Allahabad High Court: छात्रा पर रासुका लगाने पर भड़का हाईकोर्ट, नोएडा डीएम और पुलिस अफसरों पर लगाया हर्जाना 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मजदूर आंदोलन में छात्रा पर रासुका लगाने को गलत ठहराते हुए नोएडा डीएम और एसएचओ के वेतन से पांच लाख रुपये हर्जाना वसूलने का आदेश दिया है।

By INA News Desk
Sep 8, 2026 - 13:24
4 Views
Allahabad High Court: छात्रा पर रासुका लगाने पर भड़का हाईकोर्ट, नोएडा डीएम और पुलिस अफसरों पर लगाया हर्जाना 
  • नोएडा मजदूर आंदोलन: इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, DM और SHO के वेतन से 5 लाख वसूली का आदेश 
  • 'नौकरशाह यूपी को दमनकारी राज्य न बनाएं': इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, नोएडा डीएम और एसएचओ की सैलरी से 5 लाख वसूली का आदेश 
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट की बड़ी कार्रवाई: नोएडा मजदूर आंदोलन में गलत NSA लगाने पर DM और SHO के वेतन से ₹5 लाख हर्जाना वसूलने का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों की मनमानी कार्यशैली पर कड़ा प्रहार करते हुए एक असाधारण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। नोएडा में कामगारों के मानदेय और अधिकारों को लेकर हुए प्रदर्शन के मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका/एनएसए) को अदालत ने पूरी तरह असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने नागरिक स्वतंत्रता के उल्लंघन पर नाराजगी जताते हुए पीड़िता को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस हर्जाने का बोझ सरकारी खजाने पर नहीं पड़ेगा, बल्कि यह धनराशि गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी और संबंधित थाना प्रभारी (एसएचओ) समेत जिम्मेदार अफसरों के वेतन से वसूली जाएगी। 

गौतमबुद्ध नगर के औद्योगिक क्षेत्र नोएडा में श्रमिकों के न्यूनतम वेतन और कार्यदशाओं में सुधार की मांग को लेकर हुए आंदोलन के दौरान पुलिस ने कई कार्यकर्ताओं पर मुकदमे दर्ज किए थे। इसी घटनाक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास स्नातक छात्रा आकृति चौधरी को हिरासत में लिया गया और बाद में जिला प्रशासन ने पुलिस रिपोर्ट के आधार पर उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून तामील कर दिया। इस निरोधात्मक कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई थी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि पुलिस और प्रशासनिक तंत्र ने बिना किसी ठोस साक्ष्य के एक युवा छात्रा पर देश के सबसे सख्त कानूनों में से एक का प्रयोग किया। अदालत ने माना कि यह कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का गंभीर हनन है। इसके साथ ही अदालत ने आदेश पारित किया कि अवैध हिरासत के एवज में पीड़िता को दिया जाने वाला पांच लाख रुपये का मुआवजा जिम्मेदार अधिकारियों की जेब से वसूला जाए। 

नोएडा के औद्योगिक इलाके में कामगारों द्वारा बेहतर वेतन की मांग को लेकर आयोजित प्रदर्शन के सिलसिले में पुलिस ने कार्रवाई शुरू की थी। राज्य सरकार की ओर से आरोप लगाया गया था कि याचिकाकर्ता ने प्रदर्शनकारियों को हिंसा, आगजनी और कानून व्यवस्था बिगाड़ने के लिए उकसाया। जब अदालत ने अभियोजन पक्ष से ऐसे साक्ष्य, वीडियो फुटेज या संदेश प्रस्तुत करने को कहा जिससे हिंसा भड़काने की पुष्टि होती हो, तो सरकार एक भी ऐसा प्रमाण पेश नहीं कर सकी।

रिकॉर्ड की पड़ताल के दौरान अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि जिस समय छात्रा की मेट्रो स्टेशन के पास से वास्तविक हिरासत हुई और कागजों में जो गिरफ्तारी दिखाई गई, उसमें गंभीर विरोधाभास मौजूद था। अदालत ने पाया कि नोटिस पर पहले से ही सामान्य डायरी (जीडी) नंबर अंकित था, जिससे यह साबित होता है कि कानूनी प्रक्रिया महज एक औपचारिकता बनकर रह गई थी। अदालत ने कहा कि जिलाधिकारी को पुलिस की अनुशंसा पर आंख मूंदकर हस्ताक्षर करने के बजाय स्वतंत्र रूप से दिमाग का इस्तेमाल करना चाहिए था कि क्या किसी शांतिपूर्ण आंदोलनकारी पर असाधारण कानून लगाना उचित था। 

फैसले के दौरान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने प्रशासनिक अधिकारियों के आचरण पर बेहद तल्ख टिप्पणियां कीं। अदालत ने कहा कि जब आईएएस और आईपीएस अधिकारी संविधान के प्रति ली गई अपनी निष्ठा की शपथ को भुलाकर काम करते हैं, तो आम जनता उन्हें औपनिवेशिक दौर के दमनकारी तंत्र के रूप में देखने लगती है। अदालत ने चेतावनी देते हुए कहा कि नौकरशाहों का ऐसा निरंकुश रवैया राज्य को एक भयावह और दमनकारी समाज में तब्दील कर सकता है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जिलाधिकारी और संबंधित पुलिस अधिकारियों की सेवा पंजिका में अदालत की इस सख्त असहमति को दर्ज किया जाए।

दूसरी तरफ याचिकाकर्ता के परिजनों और अधिवक्ताओं ने इस फैसले को लोकतांत्रिक अधिकारों और न्याय की बड़ी जीत बताया है। परिजनों का कहना है कि उनकी बेटी केवल मजदूरों के कानूनी अधिकारों के समर्थन में खड़ी थी और उसे झूठे आधारों पर फंसाया गया था। वहीं प्रशासनिक हलकों में इस आदेश के बाद खलबली मची हुई है और कानूनी राय ली जा रही है। 

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश भारतीय प्रशासनिक और पुलिस तंत्र के लिए एक बड़ा सबक माना जा रहा है। आमतौर पर अवैध हिरासत या सरकारी तंत्र की चूक के मामलों में मुआवजे की राशि राज्य सरकार के खजाने से दी जाती थी, जिसका सीधा भार आम करदाताओं पर पड़ता था। अधिकारियों के निजी वेतन से हर्जाना वसूलने का यह स्पष्ट आदेश प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

इस निर्णय ने यह भी पुनः स्थापित किया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना, अपनी आवाज उठाना और कामगारों के अधिकारों की पैरवी करना कोई देशद्रोह या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा नहीं है। अदालत के इस सख्त रुख से भविष्य में किसी भी नागरिक पर बिना पुख्ता आधार के असाधारण कानूनों के दुरुपयोग पर प्रभावी रोक लगने की उम्मीद है। 

अदालत के आदेशानुसार मुआवजे की पांच लाख रुपये की राशि याचिकाकर्ता को दी जाएगी और मुख्य सचिव स्तर पर इस बात की निगरानी की जाएगी कि यह रकम जिलाधिकारी और प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार करने वाले एसएचओ समेत संबंधित पुलिस अफसरों के वेतन से काटी जाए। इसके साथ ही संबंधित अधिकारियों के सेवा अभिलेखों में प्रतिकूल प्रविष्टि दर्ज करने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद राज्य सरकार के विधिक विभाग द्वारा ऊपरी अदालत में अपील की संभावनाओं का आकलन भी किया जा रहा है।

Also Read- CM Yogi Agra Visit: आगरा से 'मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना' का शुभारंभ, 10 लाख लोगों को मिलेगा फायदा

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow