Tamil Nadu Assembly: करुणानिधि के नाम पर सदन में हंगामा, मंत्री की टिप्पणी पर सीएम विजय ने मांगी माफी
तमिलनाडु विधानसभा में वन मंत्री द्वारा पूर्व सीएम एम. करुणानिधि का नाम बिना सम्मानजनक संबोधन के लेने पर हंगामा हुआ। सीएम विजय ने तुरंत माफी मांगकर मामला शांत कराया।
- TN Assembly Row: पूर्व सीएम करुणानिधि के असम्मानजनक संबोधन पर डीएमके का विरोध, मुख्यमंत्री विजय ने जताया खेद
- तमिलनाडु विधानसभा में बवाल: मंत्री ने बिना सम्मान लिया करुणानिधि का नाम, सीएम विजय ने सदन में मांगी माफी
- Tamil Nadu Assembly: पूर्व सीएम करुणानिधि के नाम पर विधानसभा में तीखी नोकझोंक, मुख्यमंत्री विजय ने मांगी माफी
तमिलनाडु विधानसभा में सोमवार को उस समय भारी राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया जब राज्य के वन मंत्री आर.वी. रंजीत कुमार ने भाषण के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि का नाम बिना किसी औपचारिक या पारंपरिक सम्मानजनक संबोधन के सीधे ले लिया। सदन में दिवंगत नेता को 'कलैगनार' या 'पूर्व मुख्यमंत्री' कहने की स्थापित परंपरा का पालन न होने पर मुख्य विपक्षी दल डीएमके ने कड़ा विरोध जताया और हंगामा शुरू कर दिया। मामले की गंभीरता और सदन की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने तत्काल हस्तक्षेप किया और अपने मंत्री के आचरण पर विपक्षी सदस्यों के समक्ष स्पष्ट रूप से माफी मांगते हुए स्थिति को संभाला।
तमिलनाडु विधानसभा की कार्यवाही के दौरान राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज द्रविड़ नेता एम. करुणानिधि के नाम के संबोधन को लेकर सदन में तीखा गतिरोध देखने को मिला। वन मंत्री आर.वी. रंजीत कुमार ने अपनी बात रखते समय पूर्व मुख्यमंत्री के नाम के आगे पारंपरिक सम्मानसूचक शब्द 'कलैगनार' नहीं लगाया। इस संबोधन पर विपक्षी दल डीएमके के विधायकों ने गहरी आपत्ति दर्ज कराई और इसे सदन की मर्यादा व वरिष्ठ नेता का अपमान करार देते हुए भारी हंगामा किया। स्थिति बिगड़ती देख मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने आगे आकर इस चूक को स्वीकार किया और मंत्री की ओर से सदन में खेद प्रकट किया।
यह पूरा विवाद स्वास्थ्य और राजस्व विभागों के लिए अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान शुरू हुआ। बहस में भाग लेते हुए वन मंत्री आर.वी. रंजीत कुमार पूर्ववर्ती चुनावी रणनीतियों और कथित धन वितरण व्यवस्था की आलोचना कर रहे थे। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने बहुचर्चित 'तिरुमंगलम फॉर्मूला' का उल्लेख किया और दावा किया कि पिछले चुनावों में उनके कांचीपुरम निर्वाचन क्षेत्र में प्रति वोट भारी धनराशि बांटी गई थी। मंत्री ने कहा कि वर्तमान सरकार बिना किसी प्रलोभन या धन वितरण के जनादेश हासिल कर सत्ता में आई है।
इसी तुलनात्मक व्याख्या के दौरान मंत्री ने दिवंगत नेता एम. करुणानिधि का नाम बिना किसी औपचारिक पद या 'कलैगनार' (विद्वान) की उपाधि के सीधे तौर पर पुकारा। इस पर डीएमके के विधायक तुरंत अपनी सीटों से खड़े हो गए और नारेबाजी करते हुए मंत्री के बयान पर कड़ा ऐतराज जताया। सदन में बढ़ते तनाव के बीच मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने स्वीकार किया कि राज्य के वरिष्ठ और दिवंगत नेता के प्रति इस तरह का संबोधन अनुचित था। मुख्यमंत्री ने सदन को शांत करते हुए कहा कि वह अपने मंत्री की इस टिप्पणी पर माफी मांगते हैं, जिसके बाद सदन की कार्यवाही आगे बढ़ सकी।
विपक्षी दल डीएमके के नेताओं ने कहा कि सदन की एक स्थापित मर्यादा और गरिमा होती है, विशेषकर उन नेताओं के संदर्भ में जिन्होंने दशकों तक राज्य का नेतृत्व किया है। उनका तर्क था कि पांच बार मुख्यमंत्री रहे नेता को बिना सम्मानजनक संबोधन के पुकारना स्वीकार्य नहीं हो सकता। वहीं दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री द्वारा तुरंत और बिना किसी हिचकिचाहट के माफी मांगे जाने को सत्ता पक्ष ने लोकतांत्रिक मर्यादा और संसदीय शिष्टाचार का उदाहरण बताया। सत्ता पक्ष के सदस्यों का कहना था कि मंत्री का इरादा किसी का अपमान करने का नहीं था, बल्कि वह चुनावी इतिहास के एक संदर्भ की चर्चा कर रहे थे।
- संसदीय मर्यादा
विधानसभा में घटे इस घटनाक्रम ने तमिलनाडु की राजनीति में वरिष्ठ नेताओं के प्रति सम्मान और संसदीय भाषा के महत्व को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। मुख्यमंत्री द्वारा दिखाई गई इस त्वरित संवेदनशीलता ने न केवल सदन में बड़े गतिरोध को टाला, बल्कि विपक्षी हमलों की धार को भी कुंद कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे मामलों में नेतृत्व द्वारा सीधे जिम्मेदारी लेना सदन की कार्यप्रणाली को सुचारू रखने और कटुता को कम करने में मदद करता है। साथ ही इसने सभी दलों के लिए यह संदेश दिया कि राजनीतिक बहस चाहे कितनी भी तीखी हो, संसदीय शिष्टाचार का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।
इस विवाद के शांत होने के बाद सदन में अनुदान मांगों पर निर्धारित एजेंडे के तहत चर्चा दोबारा शुरू हुई। हालांकि, इस घटना के बाद विधानसभा सचिवालय और राजनीतिक दलों के बीच भविष्य में संसदीय चर्चाओं के दौरान ऐतिहासिक और दिवंगत व्यक्तित्वों के संदर्भ में भाषा की मर्यादा बनाए रखने को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरते जाने की उम्मीद है। दोनों पक्षों की ओर से आगामी सत्रों में इस प्रकार के संवेदनशील मुद्दों पर तीखी बहस की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
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