Noida News: सुप्रीम कोर्ट से नोएडा डीएम मेधा रूपम को बड़ी राहत, वेतन से 5 लाख की वसूली और हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियों पर लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा डीएम मेधा रूपम को बड़ी राहत देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के 5 लाख रुपये वेतन कटौती आदेश और प्रतिकूल टिप्पणियों पर अंतरिम रोक लगा दी है।
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- NSA Detention Row: नोएडा डीएम के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, यूपी सरकार की अपील पर नोटिस जारी
- Supreme Court Relief To Noida DM: छात्र हिरासत मामले में राहत, सुप्रीम कोर्ट ने रोकी 5 लाख रुपये वेतन कटौती और सर्विस रिकॉर्ड एंट्री
नई दिल्ली / नोएडा। गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) की जिलाधिकारी मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार को देश की शीर्ष अदालत से एक बड़े कानूनी मामले में महत्वपूर्ण राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा नोएडा डीएम के खिलाफ की गई बेहद तीखी टिप्पणियों (Strictures) और उनके व्यक्तिगत वेतन से 5 लाख रुपये का मुआवजा वसूलने के निर्देश पर अंतरिम रोक लगा दी है। इसके साथ ही अदालत ने संबंधित अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज की जाने वाली प्रतिकूल टिप्पणियों के क्रियान्वयन को भी आगामी सुनवाई तक स्थगित कर दिया है।
न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की दो सदस्यीय खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार तथा जिलाधिकारी मेधा रूपम की ओर से दाखिल विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। शीर्ष अदालत ने याचिका पर प्रतिवादी पक्ष को नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 7 अक्टूबर के लिए तय की है। अदालत ने साफ किया कि जब तक मामले की मेरिट के आधार पर पूरी समीक्षा नहीं हो जाती, तब तक इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के विवादित अंश (विशेष रूप से पैराग्राफ 27 से 33) पूरी तरह प्रभावी नहीं रहेंगे।
क्या था पूरा मामला और इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख?
यह पूरा विवाद राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका/NSA) के तहत दिल्ली विश्वविद्यालय की एक पूर्व छात्रा और कार्यकर्ता आकृति चौधरी की प्रशासनिक हिरासत से जुड़ा हुआ है। नोएडा क्षेत्र में औद्योगिक श्रमिकों के आंदोलन और वेतन वृद्धि को लेकर हुए विरोध-प्रदर्शन के दौरान अप्रैल महीने में पुलिस ने कार्रवाई की थी। इसके बाद मई में जिला प्रशासन के स्तर पर उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धाराएं लगाई गई थीं।
छात्रा की हिरासत के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर की गई थी। 2 सितंबर को न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेवा की खंडपीठ ने इस हिरासत को गैर-कानूनी बताते हुए रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पुलिस रिपोर्ट पर गंभीर सवाल खड़े किए थे और प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली को निरंकुश बताते हुए कहा था कि हिरासत का आधार ठोस साक्ष्यों से परे था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न केवल याचिकाकर्ता को राहत दी, बल्कि मुआवजे के रूप में 5 लाख रुपये देने का आदेश जारी किया। अदालत ने यह भी सख्त निर्देश दे दिया था कि यह मुआवजा सरकारी खजाने से जाने के बजाय सीधे जिलाधिकारी मेधा रूपम और संबंधित पुलिस अधिकारियों के मासिक वेतन से काटा जाए तथा उनकी सेवा पंजिका (Service Record) में अदालत की अप्रसन्नता दर्ज की जाए।
- सुप्रीम कोर्ट में क्या दी गईं दलीलें?
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस कड़े रुख के खिलाफ उत्तर प्रदेश शासन और डीएम मेधा रूपम ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। शीर्ष अदालत में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि रासुका के तहत निरुद्ध करने की कार्रवाई किसी एक अधिकारी का व्यक्तिगत फैसला नहीं होती, बल्कि यह एक बहुस्तरीय प्रशासनिक प्रक्रिया है।
वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखते हुए कहा कि स्थानीय थाना प्रभारी (SHO), पुलिस उपायुक्त (DCP) और पुलिस आयुक्त कार्यालय से रिपोर्ट तैयार होकर विभिन्न चरणों से गुजरती है। इसके बाद संबंधित सांविधिक प्रावधानों के तहत डीएम स्तर पर प्रक्रिया पूरी की जाती है और फाइल आगे एनएसए सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) की समीक्षा में भी जाती है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह प्रमुख बिंदु भी उठाया गया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत रूप से जिलाधिकारी को बिना उनका पक्ष सुने (बिना किसी पूर्व नोटिस के) उनके वेतन से कटौती और सेवा रिकॉर्ड को प्रभावित करने वाला आदेश पारित कर दिया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) का उल्लंघन है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना था कि यदि अर्ध-न्यायिक या प्रशासनिक दायित्वों के निर्वहन के दौरान लिए गए निर्णयों के लिए अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से आर्थिक दंड दिया जाएगा, तो इससे प्रशासनिक व्यवस्था में भय और अनिर्णय की स्थिति बनेगी।
- शीर्ष अदालत की मौखिक टिप्पणी और अंतरिम आदेश
मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने भी प्रक्रियागत जटिलताओं को संज्ञान में लिया। अदालत ने मौखिक तौर पर माना कि जब एक व्यवस्था पांच चरणों से होकर गुजरती है और पूरी प्रशासनिक शृंखला शामिल होती है, तो व्यक्तिगत रूप से जिलाधिकारी को इस प्रकार सीधे आर्थिक दायित्व के लिए जिम्मेदार ठहराना विचारणीय पहलू है।
अदालत ने दोनों पक्षों की प्राथमिक दलीलों को सुनने के बाद आदेश दिया कि हाईकोर्ट के उस हिस्से के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक रहेगी, जिसमें वेतन से ₹5 लाख की कटौती, व्यक्तिगत जवाबदेही और अधिकारियों के सेवा रिकॉर्ड में प्रतिकूल प्रविष्टि दर्ज कराने की बात कही गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता छात्रा की हिरासत रद्दीकरण का फैसला इस अंतरिम आदेश का मुख्य विषय नहीं है, बल्कि यह राहत पूरी तरह से अधिकारियों पर थोपी गई व्यक्तिगत देनदारी और सर्विस रिकॉर्ड से जुड़े हिस्से तक सीमित है।
सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम निर्देश से उत्तर प्रदेश की नौकरशाही और प्रशासनिक हलकों ने बड़ी राहत की सांस ली है। कानूनी जानकारों का मानना है कि यह मामला प्रशासनिक कानून (Administrative Law) की दृष्टि से बेहद अहम नजीर बन सकता है। इसमें यह विधिक प्रश्न तय होना है कि क्या अदालतें प्रिवेंटिव डिटेंशन या प्रशासनिक आदेशों को गलत पाए जाने की स्थिति में अधिकारियों पर व्यक्तिगत वित्तीय भार और सेवा संबंधी प्रतिकूल परिणाम बिना उन्हें अलग से सुने डाल सकती हैं। अब 7 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई पर सभी प्रशासनिक और कानूनी पक्षों की नजरें टिकी रहेंगी।
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