदेश है और यही वह उजास है, जिसकी आज के समाज को सर्वाधिक आवश्यकता है।
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