यूपी में मुख्यमंत्री कृषक छात्रवृत्ति की सीटें हुईं दोगुनी, किसानों के बच्चों को अब सालाना मिलेंगे 60 हजार रुपये
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री कृषक छात्रवृत्ति योजना की सीटें बढ़कर 2820 हुईं। किसानों व मजदूरों के बच्चों को अब प्रतिवर्ष 60 हजार रुपये आर्थिक सहायता मिलेगी।
ग्रामीण परिवेश के परिवारों और कृषि क्षेत्र से जुड़े कामगारों के होनहार बेटे-बेटियों को आधुनिक खेती-किसानी की उच्च शिक्षा से जोड़ने के लिए राज्य सरकार ने बड़ा निर्णय लिया है। राज्य कृषि उत्पादन मंडी परिषद के तहत संचालित मुख्यमंत्री कृषक छात्रवृत्ति योजना में सीटों की तादाद दोगुनी करने के साथ ही मिलने वाली मासिक आर्थिक मदद में भी भारी इजाफा किया गया है। अब कृषि विश्वविद्यालयों और संस्थानों में 45 की जगह 90 विद्यार्थियों तथा महाविद्यालयों में 15 के स्थान पर 30 मेधावियों को मेरिट के आधार पर यह लाभ मिलेगा।
नई व्यवस्था लागू होने के बाद पूरे प्रदेश के 11 कृषि विश्वविद्यालयों व शोध संस्थानों और 61 कृषि महाविद्यालयों में कुल स्वीकृत सीटों की संख्या 1410 से सीधे बढ़कर 2820 पहुंच गई है। इसके साथ ही योजना में मिलने वाली आर्थिक मदद तीन हजार रुपये महीने से बढ़ाकर पांच हजार रुपये मासिक कर दी गई है। इस तरह चयनित छात्र-छात्राओं को अब सालाना 36 हजार के स्थान पर पूरे 60 हजार रुपये की सहायता राशि सीधे मिलेगी। प्रत्येक छात्र को सालाना 24 हजार रुपये का अतिरिक्त लाभ मिलने से उनकी पढ़ाई की राह आसान होगी।
मंडी परिषद के आंकड़ों के अनुसार बीते वित्तीय वर्षों में 6454 विद्यार्थियों को लगभग 22.90 करोड़ रुपये की सहायता राशि सीधे उनके खातों में पहुंचाई जा चुकी है। सीटों के नए आवंटन के तहत विश्वविद्यालयों में स्नातक स्तर पर 50, गृह विज्ञान स्नातक में 12, कृषि परास्नातक में 20 और गृह विज्ञान स्नातकोत्तर में आठ सीटें कर दी गई हैं। वहीं कृषि डिग्री कॉलेजों में स्नातक के लिए 20 तथा परास्नातक के लिए 10 सीटें निर्धारित की गई हैं। इस दायरे में कृषि के साथ-साथ बागवानी, वानिकी और पशुपालन जैसे संबद्ध विषयों के विद्यार्थी भी शामिल रहेंगे।
योजना का सीधा फायदा केवल उत्तर प्रदेश के मूल निवासी किसानों और खेतिहर श्रमिकों के उन आश्रित बच्चों को मिलेगा, जो मेरिट की शर्तों को पूरा करेंगे। स्नातक स्तर पर प्रवेश के लिए यूपी बोर्ड से बारहवीं में कम से कम 70 प्रतिशत और अन्य शिक्षा बोर्ड से 85 प्रतिशत अंक अनिवार्य रखे गए हैं, जबकि स्नातकोत्तर स्तर पर न्यूनतम 70 फीसदी अंक होना आवश्यक है। मंडी परिषद के निदेशक जितेंद्र प्रताप सिंह के अनुसार, इस कदम का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण प्रतिभाओं को आर्थिक तंगी से उबारकर आधुनिक कृषि वैज्ञानिक, शोधकर्ता और सफल कृषि उद्यमी के रूप में तैयार करना है ताकि प्रदेश के कृषि क्षेत्र को नई तकनीक और युवा सोच का पूरा लाभ मिल सके।
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