यूपी के मेडिकल कॉलेजों में तीन-स्तरीय शिकायत निवारण व्यवस्था लागू, छात्र समस्याओं का समयबद्ध होगा समाधान
उत्तर प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में छात्र-छात्राओं की समस्याओं के समाधान के लिए तीन-स्तरीय ग्रीवांस निवारण तंत्र लागू किया गया है। हर कॉलेज में नोडल अधिकारी तैनात होंगे।
उत्तर प्रदेश के समस्त राजकीय एवं स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालयों में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं के कल्याण, सुरक्षा और शैक्षणिक परिवेश को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से एक संस्थागत व्यवस्था प्रारंभ की गई है। चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा प्रदेश भर के मेडिकल कॉलेजों में त्रिस्तरीय शिकायत निवारण तंत्र लागू करने के निर्देश जारी किए गए हैं। इस नवाचार का मुख्य ध्येय संस्थानों के भीतर पारदर्शी, सुरक्षित, जवाबदेह और छात्र-हितैषी वातावरण सुनिश्चित करना है, ताकि विद्यार्थियों की समस्याओं का समयबद्ध और प्रभावी निस्तारण हो सके।
महानिदेशक, चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण (डीजीएमई) नेहा शर्मा की पहल पर शुरू किए गए 'स्टूडेंट ग्रीवांस एंड वेलफेयर इनिशिएटिव' के तहत प्रत्येक मेडिकल कॉलेज में एक समर्पित 'स्टूडेंट वेलफेयर नोडल ऑफिसर' नामित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त प्रत्येक कॉलेज के शैक्षणिक व प्रशासनिक परिसर में 'स्टूडेंट ग्रीवांस/वॉयस बॉक्स' स्थापित किए जाएंगे। विद्यार्थी अपनी शैक्षणिक कठिनाइयों, प्रशासनिक विषयों, छात्रावास प्रबंधन, आधारभूत ढांचे, भोजन व्यवस्था और सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं अथवा सुझावों को लिखित रूप में इस पेटी में डाल सकेंगे। नोडल अधिकारी द्वारा प्रतिदिन इस पेटी को खोलकर शिकायतों को पंजीबद्ध किया जाएगा और संबंधित विभाग से समन्वय स्थापित कर निस्तारण सुनिश्चित कराया जाएगा।
विभागीय कार्ययोजना के अनुसार, शिकायतों के निस्तारण को तीन स्तरों में विभाजित किया गया है। प्रथम स्तर पर नामित नोडल अधिकारी प्राप्त प्रकरणों का स्थानीय स्तर पर त्वरित समाधान करेंगे। यदि किसी प्रकरण का समाधान प्राथमिक स्तर पर संभव नहीं हो पाता है, तो विद्यार्थी दूसरे स्तर के रूप में संबंधित मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य के समक्ष अपनी बात रख सकेंगे। यदि द्वितीय स्तर पर भी समस्या का समुचित समाधान नहीं निकलता, तो छात्र तीसरे व सर्वोच्च स्तर के तहत महानिदेशालय (डीजीएमई कार्यालय), लखनऊ में स्थापित विशेष 'स्टूडेंट सेल' में अपनी शिकायत प्रेषित कर सकेंगे।
इस पूरी प्रक्रिया का विधिवत रिकॉर्ड संधारित किया जाएगा और मुख्यालय स्तर से इसकी नियमित समीक्षा की जाएगी। त्रिस्तरीय निगरानी तंत्र विकसित होने से न केवल प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी, बल्कि भविष्य के चिकित्सकों को बिना किसी मानसिक दबाव के अध्ययन के लिए अनुकूल माहौल भी उपलब्ध हो सकेगा।
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