राजनीति का 'चौराहा' और हाशिए पर स्वाभिमान: आखिर कब तक दर-दर भटकेंगे राणा?
सिनेमा चौराहे से डीएम चौराहे तक मूर्ति स्थापना के वादों पर उठे सवाल, क्षत्रिय समाज में बढ़ रही नाराजगी
हरदोई। महाराणा प्रताप की प्रतिमा स्थापना को लेकर हरदोई में चल रहा विवाद अब केवल एक मूर्ति का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह समाज के सम्मान, राजनीतिक वादों और नेतृत्व की भूमिका पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है। सिनेमा चौराहे से लेकर डीएम चौराहे तक प्रतिमा स्थापना को लेकर हुए घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।
1. वादों का बदलता चौराहा
शुरुआत में नगर पालिका और जनप्रतिनिधियों की सहमति से सिनेमा चौराहे पर महाराणा प्रताप की मूर्ति लगना तय हुआ था। लेकिन अचानक रातों-रात वहाँ किसी और प्रतीक को स्थापित कर क्षत्रिय समाज को आईना दिखा दिया गया। जब समाज में आक्रोश बढ़ा, तो डैमेज कंट्रोल के लिए सत्ता के रसूखदारों और बड़बोले नेताओं ने नया 'लॉलीपॉप' थमाया—"सिनेमा चौराहा नहीं तो क्या, डीएम चौराहे पर भव्य मूर्ति लगेगी!"
लेकिन हाल ही में हुई प्रशासनिक बैठक में स्पष्ट किया गया कि डीएम चौराहे पर किसी नई प्रतिमा की स्थापना का प्रस्ताव नहीं है और वहां केवल पूर्व स्थापित सम्राट अशोक स्तंभ को पुनर्स्थापित किया जाएगा। इससे पूर्व में किए गए राजनीतिक दावों पर सवाल खड़े होने लगे हैं।
2. सत्ता का गणित और 'यूजीसी मॉडल' जैसी स्थिति:-
वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में क्षत्रिय समाज की स्थिति कुछ वैसी ही हो चली है, जैसी शिक्षा जगत में नए यूजीसी (UGC) नियमों के आने पर होती है—योग्यता और ताकत का इस्तेमाल तो पूरा चाहिए, लेकिन जब हक़ और प्रतिनिधित्व देने की बात आए, तो नियमों का हवाला देकर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। कड़वा सच यही है कि सत्ता की सीढ़ी चढ़ने के लिए क्षत्रियों का कंधा सबको चाहिए, लेकिन जब सत्ता के शीर्ष या निर्णयों में भागीदारी की बात आती है, तो उन्हें हाशिए पर धकेल दिया जाता है।
3. स्थानीय नेतृत्व पर भी उठ रहे सवाल, ड्रॉइंगरूम पॉलिटिक्स और वोटों का खेल:-
मज़े का खेल तो हरदोई सदर की स्थानीय राजनीति में देखने को मिल रहा है। जिस समाज ने विपक्ष के चेहरे को दो दो बार अपना रहनुमा मानकर एकमुश्त 90- 93 हज़ार वोट सौंप दिए, आज वही नेतृत्व ज़मीनी संघर्ष से नदारद है। जब समाज सड़क पर महाराणा प्रताप के सम्मान के लिए संघर्ष कर रहा है, तब इनके स्वघोषित रहनुमा अपने वातानुकूलित कमरों में बैठकर 'ड्रॉइंगरूम पॉलिटिक्स' और सोशल मीडिया पर बयानबाज़ी करने में व्यस्त हैं। वोटबैंक सुरक्षित रहे और रसूखदारों से संबंध भी न बिगड़ें—इस दोहरी नीति ने समाज के आत्मसम्मान को सबसे ज़्यादा चोट पहुँचाई है।
4- विकास बनाम प्रतीकों की राजनीति
यह बेहद निंदनीय है कि मूर्तियों की इस अंतहीन होड़ में ज़मीनी विकास, शिक्षा, और रोज़गार जैसे वास्तविक मुद्दों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है। भारत भूमि का इतिहास समृद्ध है और यहाँ हर समाज में एक से बढ़कर एक सूरमा और महापुरुष पैदा हुए हैं, जिनका सम्मान करना हम सबका सामूहिक कर्तव्य है।
मगर अफसोस इस बात पर है कि महापुरुषों के सम्मान के नाम पर किसी एक समाज को जानबूझकर नकारना, उसे अपमानित महसूस कराना और जातियों के बीच विभाजन या संघर्ष की नई परंपरा डालना कहाँ तक जायज़ है?
यक्ष प्रश्न
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या महाराणा प्रताप जैसे वीर महापुरुष के सम्मान का विषय राजनीतिक वादों और प्रतीकात्मक राजनीति तक ही सीमित रहेगा, या फिर इस पर कोई सर्वमान्य और सम्मानजनक समाधान निकलेगा? समाज के बीच यही चर्चा आज सबसे अधिक सुनाई दे रही है।
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